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प्रकृति का दुर्लभ तोहफा…11 साल बाद बारनवापारा में लौटा ‘ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन-पिजन’, बर्ड सर्वे के दौरान कैमरे में कैद

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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रायपुर ,बिलासपुर।
रायपुर के बारनवापारा अभयारण्य ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ के जंगल जैव विविधता के मजबूत गढ़ बने हुए हैं। वर्षों से लुप्त मानी जा रही दुर्लभ पक्षी प्रजाति ‘ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन-पिजन’ की पुनः उपस्थिति ने न सिर्फ पक्षी प्रेमियों को उत्साहित किया है, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि अभयारण्य का पारिस्थितिकी तंत्र अब भी संवेदनशील और संतुलित है।


11 वर्षों बाद ऐतिहासिक वापसी
हाल ही में बारनवापारा अभयारण्य में आयोजित बर्ड सर्वे के दौरान दुर्लभ ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन-पिजन (Treron bicinctus) की साइटिंग दर्ज की गई। यह वही प्रजाति है, जिसे इससे पहले वर्ष 2015-16 में प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ ए.एम.के. भरोस द्वारा देखा गया था। इसके बाद लंबे समय तक इस पक्षी की कोई पुष्टि नहीं हो सकी थी, जिससे इसे इस क्षेत्र में लगभग अनुपस्थित माना जाने लगा था।
पकरीद टीम को मिली बड़ी सफलता
इस दुर्लभ पक्षी की मौजूदगी पकरीद टीम द्वारा दर्ज की गई। टीम में अनुभवी बर्डर और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर राजू वर्मा और प्रतीक ठाकुर सहित कर्नाटक, बिहार और ओडिशा से आए विशेषज्ञ शामिल थे।
सर्वे के दौरान अचानक टीम के ठीक ऊपर पेड़ पर इस पक्षी का एक जोड़ा बैठा नजर आया। उड़ान भरने से पहले टीम ने न केवल इसकी स्पष्ट पहचान की, बल्कि विस्तृत फोटोग्राफी और वीडियो रिकॉर्डिंग भी करने में सफलता हासिल की।
क्यों है यह साइटिंग खास
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी दुर्लभ प्रजाति का वर्षों बाद दोबारा दिखाई देना उस क्षेत्र के वन स्वास्थ्य और खाद्य श्रृंखला की मजबूती को दर्शाता है।
ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन-पिजन मुख्य रूप से अंजीर और जंगल के रसीले फलों पर निर्भर रहता है। इसकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि बारनवापारा में फलदार वृक्षों और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता अब भी संतुलित है।
भारत से दक्षिण-पूर्व एशिया तक विस्तार
यह पक्षी भारत के कुछ हिस्सों और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है। इसे एक निवासी प्रजाति माना जाता है, जो लंबी दूरी का प्रवास नहीं करता, बल्कि स्थानीय मौसमी बदलावों के अनुरूप अपनी गतिविधियां संचालित करता है।
छत्तीसगढ़ के अन्य वन क्षेत्रों में इसकी मौजूदगी समय-समय पर दर्ज होती रही है, लेकिन बारनवापारा में इसकी वापसी को विशेष उपलब्धि माना जा रहा है।
हरियल से कैसे अलग है यह दुर्लभ पक्षी
सर्वे टीम ने इसकी पहचान इसकी विशिष्ट शारीरिक बनावट के आधार पर की—
नीली-धूसर गर्दन
पीले-हरे रंग का सिर और निचला शरीर
लाल रंग के पैर
स्लेटी-धूसर केंद्रीय पूंछ पंख
सबसे महत्वपूर्ण पहचान नर पक्षी के सीने पर मौजूद गहरा नारंगी पैच है, जो इसे आमतौर पर दिखने वाले येलो-फुटेड ग्रीन-पिजन (हरियल) से स्पष्ट रूप से अलग करता है।
कैमरे में कैद, संरक्षण की उम्मीद
कई वर्षों बाद इस दुर्लभ प्रजाति का कैमरे में कैद होना न केवल फोटोग्राफर्स के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह बारनवापारा अभयारण्य में पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण और जैव विविधता की निरंतरता का मजबूत प्रमाण भी माना जा रहा है।
वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए यह साइटिंग आने वाले समय में संरक्षण प्रयासों को और मजबूत करने की प्रेरणा बन सकती है।

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