मो इसराइल बबलू
बड़ा सवाल…“एक तरफ गांधी, दूसरी तरफ गिलास” – यही है जिले की नई विकास नीति
कलेक्टर ने दिलाई शपथ, आबकारी विभाग ने शुरू की दुकानों के विस्तार की कवायद
शराब शिफ्टिंग की आड़ में चल रही है “नई दुकान नीति”, जिला मंथन में खुली रणनीति की पोल
बिलासपुर।
गांधी जयंती के दिन जब जिला प्रशासन नशामुक्त समाज की शपथ ले रहा था, उसी दिन आबकारी विभाग शराब दुकानों के विस्तार की फाइलें पलट रहा था।
कलेक्टर ने “मद्यनिषेध सप्ताह” का शुभारंभ कर जनजागरूकता रथ को हरी झंडी दिखाई, वहीं मंथन सभाकक्ष में अधिकारी “नई जगहों पर शराब दुकान खोलने” की प्रक्रिया पर मुहर लगा रहे थे।
यानी जिले में अब ‘नशामुक्ति’ और ‘नशावृद्धि’ दोनों योजनाएं समानांतर चल रही हैं — फर्क बस विभाग का है।


मंथन सभाकक्ष में शिफ्टिंग के नाम पर विस्तार का मंथन
शुक्रवार को कलेक्ट्रेट स्थित मंथन सभाकक्ष में आबकारी विभाग की बैठक हुई।
अपर कलेक्टर शिव बेनर्जी और सहायक आबकारी आयुक्त नवनीत तिवारी की मौजूदगी में तय हुआ कि चांटीडीह, मस्तूरी, तखतपुर, मल्हार और सीपत की भीड़-भाड़ वाली शराब दुकानों को हटाया जाएगा।
पर अंदर की बात यह है कि शिफ्टिंग की इस प्रक्रिया में कई नए क्षेत्रों को भी “चिह्नित” किया जा रहा है, जहाँ अब तक शराब की दुकानें नहीं थीं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि
“जहाँ शराब दुकान हटाने की बात हो रही है, वहीं विभाग दूसरी ओर उसे बसाने की तैयारी कर रहा है। शिफ्टिंग नहीं, यह तो विस्तार की कवायद है।”
‘नई नीति’: पुरानी दुकानें हटाओ, नई जगह खोलो

आबकारी विभाग शिफ्टिंग को ढाल बनाकर नई लाइसेंसिंग प्रक्रिया शुरू करने जा रहा है।
घनी आबादी वाले क्षेत्रों से दुकानें हटाने के बाद उनकी जगह नई लोकेशन पर दुकानें खोली जा सकती हैं — यह दावा अधिकारियों के दस्तावेज़ों से साफ झलकता है।
यानी, जो दुकानें “कम करनी थीं”, वे अब “विस्तार” के रूप में लौटेंगी।
पचपेड़ी विवाद: जिस जमीन पर दुकान, वही विवादित
पचपेड़ी में चुनी गई नई शराब दुकान को लेकर ग्रामीणों में आक्रोश है।
आबकारी विभाग ने सुरेश खटकर की भूमि पर दुकान खोलने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन ग्रामीण विष्णु कुमार सोनी का आरोप है —
“आवेदन दूसरी जमीन का था, लेकिन आबकारी ने दुकान दूसरी जगह तय की। वह जमीन सरकारी भूमि पर कब्जे वाली है और चार समाजों के श्मशान के पास है।”
ग्रामीणों का सवाल है कि जहां श्रद्धा और संस्कार के स्थल हैं, वहीं अब नशे की दुकान क्यों?
गांधी की प्रतिमा के साये में “नई शराब नीति”
उधर, उसी दिन जिला कार्यालय परिसर में कलेक्टर संजय अग्रवाल ने मद्यनिषेध सप्ताह की शुरुआत की।
समाज कल्याण विभाग के प्रचार रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया, जो 8 अक्टूबर तक नशा मुक्ति का संदेश देगा।
कलेक्टर ने अधिकारियों-कर्मचारियों को ताउम्र नशापान से दूर रहने की शपथ भी दिलाई।
कार्यक्रम में गांधीजी के भजन गाए गए — “वैष्णव जन तो तेने कहिए…”
पर सवाल यह है कि जब ‘वैष्णव जन’ की बात चल रही थी, तब ‘आबकारी जन’ क्या सोच रहे थे?
विरोधाभास की नई परिभाषा : एक ओर शपथ, दूसरी ओर संकल्प
सरकारी दफ्तरों में इस समय दो समानांतर मुहिम चल रही हैं —
एक “मद्यनिषेध सप्ताह”, दूसरी “दुकान चयन सप्ताह”।
दोनों की फाइलें एक ही टेबल से गुजरती हैं — एक पर ‘शपथ पत्र’, दूसरी पर ‘लाइसेंस पत्र’।
यानी शासन का सूत्रवाक्य कुछ यूँ लगता है —
“शराबबंदी की बात करो, पर दुकानबंदी की नहीं।”
जनता का सवाल : ‘अगर शराब बुरी है, तो दुकानें क्यों जरूरी हैं?’
जिले में कई स्थानों पर लोग नई शराब दुकानों की अनुमति पर आपत्ति दर्ज कराने पहुंचे।
लोगों का कहना है कि शासन को तय करना चाहिए कि उसका लक्ष्य राजस्व बढ़ाना है या सामाजिक सुरक्षा देना।
गांधी जयंती के दिन इस तरह का विरोधाभास देखकर कई सामाजिक संगठनों ने भी सवाल उठाया —
“जहाँ एक ओर कलेक्टर शराब से दूरी की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर अधिकारी दुकानों की दूरी तय कर रहे हैं।”
मेरी बात….
बिलासपुर में यह दृश्य अब “विरोधाभास नहीं, व्यवस्था” बन चुका है।
एक विभाग नशे के खिलाफ अभियान चलाता है, दूसरा विभाग उसी नशे को राजस्व का जरिया बताता है।
सरकार की नीति अब साफ दिख रही है — “नशा बंद नहीं होगा, बस शिफ्ट होगा।”
- कुल 10 शराब दुकानों को “शिफ्ट” करने की प्रक्रिया जारी
- नई जगह चयन के बहाने कई नए इलाकों को चिन्हित किया गया
- पचपेड़ी, मल्हार, सीपत और तखतपुर में आपत्तियां दर्ज
- मद्यनिषेध सप्ताह का सरकारी आयोजन और प्रचार रथ जारी



