




बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में रविवार की शाम ख़ास बन गई . ये रिवायती ग़ज़लों की खुशनुमां महफ़िल थी . बिलासपुर की प्रख्यात ग़ज़ल गायिका श्रुति प्रभला ने ग़ज़ल गायिकी की विशिष्ट धारा- “रिवायत” को अपनी सुरीली और रूहानी अंदाज़ में महफ़िल को कुछ इस तरह सजाया कि “दिल तो क्या रूह-ए-फ़न को भी गरमा गई, ज़हन का दर खुला तो ग़ज़ल आ गई”. श्रुति ने अल्लामा इकबाल, जावेद कुरैशी, नासिर काज़मी, फैज़ अहमद फैज़, अहमद फ़राज़, पहलाज लखनवी और मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें सुनाईं और ग़ज़ल-गायकी के नए आयाम स्थापित किये .
मूलतः शास्त्रीय गायिका और भजन व ग़ज़ल गायिकी में निष्णात श्रुति ने कहा भी- “रिवायती गज़लों का हर शेर अपने में एक याद, एक एहसास और एक अनकहा सच समेटे होता है . इनमें मोहब्बत की नर्मी भी होती है, जुदाई का दर्द, और ज़िंदगी का सफ़रनामा भी होता है . ये ग़ज़लें सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि रूह की आवाज़ होती हैं, ये आवाज़ कभी दिल को सुकून देती हैं, तो कभी पुराने ज़ख़्मों को हल्के से छूकर फिर से जगा देती हैं. तो कभी मोहब्बत का मीठा अहसास दिलाती है” .
ग़ज़ल की इस खूबसूरत महफ़िल “रिवायत” को भोपाल से आये अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सारंगी वादक उस्ताद हनीफ़ हुसैन, तबले पर जनाब शाहनवाज़ हुसैन और सिंथेसाइजर पर जनाब शाहीद मासूम की संगत ने और भी सुरमयी बना दिया .
श्रुति की ग़ज़ल गायकी के हर अंदाज़ को श्रोताओं ने खूब सराहा . श्रुति ने परवीन शाक़िर का एक शेर पढ़ा- “मेरे पास से जो गुज़रा मेरा हाल तक न पूछा, मैं कैसे मान जाऊँ के वो दूर जा के रोया”. जवाब में श्रुति ने तत्काल अहमद फ़राज़ का दूसरा शेर पढ़ा- “ तेरे पास से जो गुज़रे तो जुनूं में थे फ़राज़,जो दूर जाके सोचा तो ज़ार-ज़ार रोए”. श्रुति ने आगे सुनाया कि “ये भी क्या कम है कि दोनों का भरम क़ायम है, उसने बख़्शिश नहीं की, हमने गुज़ारिश नहीं की”…इसके बाद श्रुति ने बिलकुल इसी मूड की नूरजहाँ सरवत की एक ग़ज़ल को स्वर-विस्तार दिया- “वो एक नज़र में मुझे पहचान गया है, जो बीती है दिल में मेरे, सब जान गया है”.
भरी महफ़िल में जब श्रुति ने अल्लामा इकबाल की इश्क, सब्र, और रूहानी तड़फ से लबरेज कालजयी ग़ज़ल “तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूं, मेरी सादगी देख क्या चाहता हूं”…की पेशकश को अपनी संजीदा आवाज़ दी तो ग़ज़ल-प्रेमी श्रोता वाह-वाह कर उठे . उस्ताद वसीम अहमद खान साहब की शागिर्द श्रुति के श्रुत-संसार को श्रोताओं ने अपनी पलकों में बिठा लिया .
“रिवायत” में श्रुति ने एक दर्जन से भी ज्यादा ग़ज़लों को समेटा . पूरी शास्त्रीयता के साथ उन्होंने ग़ज़ल-गायकी को प्रस्तुत किया . उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अवयवों को भी अपनी गायकी में पिरोया और शास्त्रीय राग-रागनियों को अपनी साधना, मौलिकता और मधुरता के साथ ग़ज़ल-गायकी में पेश कर नए प्रयोग किये .
श्रुति की गाईं मिर्जा ग़ालिब की गहरे भावों वाली मशहूर ग़ज़ल “नुक़्ता-चीं है, ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहां, बात बनाए न बने” को ग़ज़ल-प्रेमियों ने खूब सराहा .
इसके बाद तो श्रुति ने ग़ज़लों की झड़ी लगा दी . जावेद क़ुरैशी- “दिल जलाने की बात करते हो, आशियाने की बात करते हो, सारी दुनिया के रंज-ओ-ग़म दे कर, मुस्कुराने की बात करते हो”, नासिर काज़मी- “नीयत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं, तू भी दिल से उतर न जाए कहीं”, फैज़ अहमद फैज़- “तुम आए हो न शब-ए-इंतज़ार गुज़री है, तलाश में है सहर बार-बार गुज़री है” जैसे शेरो से सजी ग़ज़लों ने खूब समां बांधा .
“रिवायत” प्रोग्राम में श्रुति ने शायरों और ग़ज़लों के चयन में ख़ास एहतियात बरती . उन्होंने गंभीर और अर्थपूर्ण गज़लों का ही चुनाव किया और उसे पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत कर सभी के सुनने और समझने योग्य बना दिया .
रिवायत प्रोग्राम दीप प्रज्ज्वलन की औपचारिकता के साथ शुरू हुआ . बिलासपुर के अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के कुलपति और संगीत-प्रेमी आचार्य अरुण दिवाकर नाथ वाजपेयी की अगुवाई में श्रुति और उनके साथ मौजूद संगतकारों ने दीप-ज्योति प्रज्जवलित की . कार्यक्रम में मौजूद विशिष्ट श्रोताओं ने गायक और वादक कलाकारों का सम्मान किया . आखिर में डॉ विश्वेश ठाकरे ने उपस्थित श्रोता समुदाय के प्रति आभार प्रदर्शन किया . कार्यक्रम का ओजस्वी संचालन विवेक जोगलेकर ने किया .
इस मौके पर डॉ सतीश जायसवाल, डॉ देवेन्द्र सिंह, अशोक ऋषि, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, डॉ बी आर होतचंदानी, जगदीश दुआ, उज़मा अख्तर, शुभदा जोगलेकर, किरण पाल सिंह चावला, राजेश अग्रवाल, डॉ सुदिप्तो दत्ता, अनुपम बर्डे, राजेश दुआ, विक्रम देव, मनोज राय, सुनील चिपड़े सहित अनेक सुधि ग़ज़ल-प्रेमी श्रोता सपरिवार मौजूद थे .



