बिलासपुर। बिलासपुर जिले के तारबाहर थाना क्षेत्र विनायक होम्स निवासी बिल्डर राजेश सेठ के ऑफिस में तोड़फोड़ और जान से मारने की धमकी के मामले में पुलिस की लापरवाही उजागर हुई है। शिकायत दर्ज कराने के बावजूद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई नहीं की। घटना का सीसीटीवी फुटेज होने के बावजूद एफआईआर 20 दिन बाद, एसपी के हस्तक्षेप के बाद दर्ज की गई।
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घटना का विवरण:
तारीख: 9 नवंबर
समय: रात 10 बजे
स्थान: विनायक होम्स, तारबाहर
पीड़ित: राजेश सेठ (बिल्डर)
हमलावर: दो नकाबपोश बदमाश
तोड़फोड़ और धमकी:
बिल्डर राजेश सेठ अपने दोस्त सतीश पांडेय और कर्मचारी रंजीत के साथ ऑफिस में मौजूद थे। इसी दौरान दो नकाबपोश बदमाश ईंट और रॉड लेकर ऑफिस में घुसे और जमकर तोड़फोड़ की। हमलावरों ने राजेश सेठ को जान से मारने की धमकी भी दी।
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शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं
राजेश सेठ ने घटना की सूचना तारबाहर थाने में दी और सबूत के तौर पर सीसीटीवी फुटेज भी सौंपे। वीडियो में हमलावर स्पष्ट रूप से तोड़फोड़ करते दिखाई दे रहे थे। इसके बावजूद पुलिस ने न तो मौके पर जांच की, न ही एफआईआर दर्ज की।
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एसपी के हस्तक्षेप से दर्ज हुई FIR
थाने में लगातार चक्कर लगाने के बावजूद जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो राजेश सेठ ने एसपी रजनेश सिंह से शिकायत की। एसपी के निर्देश पर मामला दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हुई। हालांकि, इस दौरान थाना प्रभारी ने पीड़ित को ही आरोपी बनाने की कोशिश की।
आखिरकार, घटना के 20 दिन बाद पुलिस ने अज्ञात हमलावरों के खिलाफ FIR दर्ज की।
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प्रमुख सवाल:
1. पुलिस की निष्क्रियता क्यों?
घटना के बाद भी FIR दर्ज करने में देरी क्यों की गई?
2. न्याय में देरी:
सीसीटीवी फुटेज जैसे स्पष्ट सबूतों के बावजूद कार्रवाई में 20 दिन क्यों लगे?
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कानूनी प्रक्रिया:
FIR दर्ज करने का अधिकार: भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 154 के तहत, किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर पुलिस को तुरंत FIR दर्ज करनी होती है।
सीसीटीवी फुटेज: यह एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है। पुलिस का इसे अनदेखा करना लापरवाही की ओर इशारा करता है।
क्या होना चाहिए
1. तय हो पुलिस की जवाबदेही
लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
2. पीड़ितों के अधिकार:
यदि पुलिस शिकायत दर्ज न करे, तो पीड़ित को एसपी या न्यायालय का रुख करना चाहिए।
3. सख्त कदम की जरूरत
यह घटना पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है। यदि एसपी का हस्तक्षेप न होता, तो शायद मामला दर्ज ही न होता। न्याय व्यवस्था में ऐसी लापरवाहियों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाना जरूरी है।




