48 घंटे में दो जुआ पकड़, लेकिन एक विज्ञप्ति में बाप का नाम तक और दूसरी में सिर्फ ‘बिलासपुर निवासी’ — क्या यह कानून की समानता है या पहचान की सुविधा?
मोहम्मद इसराइल बबलू | बिलासपुर
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पुलिस ने 48 घंटे के भीतर दो जुआ कांड पकड़े — एक में आरोपी ‘देवराज यादव पिता चैतराम यादव, उम्र 22, साकिन कुदुदंड’ तक की पूरी डिटेल जारी की गई, और दूसरे में सिर्फ इतना बताया गया कि “14 व्यक्ति बिलासपुर निवासी हैं।”
दोनों कार्रवाई सिविल लाइन थाने की हैं। फर्क बस इतना कि पहली विज्ञप्ति में तस्वीर “उजली” थी — यानी हर आरोपी की पहचान साफ, मोहल्ला तक दर्ज।
जबकि दूसरी विज्ञप्ति में तस्वीर “धुंधली” — न उम्र, न पिता का नाम, न पता — बस ‘बिलासपुर निवासी’।
अब सवाल उठता है कि क्या कानून की रोशनी भी अब पहचान देखकर तय की जाती है?
धुंधली तस्वीर का मामला – जीनस पैलेस का हाई प्रोफाइल जुआ फड़

दिनांक 25 अक्टूबर की रात सिविल लाइन पुलिस ने महाराणा प्रताप चौक स्थित जीनस पैलेस में छापा मारा।
यहाँ 14 हाई प्रोफाइल जुआरी रंगे हाथ पकड़े गए।
सूत्र बताते हैं कि यह कोई सामान्य फड़ नहीं था — शहर के कई राजनैतिक चेहरे, व्यवसायी और क्लब मेंबर यहाँ मौजूद थे।
पुलिस ने मौके से ₹2.17 लाख नगद और ताश की गड्डियां जब्त कीं।
एफआईआर दर्ज हुई — अपराध क्रमांक 1274/25, धारा 3(2) जुआ अधिनियम के तहत।
परंतु, प्रेस विज्ञप्ति में केवल इतना लिखा गया —
“सभी आरोपी बिलासपुर निवासी हैं।”
ना पिता का नाम, ना पता, ना उम्र — जैसे कानून भी यह सोच रहा हो कि “कहीं पहचान उजागर न हो जाए।”

उजली तस्वीर – 48 घंटे पहले वही थाना, वही कानून, लेकिन पूरा बायोडाटा

सिर्फ दो दिन पहले, 23 अक्टूबर की रात, इसी सिविल लाइन थाना क्षेत्र में एक और जुआ फड़ पकड़ा गया था।
इस बार पुलिस ने प्रेस विज्ञप्ति में ऐसा पारदर्शी डेटा जारी किया कि आरोपी के पंप हाउस के पास रहने से लेकर DJ के पास तक का पता दिया गया।
कुल 6 जुआरी पकड़े गए — उम्र, पिता का नाम, पूरा पता सहित सूची जारी की गई।
यानि एक विज्ञप्ति में “जनहित में सूचना”, और दूसरी में “सुरक्षित गोपनीयता”।

जुआ कानून एक, व्यवहार दो – आखिर पुलिस किसके प्रति सजग?
छत्तीसगढ़ जुआ अधिनियम की धारा 3(2) दोनों मामलों में समान है, मगर पारदर्शिता का मापदंड अलग।
पहले में आम लोगों के नाम सार्वजनिक, दूसरे में प्रभावशाली नाम सुरक्षित।
यह वही पुलिस है जो पिछले महीने “गायब मोबाइल” की बरामदगी पर प्रेस नोट में तस्वीरें साझा करती थी,
पर इस बार तस्वीरें धुंधली हैं — शायद “रिश्तों की रोशनी” अधिक चकाचौंध कर रही है।
प्रशासन की पारदर्शिता या चुनिंदा गोपनीयता?
बिलासपुर पुलिस का यह विरोधाभास सिर्फ एक प्रेस विज्ञप्ति का मामला नहीं —
यह सवाल है उस “प्रशासनिक ईमानदारी” का,
जहाँ अपराध समान है, लेकिन सूचना का स्तर अलग।
कानून सबके लिए समान होना चाहिए,
मगर लगता है कि प्रेस विज्ञप्ति का फार्मेट अब आरोपी की पहचान देखकर तय होता है।
पुलिसिंग की Photoshop नीति”
एक ने सोशल मीडिया पर लिखा —
पुलिस अब फोटोशॉप मोड में काम कर रही है —
छोटे आरोपियों की फोटो HD में और बड़े वालों की रिपोर्ट Soft Blur में।”
दूसरे यूजर ने कमेंट किया —
“यह प्रेस विज्ञप्ति नहीं, पीआर विज्ञप्ति लगती है।”
क्या जनता भरोसा करे ऐसी ‘Selective Transparency’ पर?
पुलिस की साख जनता के भरोसे पर टिकी होती है।
अगर दो दिनों के भीतर एक ही थाने से दो विपरीत किस्म की सूचनाएँ जारी हों,
तो यह साफ है कि पारदर्शिता अब ‘कानूनी दायित्व’ नहीं, बल्कि ‘रणनीतिक विकल्प’ बन चुकी है।
बिलासपुर पुलिस ने एक ही हाथ से दो तस्वीरें खींचीं —
एक में पहचान चमक रही थी,
दूसरी में पहचान छिपाई गई थी।
फर्क बस इतना था कि पहली तस्वीर में आम लोग थे,
और दूसरी में “विशेष” लोग।
स्थान: बिलासपुर (छ.ग.)
तारीख: 25 अक्टूबर 2025
रिपोर्ट: mohammed israil



