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बिलासपुर के इस ऑपरेशन थिएटर से उठता हरित संदेश, सिम्स का ‘ग्रीन एनेस्थीसिया’ मॉडल बदल रहा इलाज का इकोसिस्टम

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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बिलासपुर।
स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ते कार्बन फुटप्रिंट के बीच छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स), बिलासपुर ने उपचार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम उठाया है। “ग्रीन एनेस्थीसिया” की अवधारणा को अपनाते हुए सिम्स न केवल मरीजों को सुरक्षित बेहोशी प्रदान कर रहा है, बल्कि ऑपरेशन थिएटर से निकलने वाले हानिकारक गैस उत्सर्जन को भी नियंत्रित करने की दिशा में काम कर रहा है।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया भर में हेल्थकेयर सेक्टर के पर्यावरणीय प्रभाव पर गंभीर चर्चा हो रही है और सर्जरी के दौरान उपयोग होने वाली गैसों को जलवायु परिवर्तन के छिपे हुए कारकों में गिना जा रहा है।
एनेस्थीसिया गैसें: अदृश्य लेकिन गंभीर पर्यावरणीय चुनौती
ऑपरेशन के दौरान उपयोग की जाने वाली गैसें, जैसे डेसफ्लुरेन और नाइट्रस ऑक्साइड, ग्रीनहाउस गैसों की श्रेणी में आती हैं। इनका प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना अधिक माना जाता है।
ये गैसें लंबे समय तक वातावरण में बनी रहती हैं और हर वर्ष होने वाली बड़ी संख्या में सर्जरी के कारण इनका उत्सर्जन वैश्विक तापमान वृद्धि में योगदान देता है। चिकित्सा जगत में अब इन गैसों के उपयोग को लेकर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
चिकित्सकों की सुरक्षा भी केंद्र में
एनेस्थीसिया का प्रभाव केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। जहां एक मरीज को ऑपरेशन के दौरान सीमित समय के लिए एनेस्थीसिया दिया जाता है, वहीं एनेस्थीसिया विशेषज्ञ चिकित्सक दिनभर में 10 से 12 घंटे तक लगातार कई सर्जरी में इन गैसों के संपर्क में रहते हैं।
लगातार एक्सपोजर के कारण लंबे समय में उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है। इस संदर्भ में ग्रीन एनेस्थीसिया न केवल पर्यावरणीय बल्कि व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण पहलू बनकर उभर रहा है।
क्या है ‘ग्रीन एनेस्थीसिया’ का कॉन्सेप्ट
ग्रीन एनेस्थीसिया एक ऐसी पद्धति है जिसमें मरीज को सुरक्षित और प्रभावी बेहोशी देने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को न्यूनतम करने का प्रयास किया जाता है। इसका फोकस टिकाऊ (sustainable) और जिम्मेदार स्वास्थ्य सेवाओं के विकास पर है।
सिम्स में अपनाए जा रहे प्रमुख उपाय
1. टी.आई.वी.ए. (Total Intravenous Anesthesia)
इस तकनीक में प्रोपोफोल और मिडाज़ोलम जैसी दवाओं को इंट्रावेनस तरीके से दिया जाता है। इससे गैस आधारित एनेस्थीसिया पर निर्भरता कम होती है और पर्यावरणीय प्रभाव भी घटता है।
2. लो फ्लो एनेस्थीसिया तकनीक
कम मात्रा में गैस का उपयोग कर सुरक्षित एनेस्थीसिया देना इस तकनीक का मुख्य आधार है। इससे गैस की खपत और ऑपरेशन थिएटर से बाहर होने वाला प्रदूषण दोनों नियंत्रित होते हैं।
3. आधुनिक उपकरणों का उपयोग
उन्नत मशीनों और मॉनिटरिंग सिस्टम के माध्यम से गैस लीकेज को नियंत्रित किया जा रहा है, जिससे ऑपरेशन थिएटर के बाहर हानिकारक उत्सर्जन कम हो रहा है।
4. किफायती और प्रभावी प्रणाली
यह पद्धति केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित हो रही है, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो पा रहा है।
विशेषज्ञों की राय
डॉ. मधुमिता मूर्ति, विभागाध्यक्ष (एनेस्थीसिया विभाग), सिम्स
ग्रीन एनेस्थीसिया के तहत गैसों का सीमित और नियंत्रित उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है। इससे मरीज को सुरक्षित और प्रभावी एनेस्थीसिया मिलता है, साथ ही पर्यावरण में हानिकारक गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है।
डॉ. रमणेश मूर्ति, अधिष्ठाता (डीन), सिम्स
निश्चेतना में उपयोग होने वाली गैसों का अत्यधिक प्रयोग ग्लोबल वार्मिंग और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ग्रीन एनेस्थीसिया के जरिए इन दुष्प्रभावों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है, और सिम्स इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।

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