00 बिलासपुर के मस्तूरी क्षेत्र में पांचवी कक्षा के छात्र ने मोबाइल की लत के कारण खुदकुशी कर ली

बिलासपुर।छत्तीसगढ़ में मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग और डिजिटल प्लेटफॉर्म की लत ने बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाला है। पिछले कुछ वर्षों में, राज्य में किशोर आत्महत्या के मामलों में चिंताजनक वृद्धि देखी गई है, जिनमें से कई घटनाएं मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से जुड़ी हैं। इसी कड़ी में बुधवार को बिलासपुर जिले के मसूरी क्षेत्र में पांचवी कक्षा के एक छात्रा ने मोबाइल की लत में परेशान होकर खुदकुशी कर ली है।

पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार तीन भाइयों के पास एक ही मोबाइल था, जिसे चलाने को लेकर उनके बीच विवाद हुआ। इससे महाराज पांचवी कक्षा के छात्र और 11 साल के बालक ने अपनी जान दे दी। जिस समय यह घटना हुई, उस समय उसके माता-पिता काम करने खेत गए थे। घटना पचपेड़ी थाना क्षेत्र की है।
ग्राम जोंधरा निवासी संतोष केंवट पेशे से किसान है। उनके तीन बेटे हैं। जिसमें 11 साल का कबीर केंवट सबसे छोटा बेटा था। है। वह कक्षा पांचवीं का छात्र था। चंद्रप्रकाश केंवट बड़ा और उसका एक मंझला भाई है। बुधवार की सुबह संतोष और उसकी पत्नी तीनों बच्चों को स्कूल जाने बोलकर काम करने खेत चले गए।
स्कूल नहीं गया छोटा बेटा कबीर
माता-पिता के खते जाने के बाद बड़ा बेटा चंद्र प्रकाश और उसका मंझला भाई स्कूल चले गए। वहीं, कबीर स्कूल नहीं गया और घर में अकेला रुक गया।
अंदर कमरे में फंदे पर लटक रहा था कबीर
जब दोपहर 1.30 बजे चंद्र प्रकाश स्कूल से लौटा, तो दरवाजा अंदर से बंद मिला। उसने दरवाजा खोलने के लिए आवाज दिया। लेकिन, अंदर से कोई आवाज नहीं आई। इस पर उसने खिड़की से झांककर देखा तो कबीर का शव फंदे पर लटक रहा था।
मोबाइल चलाने को लेकर हुआ था विवाद
छोटे भाई को फंदे पर लटकते देखकर वह घबरा गया। उसने तत्काल इस घटना की जानकारी अपने पड़ोसियों को दी, जिसके बाद संतोष व उसकी पत्नी को लोगों ने बताया। वो भी दौड़ते-भागते घर पहुंच गए। इधर, घटना की सूचना मिलते ही पुलिस भी पहुंच गई। इस दौरान दरवाजा तोड़कर पुलिस कमरे में गई और शव को फंदे से उतारा। पूछताछ में पता चला कि तीनों भाइयों के पास एक ही मोबाइल था। इसे चलाने को लेकर आए दिन झगड़ा होता था। घटना से पहले भी झगड़ा हुआ था। फिलहाज, पुलिस मर्ग कायम कर मामले की जांच कर रही है।
आंकड़ों की भयावह तस्वीर
राज्य पुलिस और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में छत्तीसगढ़ में 1,200 से अधिक आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए, जिनमें 15% से अधिक घटनाओं में किशोर शामिल थे। इन घटनाओं में प्रमुख कारण मोबाइल फोन से उत्पन्न मानसिक तनाव, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन गेमिंग की लत और सोशल मीडिया पर अस्वीकृति रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों में अकेलेपन, अवसाद और असुरक्षा की भावना को बढ़ावा दे रहा है। बच्चे सोशल मीडिया पर ‘लाइक’ और ‘फॉलोअर्स’ की होड़ में मानसिक दबाव झेलते हैं। इसके अलावा, मोबाइल गेम्स और ऑनलाइन कंटेंट के नकारात्मक प्रभाव भी उनके मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को बिगाड़ रहे हैं।
हाल की घटनाएं
हाल ही में दुर्ग जिले में एक 16 वर्षीय किशोर ने ऑनलाइन गेम में पैसे हारने के बाद आत्महत्या कर ली। इसी प्रकार, रायपुर में 14 वर्षीय लड़की ने सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग से आहत होकर अपनी जान दे दी। ऐसी घटनाएं माता-पिता और समाज के लिए चेतावनी का संकेत हैं।छत्तीसगढ़ में मोबाइल के कारण किशोर आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह समय है जब परिवार, स्कूल और सरकार एकजुट होकर इस गंभीर समस्या का समाधान ढूंढें और बच्चों को सुरक्षित भविष्य प्रदान करें।
समस्याओं के कारण और समाधान
- मोबाइल का अत्यधिक उपयोग: बच्चों में स्क्रीन टाइम का बढ़ना पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
- ऑनलाइन गेमिंग: विशेष रूप से ‘पेड गेम्स’ बच्चों को आर्थिक नुकसान और तनाव में डालते हैं।
- सोशल मीडिया की लत: ‘डिजिटल फेम’ की चाहत और ट्रोलिंग से बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं।
- क्या है समाधान
परिवार की भूमिका: माता-पिता को बच्चों के मोबाइल उपयोग पर नियंत्रण रखना चाहिए और उनके साथ संवाद बढ़ाना चाहिए।
स्कूल और सरकार की पहल: स्कूलों में डिजिटल शिक्षा और साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।
सामाजिक समर्थन: बच्चों को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों प्लेटफॉर्म पर सकारात्मक माहौल प्रदान करना आवश्यक है।
मोबाइल की लत से बच्चों को दूर रखने के उपाय: विशेषज्ञों की राय
मोबाइल फोन आज के समय में बच्चों और किशोरों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इसके अत्यधिक उपयोग से बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए अभिभावकों और शिक्षकों को खास कदम उठाने की जरूरत है।
विशेषज्ञों की राय और सुझाव
- समय सीमा तय करें
डॉ. ए तिवारी (मनोचिकित्सक) का कहना है कि बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करना बेहद जरूरी है।
5-16 वर्ष के बच्चों को दिन में 1-2 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम नहीं दिया जाना चाहिए।
रात को सोने से 1-2 घंटे पहले मोबाइल का उपयोग बंद करना अनिवार्य बनाएं।
- डिजिटल डिटॉक्स की आदत डालें
बाल मनोवैज्ञानिक के अनुसार सप्ताह में एक दिन “डिजिटल फ्री डे” अपनाना चाहिए।
इस दिन मोबाइल, टीवी और अन्य डिजिटल डिवाइस से दूरी बनाई जाए।
परिवार के साथ आउटडोर गतिविधियों और खेलकूद को बढ़ावा दें।
- अभिभावकों का उदाहरण महत्वपूर्ण
चाइल्ड काउंसलर के अनुसार, बच्चे अपने माता-पिता की आदतों की नकल करते हैं।
माता-पिता को खुद भी मोबाइल के सीमित उपयोग का उदाहरण स्थापित करना चाहिए।
परिवार के साथ खाना खाने और बातचीत के दौरान मोबाइल का उपयोग न करें।
- बच्चों को रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखें
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को पढ़ाई के अलावा कला, संगीत, नृत्य और खेलकूद जैसी रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए।
यह न केवल उनका ध्यान मोबाइल से हटाएगा बल्कि उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत भी सुधारेगा।
- मोबाइल पर निगरानी रखें
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ नीरज गुप्ता का सुझाव है कि बच्चों के मोबाइल पर माता-पिता को निगरानी रखनी चाहिए।
बच्चों के लिए “पैरेंटल कंट्रोल” सेट करें।
यह सुनिश्चित करें कि बच्चे केवल सुरक्षित और शिक्षाप्रद सामग्री ही देखें।
- संवाद बढ़ाएं
काउंसलिंग manovaigyanik का मानना है कि बच्चों के साथ संवाद बढ़ाने से उनकी समस्याओं को समझा जा सकता है।
यदि बच्चा मोबाइल का अत्यधिक उपयोग करता है, तो उसे डांटने के बजाय उसकी समस्या को समझने का प्रयास करें।
बच्चों को यह समझाएं कि मोबाइल का सीमित उपयोग उनके भविष्य के लिए बेहतर है।
समाज और स्कूल की भूमिका
स्कूलों में “डिजिटल लिटरेसी” और “साइबर सेफ्टी” पर वर्कशॉप आयोजित की जानी चाहिए।
सामुदायिक स्तर पर आउटडोर खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करें।बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि परिवार, स्कूल और समाज एकजुट होकर ठोस कदम उठाएं। विशेषज्ञों के सुझाए गए उपाय न केवल बच्चों को स्वस्थ जीवन जीने में मदद करेंगे, बल्कि उनके उज्जवल भविष्य को भी सुनिश्चित करेंगे।



