Latest news

90 साल की उम्र में चमत्कारिक वापसी: सिम्स बिलासपुर में बुजुर्ग महिला के कूल्हे का जटिल प्रत्यारोपण, अगले ही दिन पैरों पर खड़ी हुई मरीज

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
4 Min Read

बिलासपुर।
उम्र जब 90 के पार हो और कूल्हे की हड्डी सड़क दुर्घटना में बुरी तरह चकनाचूर हो जाए, तब चलना-फिरना दोबारा संभव हो पाना अपने-आप में चिकित्सा जगत की बड़ी चुनौती मानी जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के शासकीय चिकित्सा संस्थान सिम्स बिलासपुर में आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञों के अनुभव और सटीक टीमवर्क ने इस चुनौती को ऐतिहासिक सफलता में बदल दिया। यहां अस्थि रोग विभाग ने लंबे स्टेम वाले मॉड्यूलर बाइपोलर कृत्रिम कूल्हा प्रत्यारोपण के जरिए 90 वर्षीय इंडिया बाई को न सिर्फ नई हड्डी दी, बल्कि उन्हें दोबारा चलने की क्षमता भी लौटा दी।

सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुई इंडिया बाई के बाएं कूल्हे की हड्डी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। अत्यधिक उम्र और जटिल फ्रैक्चर के कारण स्थिति बेहद नाजुक थी। परिजन उन्हें तत्काल सिम्स के अस्थि रोग विभाग लेकर पहुंचे, जहां वरिष्ठ अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. तरुण सिंह की देखरेख में उपचार शुरू किया गया।

डॉ. तरुण सिंह के अनुसार, इस उम्र में कूल्हे के फ्रैक्चर का सामान्य तरीके से जुड़ पाना लगभग असंभव होता है। ऐसे मरीजों को लंबे समय तक बिस्तर पर रहना पड़ता है, जिससे संक्रमण, कमजोरी, फेफड़ों की समस्या, बेड सोर और अन्य जटिलताएं तेजी से बढ़ सकती हैं। मरीज की उम्र, हड्डियों की स्थिति और समग्र स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. बेन के मार्गदर्शन में एक विशेष सर्जिकल योजना तैयार की गई।

विशेषज्ञ टीम ने उन्नत तकनीक का उपयोग करते हुए लंबे स्टेम वाला मॉड्यूलर बाइपोलर कृत्रिम कूल्हा प्रत्यारोपण किया। सर्जरी के दौरान टीबीडब्ल्यू तकनीक अपनाई गई और हड्डी को अतिरिक्त मजबूती देने के लिए एन्क्लेज वायरिंग की गई, ताकि इम्प्लांट स्थिर रहे और मरीज जल्द से जल्द वजन सहन कर सके। यह सर्जरी तकनीकी दृष्टि से अत्यंत जटिल मानी जाती है, खासकर इतनी अधिक उम्र के मरीज में।

ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा। सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी असाधारण रूप से तेज रही और अगले ही दिन इंडिया बाई अपने पैरों पर खड़ी होकर चलने लगी। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इस आयु वर्ग में सर्जरी के तुरंत बाद चल पाना दुर्लभ उपलब्धि मानी जाती है, जो उपचार की गुणवत्ता और तकनीक की सटीकता को दर्शाती है।

इस जटिल ऑपरेशन में एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. मधुमिता मूर्ति एवं उनकी टीम की भूमिका भी निर्णायक रही। उच्च जोखिम वाले मरीज को सुरक्षित एनेस्थीसिया प्रदान करना और ऑपरेशन के दौरान स्थिर स्थिति बनाए रखना बड़ी चुनौती थी, जिसे टीम ने कुशलता से संभाला। वहीं ऑपरेशन के दौरान और पश्चात नर्सिंग इंचार्ज योगेश्वरी सिस्टर ने मरीज की सतत निगरानी और देखभाल में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सर्जरी के लिए आवश्यक विशेष इम्प्लांट की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने में चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह और डीन डॉ. रमणेश. मूर्ति का विशेष सहयोग रहा। संस्थान स्तर पर समन्वय और त्वरित निर्णय प्रक्रिया ने इस उपचार को संभव बनाया।

इस उपलब्धि पर अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि सिम्स में आधुनिक चिकित्सा तकनीक और अनुभवी चिकित्सकों की संयुक्त कार्यप्रणाली के कारण जटिल से जटिल सर्जरी भी सफलतापूर्वक की जा रही है। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने भी इसे संस्थान की चिकित्सा सेवाओं, टीमवर्क और संसाधनों की सशक्त मिसाल बताया।

खबर को शेयर करने के लिए क्लिक करे।।