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सर्पदंश घोटाला: छोटी जांच और बड़े अफसर, कलेक्टर का दावा दोषी कोई भी हो नहीं बच पाएगा…

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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पार्ट 3…

  बड़े अफसरों तक कब पहुंचेगी जांच?
पटवारी-तहसीलदार-एसडीएम की भूमिका पर सबसे बड़े सवाल, ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे की होगी असली परीक्षा
थाना स्तर की जांच में डॉक्टर, बाबू, होमगार्ड और बिचौलिए गिरफ्तार… लेकिन करोड़ों का सरकारी मुआवजा मंजूर करने वाली प्रशासनिक चेन अब जांच के केंद्र में

मोहम्मद इसराइल | बिलासपुर
बिलासपुर के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच अब उस मोड़ पर खड़ी है, जहां सबसे बड़ा सवाल गिरफ्तार आरोपियों का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का है, जिसने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों रुपये के सरकारी मुआवजे को मंजूरी दी।
अब तक पुलिस ने डॉक्टर, होमगार्ड, तहसील कार्यालय के कर्मचारियों, कथित बिचौलियों और अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया है। लेकिन जिस प्रक्रिया के अंत में सरकारी धन स्वीकृत हुआ, उस प्रशासनिक श्रृंखला की भूमिका पर सवाल लगातार गहरे होते जा रहे हैं।

कलेक्टर संजय अग्रवाल को सुने….


यही वजह है कि अब पूरे मामले का केंद्रीय प्रश्न एक ही है—क्या जांच पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम और उन जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचेगी, जिनकी अनुशंसा और आदेश के बाद सरकारी राशि जारी हुई? या फिर कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रह जाएगी?
यही सवाल अब प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे की सबसे बड़ी कसौटी भी बन गया है।
जांच आगे बढ़ी… लेकिन क्या आधे रास्ते पर रुक जाएगी?
पुलिस की कार्रवाई लगातार तेज हुई है। अब तक दर्ज 15 अलग-अलग अपराधों में कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। डॉक्टर गिरफ्तार हैं, एसडीएम कार्यालय के बाबू जेल में हैं, कथित मास्टरमाइंड पकड़े जा चुके हैं और अब सिम्स चौकी के दो होमगार्ड जवान भी पुलिस रिमांड पर हैं।
लेकिन पूरे घटनाक्रम में एक समान सवाल लगातार उभर रहा है—
क्या करोड़ों रुपये का सरकारी भुगतान केवल निचले कर्मचारियों के भरोसे संभव था?
प्रशासनिक व्यवस्था को जानने वाले अधिकारियों का कहना है कि राजस्व राहत का कोई भी मामला एक व्यक्ति के हस्ताक्षर से नहीं गुजरता। यह कई स्तरों की जांच, सत्यापन और अनुशंसा के बाद ही अंतिम स्वीकृति तक पहुंचता है।
यही वह बिंदु है, जहां जांच का अगला चरण सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सिम्स से शुरू होकर तहसील और राजस्व कार्यालय तक फैली कथित चेन
पुलिस के अनुसार पूरा कथित नेटवर्क बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था।
जैसे ही कोई शव पोस्टमार्टम के लिए सिम्स पहुंचता, उसकी सूचना कथित गिरोह तक पहुंचा दी जाती। आरोप है कि इसके बाद परिजनों को शासन से मिलने वाले चार लाख रुपये के मुआवजे का लालच देकर सर्पदंश का मामला बनाने के लिए तैयार किया जाता था।
फिर कथित तौर पर—
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हेरफेर,
मर्ग इंटीमेशन में बदलाव,
पटवारी प्रतिवेदन,
राजस्व अभिलेख,
तहसीली परीक्षण,
एसडीएम कार्यालय की प्रक्रिया,
और अंततः मुआवजा स्वीकृति
तक पूरी फाइल आगे बढ़ती थी।
यानी यह केवल एक फर्जी दस्तावेज का मामला नहीं, बल्कि पूरी सरकारी प्रक्रिया के कथित दुरुपयोग की जांच बन चुकी है।
सबसे अहम सवाल—हर स्तर पर जांच हुई या केवल कागजी प्रक्रिया?
राजस्व नियमों के अनुसार सर्पदंश से मृत्यु पर मुआवजा देने की प्रक्रिया बहुस्तरीय है।
पहले एफआईआर दर्ज होती है।
फिर पुलिस पंचनामा बनाती है।
पोस्टमार्टम होता है।
जरूरत पड़ने पर बिसरा परीक्षण होता है।
इसके बाद परिजन आवेदन करते हैं।
तहसीलदार आवेदन पटवारी को जांच के लिए भेजता है।
पटवारी प्रतिवेदन देता है।
तहसीलदार परीक्षण कर प्रकरण एसडीएम को भेजता है।
एसडीएम अनुशंसा करता है।
इसके बाद सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के बाद ही सरकारी राशि जारी होती है।
ऐसे में यदि कथित फर्जी मामलों में भी भुगतान हुआ, तो यह जांच का विषय है कि प्रक्रिया के प्रत्येक स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार हुआ।
गिरफ्तारियां बढ़ीं… लेकिन बड़े सवाल अभी बाकी


अब तक गिरफ्तार आरोपियों में—
डॉ. प्रियंका सोनी,
महेंद्र मनहर,
गोविंद विश्वकर्मा,
हीराप्रसाद खांडेकर,
कुश कुमार गुप्ता,
नरेंद्र कौशिक,
हरिशंकर राठौर,
गरीबराम बिंझवार,
रामकुमार पाटनवार,
रामेश्वर भास्कर
सहित कई आरोपी शामिल हैं।
पुलिस ने दावा किया है कि गिरोह संगठित तरीके से काम कर रहा था।
लेकिन जांच का सबसे संवेदनशील हिस्सा अभी शेष माना जा रहा है।
क्या राजपत्रित अधिकारियों तक पहुंचेगी जांच?
यही वह प्रश्न है जिसने पूरे मामले को नया आयाम दे दिया है।
राजस्व विभाग की प्रक्रिया में पटवारी से लेकर तहसीलदार और एसडीएम तक कई स्तरों पर परीक्षण और अभिमत शामिल रहता है।
यदि जांच में यह पाया जाता है कि फर्जी दस्तावेजों के बावजूद प्रकरण आगे बढ़े, तो यह भी देखा जाएगा कि कहीं किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी, लापरवाही या अन्य अनियमितता तो नहीं हुई।
फिलहाल इस संबंध में किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है और न ही किसी राजपत्रित अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की आधिकारिक घोषणा की गई है। अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।
थाना स्तर की जांच… क्या पर्याप्त है?
पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इतनी व्यापक प्रकृति के इस प्रकरण की जांच फिलहाल थाना स्तर पर चल रही है।
क्योंकि यह मामला स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, राजस्व विभाग, बैंकिंग प्रणाली और आपदा राहत तंत्र से जुड़ा है, इसलिए प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या व्यापक और निष्पक्ष जांच के लिए किसी उच्च स्तरीय एजेंसी या अलग प्रशासनिक जांच की आवश्यकता है।
अब तक शासन की ओर से ऐसी किसी जांच की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
क्या राजस्व न्यायालय भी गुमराह हुआ?
जांच का एक नया पहलू यह भी है कि यदि कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर राजस्व न्यायालय से मुआवजा आदेश प्राप्त किए गए, तो यह भी जांच का विषय होगा कि क्या न्यायिक प्रक्रिया को मिथ्या दस्तावेजों के माध्यम से प्रभावित किया गया।
पुलिस इस दिशा में भी दस्तावेजों की पड़ताल कर रही है।
लिपिक संघ का सवाल—पूछताछ सिर्फ कर्मचारियों से क्यों?
तहसील कर्मचारियों की गिरफ्तारी के विरोध में लिपिक संघ ने एक दिन की हड़ताल की।
संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी ने आरोप लगाया कि कार्रवाई एकतरफा दिखाई दे रही है और संबंधित तहसीलदारों तथा एसडीएम स्तर के अधिकारियों से पूछताछ तक नहीं की गई।
उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग की है।
लोखंडी शराब कांड की याद फिर क्यों आई?
फरवरी 2025 में लोखंडी गांव में जहरीली शराब से हुई मौतों के मामले में शुरुआती स्तर पर कुछ मौतों को सर्पदंश बताया गया था। बाद की जांच में वास्तविक कारण जहरीली शराब साबित हुआ।
इस पुराने मामले का उल्लेख इसलिए फिर हो रहा है क्योंकि मौत के कारण दर्ज करने और प्रशासनिक सत्यापन की प्रक्रिया पर पहले भी सवाल उठ चुके थे।
कलेक्टर का बयान… अब उसी पर टिकी नजर
कलेक्टर संजय अग्रवाल ने कहा है कि यदि किसी ने गलत मंशा से काम किया है तो “चाहे कोई भी हो, कार्रवाई होगी।”
अब इस बयान के बाद सबसे बड़ी निगाह इस बात पर है कि जांच का दायरा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कितना आगे बढ़ता है और क्या वह प्रशासनिक श्रृंखला के ऊपरी स्तर तक पहुंचता है।
एसएसपी का स्पष्ट संदेश

एसएसपी रजनेश सिंह का कहना है कि प्रारंभिक जांच में संगठित सिंडिकेट के संकेत मिले हैं। उन्होंने कहा है कि जांच में जिसकी भी संलिप्तता सामने आएगी, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
अब जांच के केंद्र में ये निर्णायक सवाल
शव की सूचना सबसे पहले किस स्तर से लीक होती थी?
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर कैसे हुई?
फर्जी पटवारी प्रतिवेदन किस स्तर पर तैयार हुए?
तहसील स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार हुआ?
एसडीएम तक पहुंचने वाले प्रकरणों की जांच कितनी गहन थी?
सरकारी राशि जारी होने से पहले सत्यापन की प्रक्रिया में क्या-क्या जांच हुई?
क्या राजस्व न्यायालय के समक्ष कथित फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए गए?
क्या जांच अब राजपत्रित अधिकारियों तक पहुंचेगी?
क्या शासन अलग प्रशासनिक जांच या किसी विशेष एजेंसी से जांच कराने पर विचार करेगा?
जांच का दायरा हो बड़ा
यह घोटाला अब केवल फर्जी पोस्टमार्टम, डॉक्टरों या कर्मचारियों की गिरफ्तारी की कहानी नहीं रह गया है। जांच का अगला चरण प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी माना जा रहा है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यदि जांच का दायरा आगे बढ़ता है, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित अनियमितताएं केवल निचले स्तर तक सीमित थीं या प्रशासनिक प्रक्रिया के अन्य स्तरों की भूमिका भी जांच के दायरे में आती है। फिलहाल इसका अंतिम उत्तर जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

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