बाढ़ प्रभावित इलाकों में बुलेट से पहुंचे बेलतरा विधायक, लेकिन रिकॉर्ड बारिश ने खड़ा किया बड़ा सवाल—90-100 करोड़ की सफाई, करोड़ों की नालियां… फिर भी क्यों डूब गया बिलासपुर? क्या अब ‘जवाली नाला मॉडल’ ही है भविष्य का समाधान?
बिलासपुर। रिकॉर्ड बारिश के बाद बाढ़ में तब्दील हुए सरकंडा और बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में शनिवार को बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला बुलेट मोटरसाइकिल से पहुंचे। लोगों ने उन्हें घेरकर जलभराव, बदहाल ड्रेनेज और वर्षों से चली आ रही निकासी की समस्या बताई। राहत और हालात का जायजा लेने के बाद अब लोगों की उम्मीदें एक बड़े फैसले पर टिक गई हैं। सवाल यह है कि क्या ‘बुलेट राजा’ कहलाने वाले विधायक सुशांत शुक्ला सरकंडा के लिए ‘मास्टर ड्रेनेज सिस्टम’ की लड़ाई लड़ेंगे?


















क्योंकि इस बार की बारिश ने साफ कर दिया है कि समस्या सिर्फ नालियों की सफाई की नहीं, बल्कि पूरे ड्रेनेज सिस्टम के फेल होने की है।
सरकंडा अब गांव नहीं, लाखों आबादी वाला शहर है… लेकिन निकासी आज भी पुरानी
सरकंडा पिछले एक दशक में बिलासपुर का सबसे तेजी से विकसित होने वाला इलाका बन चुका है। नई कॉलोनियां, अपार्टमेंट, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और लगातार बढ़ती आबादी ने इस क्षेत्र का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है।
लेकिन विकास की इस रफ्तार के साथ जल निकासी की कोई समानांतर व्यवस्था विकसित नहीं हुई।
नतीजा…
रिकॉर्ड बारिश हुई और बंधवापारा, जोरापारा, वसंत विहार, इंदिरा विहार, अशोक नगर, चांटीडीह सहित पूरा इलाका घंटों पानी में डूबा रहा।
क्या सरकंडा को भी चाहिए ‘जवाली नाला’?
बिलासपुर शहर का जवाली नाला वर्षों से शहर का सबसे बड़ा प्राकृतिक ड्रेनेज कॉरिडोर है, जो विभिन्न क्षेत्रों का पानी समेटकर अरपा नदी तक पहुंचाता है।
अब शहरी योजनाकारों और स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि तेजी से फैलते सरकंडा क्षेत्र के लिए भी जवाली नाला की तर्ज पर एक नया मास्टर ड्रेनेज कॉरिडोर बनाया जाना चाहिए।
यदि अभी योजना नहीं बनी तो भविष्य में हर बड़ी बारिश अर्बन फ्लड में बदल सकती है।
करोड़ों खर्च… लेकिन सिस्टम क्यों बैठ गया?
नगर निगम हर साल—
नालियों के निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च करता है।
बड़े नालों के निर्माण पर भारी बजट खर्च होता है।
नालियों और नालों की सफाई के लिए भी करोड़ों रुपए का भुगतान किया जाता है।
सफाई व्यवस्था पर हर वर्ष लगभग 90 से 100 करोड़ रुपए खर्च होने की चर्चा रहती है।
फिर भी…
एक रात की बारिश ने पूरे सिस्टम की हकीकत सामने ला दी।
सिर्फ बारिश नहीं… सवाल जवाबदेही का भी है
शहर में अब सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर—
नालियां समय पर साफ क्यों नहीं हुईं?
पानी की निकासी कहां रुक गई?
जिन नालों की सफाई पर भुगतान हुआ, वे ओवरफ्लो क्यों हो गए?
प्री-मानसून तैयारियों की मॉनिटरिंग किसने की?
सोशल मीडिया पर नगर निगम की कार्यप्रणाली और सफाई व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
सिंडिकेट की चर्चाएं… लेकिन जांच जरूरी
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि वार्डों की सफाई और नालियों के रखरखाव में ठेका व्यवस्था को लेकर कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यदि इस तरह की शिकायतें हैं तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
अब विधायक सुशांत शुक्ला के सामने सबसे बड़ा एजेंडा
बाढ़ का निरीक्षण हो चुका है।
अब जरूरत है—
सरकंडा के लिए मास्टर ड्रेनेज प्लान बनाने की।
प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को पुनर्जीवित करने की।
जहां जरूरत हो वहां जवाली नाला मॉडल पर बड़े ड्रेनेज कॉरिडोर विकसित करने की।
अतिक्रमण हटाकर पानी के प्राकृतिक रास्ते बहाल करने की।
ड्रेनेज नेटवर्क का वैज्ञानिक सर्वे और हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन कराने की।
प्रत्येक वार्ड की प्री-मानसून ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करने की।
जनता के सवाल, जिनका जवाब जरूरी
ढाई साल में कितने सफाई ठेकेदारों पर कार्रवाई हुई?
कितनों पर जुर्माना लगाया गया?
कितने भुगतान रोके गए?
करोड़ों खर्च होने के बाद भी शहर क्यों डूबा?
भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या रोडमैप है?
सबसे बड़ा संदेश
बाढ़ का पानी उतर जाएगा, लेकिन इस बारिश ने एक स्थायी संदेश छोड़ दिया है—बिलासपुर अब पुराने ड्रेनेज सिस्टम के भरोसे नहीं चल सकता।
बुलेट पर बाढ़ का मुआयना करने वाले बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती राहत बांटना नहीं, बल्कि सरकंडा को ऐसा “मास्टर ड्रेनेज सिस्टम” दिलाना है, जो आने वाली पीढ़ियों को हर मानसून में जलप्रलय झेलने से बचा सके।
यदि अभी योजना बनी, तो यह विकास की नई शुरुआत होगी; यदि नहीं, तो हर रिकॉर्ड बारिश के बाद यही तस्वीरें और यही सवाल फिर सामने होंगे।



