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सुशासन के दावों पर अंधेरे का वार… चिचिरदा में 4 दिन से बिजली गुल

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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ट्रांसफार्मर में लगी आग, तार जलते रहे… अफसरों ने नहीं उठाया फोन; गर्मी में बेहाल ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी
चिचिरदा। एक तरफ सरकार सुशासन और बेहतर बुनियादी सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर से कुछ किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत चिचिरदा का चिचिरदा आवास पारा पिछले चार दिनों से अंधेरे में डूबा हुआ है। मंगलवार शाम आए आंधी-तूफान के बाद से गांव की बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और शुक्रवार शाम तक भी हालात सामान्य नहीं हो सके हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक बिजली कभी-कभार कुछ मिनटों के लिए आती है और फिर अचानक बंद हो जाती है। लगातार बिजली कटौती के कारण गांव में जनजीवन पूरी तरह प्रभावित हो गया है। बच्चों की पढ़ाई ठप हो चुकी है, गर्मी में लोगों का घरों में रहना मुश्किल हो गया है और रोजमर्रा के कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।


ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि बिजली विभाग की लापरवाही के कारण स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। उनका कहना है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद न तो अधिकारी मौके पर पहुंचे और न ही फोन उठाने की जरूरत समझी। गांव में फैले आक्रोश के बीच लोगों का कहना है कि विभाग पूरी तरह बेखबर बना हुआ है।


स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि क्षेत्र में घटिया गुणवत्ता के तार और ट्रांसफार्मर लगाए गए हैं, जिसके चलते बार-बार तार जलने और ट्रांसफार्मर फुंकने की घटनाएं हो रही हैं। ग्रामीणों के अनुसार हाल ही में तारों और ट्रांसफार्मर में आग लगने की घटनाएं सामने आईं, जिससे बड़ा हादसा होने का खतरा भी बना रहा।
ग्रामीणों का कहना है कि विडंबना यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे बिजली उत्पादन करने वाले राज्य में ही गांव अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। उनका सवाल है कि जब एक छोटे से गांव की बिजली व्यवस्था चार दिनों में भी दुरुस्त नहीं हो पा रही, तो सुशासन के दावों का आखिर मतलब क्या है?
गांव में बढ़ते आक्रोश के बीच लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द बिजली व्यवस्था बहाल नहीं की गई तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ बिजली संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और सिस्टम की विफलता का उदाहरण है।
चिचिरदा गांव की तस्वीरें अब सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिम्मेदार अफसर कब जागेंगे और अंधेरे में डूबे इस गांव को कब राहत मिलेगी।

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