
करोड़ों के सुशासन के दावों पर कलेक्ट्रेट में ही तमाचा: अफसरों की प्राथमिकता वीआईपी मेकअप, आम आदमी की जानकारी भगवान भरोसे
बिलासपुर। मुख्यमंत्री के संभावित दौरे ने एक बार फिर प्रशासन की असली कार्यशैली उजागर कर दी है। कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मंथन सभा कक्ष को लाखों रुपए खर्च कर चमकाने-संवारने का काम युद्धस्तर पर कराया जा रहा है, लेकिन उसी कलेक्ट्रेट गेट के पास लगा सिटिजन चार्टर बोर्ड जंग खाकर बदहाल हालत में खड़ा है। विडंबना देखिए, जिस लोक सेवा गारंटी अधिनियम को लेकर सरकार और मुख्य सचिव बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, उसकी जानकारी देने वाला बोर्ड ही प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है।
यह तस्वीर सिर्फ एक बोर्ड की नहीं, बल्कि उस सरकारी सोच की है जिसमें जनता बाद में और वीआईपी व्यवस्था पहले आती है। मुख्यमंत्री के आने की भनक मिलते ही पेंट-पॉलिश, सफाई, सजावट और दिखावे पर सरकारी मशीनरी टूट पड़ती है, लेकिन आम नागरिकों को उनके अधिकार बताने वाला सिटिजन चार्टर सालों से बदरंग और जर्जर पड़ा रहता है।
1. वीआईपी संस्कृति में डूबा प्रशासन, जनता का अधिकार बना मजाक
कलेक्ट्रेट परिसर में प्रवेश करते ही सबसे पहले नागरिकों को सरकारी सेवाओं की जानकारी देने वाला सिटिजन चार्टर नजर आना चाहिए, ताकि लोगों को पता चल सके कि कौन-सी सेवा कितने दिन में मिलेगी और देरी होने पर किस अधिकारी की जवाबदेही तय होगी। लेकिन बिलासपुर कलेक्ट्रेट में यह बोर्ड खुद प्रशासन की लापरवाही की गवाही देता दिख रहा है।
लोहे पर जंग, उखड़े अक्षर और बदहाल स्थिति साफ बता रही है कि प्रशासन के लिए लोक सेवा गारंटी सिर्फ फाइलों और बैठकों तक सीमित है।
2. दूसरी तरफ लाखों की चमक-दमक, ताकि दौरे में सब “परफेक्ट” दिखे
मुख्यमंत्री के संभावित प्रवास को लेकर मंथन सभा कक्ष में रंगरोगन, फर्नीचर सुधार, सजावट और अन्य व्यवस्थाओं पर लाखों रुपए बहाए जा रहे हैं। अफसरों की पूरी ऊर्जा इस बात में लगी है कि दौरे के दौरान कोई कमी दिखाई न दे।
सवाल यह है कि क्या प्रशासन का काम सिर्फ वीआईपी विजिट के दौरान चमकना है? अगर यही पैसा और गंभीरता आम नागरिक सुविधाओं पर दिखाई जाती तो शायद सिटिजन चार्टर की यह दुर्दशा नहीं होती।
3. मुख्य सचिव की सख्ती जमीन पर बेअसर

प्रदेश के मुख्य सचिव श्री विकासशील लगातार लोक सेवा गारंटी अधिनियम को लेकर गंभीरता दिखा रहे हैं। अप्रैल 2026 में मंत्रालय महानदी भवन में आयोजित समीक्षा बैठक में उन्होंने साफ निर्देश दिए थे कि जनता से जुड़ी सभी सेवाओं को लोक सेवा गारंटी अधिनियम के दायरे में लाया जाए और सेवाएं तय समय सीमा में उपलब्ध कराई जाएं।
उन्होंने यह भी कहा था कि देरी होने पर संबंधित अधिकारी जिम्मेदार होंगे और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन देने की बात भी कही गई थी।
बैठक में सुशासन एवं अभिसरण विभाग द्वारा विभिन्न राज्यों के मॉडल का अध्ययन, विभागीय सेवाओं की मैपिंग और अधिक सेवाओं को अधिनियम में शामिल करने पर जोर दिया गया था। गृह, पंचायत, नगरीय प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, राजस्व सहित तमाम विभागों के वरिष्ठ अधिकारी बैठक में मौजूद थे।
लेकिन बिलासपुर कलेक्ट्रेट की तस्वीर इन दावों पर सीधा सवाल खड़ा कर रही है। जब जिला मुख्यालय के सबसे महत्वपूर्ण सरकारी परिसर में ही लोक सेवा गारंटी की जानकारी देने वाला बोर्ड जंग खा रहा हो, तो गांव-कस्बों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
4. “सुशासन” का पोस्टर चमकदार, व्यवस्था अंदर से जर्जर
सरकार सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बातें कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग कहानी कहती है। लोक सेवा गारंटी अधिनियम का उद्देश्य था कि आम आदमी को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें और समय पर सेवाएं मिलें।
लेकिन बिलासपुर में स्थिति उलट दिखाई दे रही है। यहां सरकारी तंत्र जनता को अधिकार बताने के बजाय अफसरशाही की चमक बनाए रखने में ज्यादा व्यस्त दिख रहा है।
5. सवाल जो प्रशासन से जवाब मांग रहे
क्या सिटिजन चार्टर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है?
क्या प्रशासन को जनता के अधिकारों से ज्यादा चिंता वीआईपी विजिट की है?
क्या लोक सेवा गारंटी अधिनियम सिर्फ बैठकों और प्रेस रिलीज तक सीमित रहेगा?
आखिर आम आदमी को जानकारी देने वाले बोर्ड की सुध लेने की फुर्सत अफसरों को क्यों नहीं मिली?
6. जनता देख रही है “मेकअप मॉडल” प्रशासन
बिलासपुर में यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े दौरे से पहले सरकारी दफ्तरों में अचानक सौंदर्यीकरण शुरू हुआ हो। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार प्रशासन की प्राथमिकता और जनता के अधिकारों के बीच का विरोधाभास खुलेआम दिखाई दे रहा है।
एक तरफ करोड़ों के सुशासन के दावे, दूसरी तरफ जंग खाया सिटिजन चार्टर… यह तस्वीर बताने के लिए काफी है कि सिस्टम में “दिखावे का विकास” ज्यादा तेज है ।

