मोहम्मद इसराइल बब्लू बिलासपुर।
नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) की बैठक में सोमवार को जो कुछ हुआ, वह केवल चेंबर, बदबू या बैठने की व्यवस्था का विवाद नहीं था। यह उस राजनीतिक असंतोष का सार्वजनिक विस्फोट था, जो पिछले कई महीनों से सत्ता पक्ष के भीतर सुलग रहा था। विकास कार्यों और करोड़ों की परियोजनाओं पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक देखते ही देखते आरोप, प्रत्यारोप, व्यक्तिगत टिप्पणियों और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बन गई।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि मेयर पूजा विधानी ने कुछ सदस्यों को “निष्क्रिय” क्यों कहा, बल्कि यह है कि उस एक शब्द ने सत्ता पक्ष के भीतर दबे असंतोष को किस तरह सतह पर ला दिया।
एमआईसी की बैठक में तिलक साहू ने जब दूसरी बार चेंबर और बैठने की व्यवस्था का मुद्दा उठाया तो शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि मामला इतनी दूर तक जाएगा। लेकिन मेयर के इस कथन कि “अधिकांश सदस्य निष्क्रिय हैं, आते नहीं हैं और आते हैं तो घूम-फिरकर चले जाते हैं”, ने पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक मोड़ दे दिया।
बंधु मौर्य का जवाब केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं था। उनका यह कहना कि “यदि हम निष्क्रिय होते तो चुनाव कैसे जीतते, आप भी हमारे कारण जीतकर मेयर बनी हैं”, सत्ता पक्ष के भीतर मौजूद उस सोच का संकेत था जिसमें कई पार्षद खुद को संगठन और चुनावी जीत का वास्तविक आधार मानते हैं, जबकि निर्णय लेने की शक्ति कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होने का आरोप लगाते हैं।
क्या निगम में बन चुका है “इनर सर्किल”?
बैठक के दौरान बार-बार यह आरोप उभरा कि कुछ चुनिंदा एमआईसी सदस्यों को बेहतर सुविधाएं, बेहतर चेंबर और अधिक महत्व दिया जा रहा है, जबकि बाकी सदस्यों को हाशिये पर रखा गया है।
तिलक साहू की शिकायत कि कुछ सदस्यों के लिए व्यवस्थित चेंबर हैं और बाकी को बदबूदार तथा अनुपयोगी स्थानों में बैठना पड़ता है, केवल भौतिक व्यवस्था का सवाल नहीं था। यह सत्ता के वितरण और राजनीतिक महत्व को लेकर असंतोष का प्रतीक बनकर सामने आया।
निगम के गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि निर्णय प्रक्रिया में कुछ चुनिंदा चेहरे प्रभावी हैं, जबकि बाकी सदस्य केवल औपचारिक भूमिका तक सीमित होते जा रहे हैं। सोमवार की बैठक में यह नाराजगी खुलकर सामने आ गई।
विकास एजेंडा पीछे, वर्चस्व की लड़ाई आगे
विडंबना यह रही कि जिस बैठक में 5.38 करोड़ रुपए की सड़क परियोजना, करोड़ों के विकास कार्य, व्यापार अनुज्ञापन नियम, आंगनबाड़ी पदोन्नति, सड़क नामकरण और अधोसंरचना विस्तार जैसे विषय एजेंडे में थे, वहां सबसे ज्यादा चर्चा चेंबर, निष्क्रियता और राजनीतिक सम्मान को लेकर हुई।
सवाल यह भी उठा कि क्या निगम की राजनीति अब विकास के मुद्दों से ज्यादा व्यक्तिगत वर्चस्व और राजनीतिक पहचान के संघर्ष में उलझती जा रही है?
बैठक में मौजूद कई सदस्यों ने बजट और विकास कार्यों को लेकर भी अप्रत्यक्ष असंतोष जताया। एलईडी स्ट्रीट लाइट के लिए बजट नहीं होने के तर्क पर जब सदस्यों ने आपत्ति दर्ज कराई तो यह केवल वित्तीय सवाल नहीं था, बल्कि प्राथमिकताओं को लेकर भी असहमति का संकेत था।
अफसर भी घेरे में, सिस्टम पर भी सवाल
एमआईसी की बैठक केवल मेयर और पार्षदों की नोकझोंक तक सीमित नहीं रही। अधिकारियों की कार्यशैली भी निशाने पर रही।
एमआईसी सदस्य प्रकाश यादव ने निगम आयुक्त के पीए पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आम पार्षदों की फाइलें दबाई जा रही हैं और केवल प्रभावशाली लोगों के काम आगे बढ़ाए जा रहे हैं।
उधर, इंदु चौक के सील किए गए भवन, अवैध निर्माण, ओयो संचालन और डेयरी भूमि के कथित दुरुपयोग जैसे मुद्दों पर भी अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया गया।
सबसे तीखी टिप्पणी तब सामने आई जब सभापति विनोद सोनी ने कथित रूप से सील लगाने और खोलने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे “वसूली का खेल” तक बता दिया। यह टिप्पणी केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे अमले की कार्यप्रणाली पर गंभीर राजनीतिक अविश्वास का संकेत थी।
भाजपा के भीतर समन्वय का संकट?
नगर निगम की वर्तमान सत्ता संरचना भाजपा के नियंत्रण में है, लेकिन सोमवार की बैठक ने यह संकेत जरूर दिया कि भीतरखाने सब कुछ सामान्य नहीं है।
मेयर और एमआईसी सदस्यों के बीच संवाद की कमी, निर्णयों को लेकर असहमति, संसाधनों के वितरण पर नाराजगी और सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे को चुनौती देने की प्रवृत्ति राजनीतिक पर्यवेक्षकों का ध्यान खींच रही है।
इससे पहले भी एमआईसी बैठकों में विवाद की स्थिति बन चुकी है और कई बार वरिष्ठ नेताओं को हस्तक्षेप करना पड़ा है। सोमवार का घटनाक्रम इस बात का संकेत माना जा रहा है कि मतभेद अब केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रह गए हैं।
17 प्रस्ताव मंजूर, लेकिन चर्चा विवादों की
बैठक में अंततः सभी 17 प्रस्तावों को मंजूरी मिल गई। चांटीडीह मोड़ से रामसेतु तक सड़क चौड़ीकरण, डिवाइडर निर्माण, दिव्यांग अनुकूल फुटपाथ, स्ट्रीट लाइट और अन्य विकास कार्यों को हरी झंडी मिल गई। सुभाष चौक से वेयरहाउस चौक तक सड़क का नाम डॉ. वेंसी रेलुमल तिर्थानी के नाम पर रखने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई।
लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो बैठक की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रस्तावों की स्वीकृति नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर मौजूद असंतोष का सार्वजनिक प्रदर्शन रहा।

