मोहम्मद इसराइल बबलू
बिलासपुर जिले में धान खरीदी की शुरुआत उस अव्यवस्था की तस्वीर बनकर सामने आई, जहां सरकारी दावों की चमक पहले ही दिन बिखर गई। किसानों के इंतजार, खाली पड़ी समितियों और ताले पड़े खरीदी केंद्रों के बीच प्रशासनिक लापरवाही इतनी गहरी दिखी कि पूरे जिले में सिर्फ दो किसानों का 90 क्विंटल धान खरीदा गया।
बिलासपुर।
धरातल पर खरीदी व्यवस्था का सच शुक्रवार को उस समय उजागर हो गया, जब जिले की ज्यादातर समितियों में ताले लटके रहे और किसान धान लेकर आए ही नहीं। समिति प्रबंधक और कंप्यूटर ऑपरेटरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने सरकार के धान खरीदी शुरू करने के दावे को सीधे चुनौती दे दी। नतीजा यह हुआ कि पूरे बिलासपुर में सिर्फ सेंदरी समिति खोलकर औपचारिकता निभाई गई, जहां केवल दो किसानों से 90 क्विंटल धान खरीदा गया।
सरकार ने 15 नवंबर से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी शुरू करने का ऐलान किया था, लेकिन अपनी चार सूत्रीय मांगों पर अड़े समिति प्रबंधक और ऑपरेटरों की हड़ताल ने पूरे जिले की व्यवस्था ठप कर दी। कई केंद्रों में अधिकारी मौजूद थे, लेकिन किसान पहुंचे ही नहीं। ऑनलाइन टोकन 11 नवंबर से जारी हो गए थे, पर किसानों ने टोकन कटवाने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि हड़ताल के कारण खरीदी का माहौल ही संदिग्ध था, ऐसे में वे धान लेकर केंद्रों तक क्यों जाएं।
सेंदरी में उप मुख्यमंत्री अरुण साव और विधायक सुशांत शुक्ला मौजूद रहे। कछार के किसान रामकुमार साहू ने 22 क्विंटल और अनंतराम ने 68 क्विंटल धान बेचकर खरीदी की शुरुआत करवाई, लेकिन तस्वीर में भीड़ गायब थी। सरकारी मंच तो सजा, पर किसान नदारद रहे।
विपणन विभाग डेटा एंट्री ऑपरेटरों की व्यवस्था भी नहीं कर सका। कई समितियों में कंप्यूटर तक नहीं खुल सके, जिससे खरीद का पूरा ढांचा अव्यवस्थित पड़ा रहा। दूसरी ओर, कैशलेस एडवांस भुगतान सुविधा, जिसे पिछले साल लागू किया गया था, इस बार उपलब्ध नहीं थी। किसान खाली हाथ लौटते रहे।
अधिकारी स्तर पर भी स्थिति उलझी रही। कई केंद्रों पर अधिकारी घंटों बैठे रहे, लेकिन कोई किसान पहुंचा ही नहीं। जिला सहकारी बैंक के सीईओ प्रभात मिश्रा ने स्वीकार किया कि सिर्फ एक समिति में खरीद हुई और बाकी जगह पूरा दिन सन्नाटा छाया रहा।
शनिवार को जब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का बिलासपुर दौरा था, उसी दौरान धान खरीदी व्यवस्था से जुड़ी लापरवाहियों की तस्वीर और भयावह हो गई। खरीदी केंद्रों पर प्रशासन और मार्कफेड के बीच समन्वय की कमी साफ दिखती रही, जिससे किसान और अधिक नाराज हुए।
धान खरीदी के पहले दिन की अव्यवस्था ने जिले में सिस्टम की असलियत उजागर कर दी—और किसानों के बीच गुस्से का माहौल बढ़ गया।



