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छत्तीसगढ़ में बच्चों में बढ़ते एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम के मामलों ने बढ़ाई चिंता, सिम्स में शोध कार्य शुरू

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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Bilaspur Chhattisgarh बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के प्रमुख शासकीय चिकित्सा संस्थान सिम्स (सिम्स मेडिकल कॉलेज, बिलासपुर) के शिशुरोग विभाग में एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) से पीड़ित बच्चों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सिम्स के शिशुरोग एवं माइकोबायोलॉजी विभाग ने संयुक्त रूप से इस बीमारी के कारणों की पहचान और उपचार की दिशा में वैज्ञानिक शोध कार्य शुरू कर दिया है।


एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) एक गंभीर तंत्रिका रोग है, जो विशेष रूप से बच्चों को प्रभावित करता है और देश के कई राज्यों में समय-समय पर महामारी का रूप ले चुका है। छत्तीसगढ़ भी इस बीमारी की चपेट में है। बीते दो वर्षों में सिम्स के शिशुरोग विभाग में AES के कुल 133 मरीज भर्ती हुए, जिनमें से 82 मरीज एक वर्ष से कम उम्र के थे, 29 मरीज 1 से 5 वर्ष के, और 22 मरीज 5 वर्ष से अधिक आयु के थे।

इनमें से अधिकांश मरीज गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले से थे, जिसकी संख्या कुल मरीजों का लगभग 61% थी। इसके अतिरिक्त बिलासपुर, मुंगेली, कोरबा, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार, रायपुर सहित विभिन्न जिलों से भी बच्चे इलाज हेतु सिम्स में लाए गए।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन मरीजों में मृत्यु दर 51% पाई गई है, जो कि अत्यधिक है। विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि अधिकांश मामलों में इस बीमारी के सटीक कारण का पता नहीं चल पाता, जिससे उपचार में कठिनाई होती है।

इन्हीं कारणों को ध्यान में रखते हुए अब सिम्स के शिशुरोग विभाग एवं माइकोबायोलॉजी विभाग की टीम ने इस रहस्यमयी बीमारी पर गहराई से शोध शुरू कर दिया है। यह शोध डीन डॉ. रमणेश मूर्तिचिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह के मार्गदर्शन में संचालित हो रहा है।

शोध टीम में शामिल डॉक्टर:
शोध कार्य में शिशुरोग विभाग के डॉ. राकेश नहरेल, डॉ. समीर कुमार जैन, डॉ. वर्षा तिवारी, डॉ. पूनम अग्रवाल, डॉ. अभिषेक कलवानी, डॉ. अंकिता चन्द्राकर, डॉ. सलीम खलखो और डॉ. रेखा बारापात्रे सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही माइकोबायोलॉजी विभाग की टीम इस दिशा में सहयोग कर रही है।

बीमारी के संभावित कारण:
भारत में AES का प्रमुख कारण जापानी एन्सेफलाइटिस वाइरस (Japanese Encephalitis Virus) माना जाता है। इसके अलावा इंफ्लुएंजा ए वायरस, डेंगू वायरस, पार्वोवायरस B19, एपस्टीन-बार वायरस, तथा एस. न्यूमोनिया जैसे बैक्टीरिया भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
फंगस, विषैले रसायन, परजीवी और ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाएं भी मस्तिष्क में सूजन पैदा कर सकती हैं, जिससे यह बीमारी उत्पन्न होती है।

लक्षण और खतरे:
AES के मरीजों में आमतौर पर तेज बुखार, सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, झटके (सीज़र), अर्धचेतना की स्थिति देखी जाती है। कई बार स्थिति कोमा तक पहुंच जाती है और मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है।

पूर्व शोध और उम्मीदें:
ज्ञात हो कि पूर्व में सिम्स में जापानी एन्सेफलाइटिस वाइरस पर अलग से शोध कार्य हो चुका है। अब नया शोध व्यापक कारणों की तलाश करेगा, जिससे सटीक निदान और उपचार की दिशा में ठोस कदम उठाया जा सके।सिम्स का यह शोध कार्य न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए उपयोगी और दिशा-निर्देशक साबित हो सकता है। यदि AES के कारणों की स्पष्ट पहचान हो पाती है, तो इससे हजारों बच्चों की जान बचाई जा सकेगी और भविष्य में इस जानलेवा बीमारी से प्रभावी बचाव संभव होगा।

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