एक लाख से अधिक शिक्षकों की पूर्व सेवा गणना का मामला, शासन के आदेश को बताया न्यायालय की भावना के विपरीत
बिलासपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ में संविलियन पूर्व सेवा को पेंशन में शामिल करने की मांग को लेकर शिक्षक संगठनों और राज्य शासन के बीच विवाद एक बार फिर गहरा गया है। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 9 जून 2026 को जारी आदेश में विभिन्न याचिकाओं के आधार पर प्रस्तुत अभ्यावेदनों को अमान्य किए जाने के बाद छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन ने इसे उच्च न्यायालय के निर्देशों की भावना के विपरीत बताते हुए सक्षम न्यायालय में पुनः चुनौती देने की घोषणा की है।
संघ का कहना है कि पूर्व सेवा अवधि को पेंशन योग्य सेवा में जोड़ने की मांग वर्षों से लंबित है और इस संबंध में आंदोलन, ज्ञापन, प्रदर्शन तथा न्यायालयीन प्रक्रिया लगातार जारी है। संगठन के अनुसार प्रदेश के एक लाख से अधिक शिक्षक, जिनकी नियुक्तियां वर्ष 1998 से 2018 के बीच हुई थीं, संविलियन पूर्व सेवा की गणना नहीं होने से पूर्ण पेंशन के लाभ से वंचित हैं।
प्रदेश अध्यक्ष संजय शर्मा ने कहा कि शासन ने जो आदेश जारी किया है, वह कोई नया लाभ देने वाला निर्णय नहीं है बल्कि पूर्व में जारी संविलियन संबंधी निर्देशों को ही दोहराता है। उनका कहना है कि बड़ी राहत तब मानी जाती जब पूर्व सेवा को पेंशन हेतु मान्यता देने का आदेश जारी होता। चूंकि शासन का रुख पूर्ववत बना हुआ है, इसलिए संगठन व्यापक रणनीति के साथ विधिक संघर्ष जारी रखेगा।
उच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला
संघ के पदाधिकारियों का दावा है कि उच्च न्यायालय की एकल पीठ तथा बाद में डबल बेंच ने मामले में शासन को न्यायोचित निर्णय लेने के निर्देश दिए थे। संगठन का आरोप है कि विभाग ने अभ्यावेदन निरस्त करते समय उन टिप्पणियों और सिद्धांतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया, जिनमें संविलियन पूर्व सेवा, सेवा की निरंतरता तथा पेंशन को कल्याणकारी अधिकार के रूप में देखा गया था।
शिक्षक नेताओं का कहना है कि विभाग ने अपने आदेश में क्रमोन्नति तथा आयु-सीमा छूट से जुड़े पुराने न्यायिक मामलों का उल्लेख किया है, जबकि उनका संबंध पेंशन विवाद से अलग प्रकृति का है।
2028 के बाद भी रहेगा असर
संघ के अनुसार यदि पूर्व सेवा अवधि को पेंशन योग्य सेवा में नहीं जोड़ा गया तो बड़ी संख्या में शिक्षक बिना पूर्ण पेंशन के सेवानिवृत्त होंगे। आने वाले वर्षों में भी कई शिक्षकों को आंशिक पेंशन की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
आगे क्या?
शिक्षक संगठन ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं से कानूनी राय लेना शुरू कर दिया है। संगठन का कहना है कि यदि आवश्यक हुआ तो शासन के आदेश को चुनौती देते हुए पुनः उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा। वहीं सरकार की ओर से जारी आदेश में पूर्व सेवा को पेंशन में शामिल करने की मांग को स्वीकार नहीं किया गया है, जिससे यह मामला एक बार फिर न्यायिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ गया है।
संघ ने स्पष्ट किया है कि पूर्व सेवा अवधि को पेंशन योग्य सेवा में शामिल कराने की मांग को लेकर आंदोलन और कानूनी लड़ाई दोनों आगे भी जारी रहेंगे।

