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छत्तीसगढ़ के सरकारी डॉक्टरों ने किया चमत्कार : 10 वर्षीय बच्ची की आंख से दिमाग तक धंसी घंटी, चार घंटे की सर्जरी में बचाई जान और आंख दोनों — अब सरकारी अस्पतालों में भी संभव है वर्ल्ड-क्लास इलाज

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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बिलासपुर, रायपुर।मोहम्मद इसराइल बबलू

दिवाली की रात जब देशभर में रोशनी और खुशियां बिखरी थीं, उसी समय छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की टीम ने जीवन बचाने की एक अनोखी मिसाल पेश की। बिलासपुर की 10 वर्षीय मासूम काव्या खेलते समय अचानक घंटी पर मुंह के बल गिर गई, जिससे घंटी का नुकीला हैंडल उसकी बाईं आंख से होकर सीधे दिमाग में धंस गया। स्थिति इतनी गंभीर थी कि पलभर की देरी भी जानलेवा साबित हो सकती थी।

21 अक्टूबर को न्यूज़ डॉन छत्तीसगढ़ में प्रकाशित खबर।
न्यूरोसर्जन, डॉ राजीव साहू।


काव्या को तत्काल सिम्स, बिलासपुर मेडिकल कॉलेज लाया गया, जहां चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद उसे बेहतर न्यूरोसर्जिकल सुविधा के लिए डीकेएस सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, रायपुर रेफर किया। यहां पहुंचते ही न्यूरोसर्जरी विभाग के एचओडी डॉ. राजीव साहू और न्यूरोसर्जन डॉ. लवलेश राठौड़ ने केस की गंभीरता को समझते हुए तुरंत ऑपरेशन की तैयारी शुरू कर दी।
चार घंटे चली जटिल सर्जरी — बची आंख और जिंदगी दोनों
डॉ. राजीव साहू ने बताया —
“बच्ची की आंख के रास्ते घंटी का सिरा सीधे ब्रेन टिशू में चला गया था। खतरा बहुत बड़ा था — ब्रेन हैमरेज, मिर्गी या पैरालिसिस तक की आशंका थी। हमने निर्णय लिया कि सर्जरी एंडोस्कोपिक तकनीक से की जाएगी ताकि दिमाग के ऊत्तकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचे।”
सर्जरी करीब चार घंटे तक चली। इसमें डॉ. लवलेश राठौड़, डॉ. नमन चंद्राकर, डॉ. देवश्री और नेत्र विशेषज्ञ डॉ. प्रांजल मिश्रा की टीम शामिल रही। दिमाग और आंख के बीच फंसी 11 सेंटीमीटर लंबी घंटी को सावधानीपूर्वक निकाला गया।
ऑपरेशन के बाद जब बच्ची ने दोनों आंखों से साफ देखा और मुस्कुराई — तो पूरे ऑपरेशन थिएटर में राहत और खुशी की लहर दौड़ गई।
“बिल्कुल चमत्कार जैसा केस था” – डॉ. लवलेश राठौड़
“यह सर्जरी न सिर्फ तकनीकी रूप से कठिन थी, बल्कि भावनात्मक रूप से भी चुनौतीपूर्ण थी। बच्ची की आंख और दिमाग दोनों को बचाना डॉक्टरों की टीम के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।”
बिलासपुर सिम्स और डीकेएस टीम की समन्वित कोशिश
इस पूरे ऑपरेशन की सफलता में सिम्स, बिलासपुर मेडिकल कॉलेज के डीन और अधीक्षक डॉ. शिप्रा, उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा, और उनके स्टाफ की त्वरित प्रतिक्रिया अहम रही। उन्होंने गंभीर स्थिति को समझते हुए तुरंत डीकेएस रेफरल की व्यवस्था की और मरीज की जान बचाने के लिए हर जरूरी कदम उठाया।
राज्य के सरकारी अस्पतालों के बीच यह समन्वय अब स्वास्थ्य सेवा की नई पहचान बन रहा है।
सरकारी अस्पतालों में अब “वर्ल्ड-क्लास” इलाज
यह सफलता केवल एक बच्ची की नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की चिकित्सा प्रणाली के आत्मविश्वास की कहानी है।
डीकेएस और सिम्स जैसे सरकारी अस्पताल अब आधुनिक उपकरणों, कुशल विशेषज्ञों और अत्याधुनिक तकनीकों से सुसज्जित हैं। यहां न सिर्फ राज्य के मरीज बल्कि अन्य राज्यों और विदेशों से भी लोग इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
राज्य शासन द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार, डॉक्टरों की नियुक्ति, और सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं के विस्तार ने छत्तीसगढ़ को चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी बना दिया है।
“सरकारी डॉक्टरों पर हमें गर्व है” — मरीज के परिजन
काव्या के परिजनों ने भावुक होते हुए कहा —
“हमें लगा अब कुछ नहीं बचा सकता, लेकिन डॉक्टरों ने हमारी बच्ची को दोबारा जिंदगी दी है। सरकारी अस्पताल में ऐसा इलाज मिलना किसी वरदान से कम नहीं।”
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के एंडोस्कोपिक ब्रेन सर्जरी देश के चुनिंदा सेंटर्स में ही होती है। डीकेएस, रायपुर का यह उदाहरण बताता है कि छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पताल अब आधुनिक चिकित्सा के स्तर पर देश के बड़े संस्थानों के बराबर खड़े हैं।
बिलासपुर की बच्ची के सिर में धंसी घंटी — रायपुर डीकेएस में सफल ऑपरेशन
4 घंटे चली जटिल सर्जरी, आंख और दिमाग दोनों सुरक्षित
सर्जरी का नेतृत्व डॉ. राजीव साहू और डॉ. लवलेश राठौड़ ने किया
सिम्स बिलासपुर और डीकेएस टीम के समन्वय से बची जान
सरकारी अस्पतालों में अब मिल रही विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधा
विदेशों से भी मरीज अब इलाज के लिए छत्तीसगढ़ आ रहे
यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि जब इच्छाशक्ति, विशेषज्ञता और समर्पण साथ हो — तो सरकारी अस्पताल भी ‘जीवन बचाने के चमत्कार’ कर सकते हैं।

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