‘हर योग्य युवा को अवसर मिले, यही मेरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी’
बिलासपुर। क्या सिर्फ युवा होना नेतृत्व की गारंटी है? क्या कम उम्र अपने आप में सत्ता संभालने की योग्यता बन जाती है? या फिर राजनीति में उम्र से ज्यादा जरूरी है अनुभव, समझ और परिस्थितियों को पढ़ने की क्षमता? बिलासपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ राज्य युवा आयोग के अध्यक्ष विश्व विजय सिंह तोमर के सामने जब यही सवाल रखा गया तो उनका जवाब सीधा था—युवाओं के हाथ में सत्ता जरूर होनी चाहिए, लेकिन केवल उम्र के आधार पर नहीं।



तोमर का कहना था कि यदि किसी युवा के पास पर्याप्त अनुभव, समझ और जिम्मेदारी संभालने की क्षमता है तो उसे नेतृत्व की जिम्मेदारी देने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। लेकिन केवल कम उम्र होना पर्याप्त नहीं है। सत्ता केवल ऊर्जा से नहीं चलती, उसके लिए अनुभव और परिस्थितियों की समझ भी जरूरी है।
यही जवाब इस पूरे संवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत भी बनकर सामने आया। क्योंकि तोमर खुद छात्र राजनीति से निकले हैं और विद्यार्थी परिषद से लेकर युवा मोर्चा, नगर निगम पार्षद और अब राज्य युवा आयोग के अध्यक्ष तक की यात्रा कर चुके हैं। उनके लिए युवा राजनीति कोई सैद्धांतिक विषय नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुभव का हिस्सा है।
बिलासपुर प्रेस क्लब में आयोजित ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में प्रेस क्लब अध्यक्ष अजीत मिश्रा सहित कार्यकारिणी और पत्रकारों ने उनका आत्मीय स्वागत किया। कार्यक्रम का अंदाज पारंपरिक प्रेसवार्ता से अलग था। सवाल राजनीतिक भी थे, व्यक्तिगत भी; युवाओं के भविष्य से जुड़े भी और बदलते सामाजिक परिवेश से जुड़े भी। बातचीत में राजनीति, रोजगार, पलायन, नशा, खेल, एआई, करियर मार्गदर्शन, डिप्रेशन और युवा नेतृत्व तक कई मुद्दे सामने आए।
छात्र राजनीति से सत्ता के गलियारों तक—इंजीनियर बनने का सपना छूटा, राजनीति का सफर शुरू हुआ
विश्व विजय सिंह तोमर मूलतः अंबिकापुर के रहने वाले हैं। स्कूली और कॉलेज की शिक्षा भी उन्होंने अंबिकापुर में ही पूरी की। बारहवीं में गणित विषय लिया और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा भी दी। सपना इंजीनियर बनने का था, लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण बाहर जाकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना संभव नहीं हो पाया।
इसके बाद उन्होंने कॉमर्स की पढ़ाई शुरू की। इसी दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और राजनीति से प्रभावित होकर छात्र राजनीति में आने का फैसला किया।
सरगुजा के वरिष्ठ नेता रविशंकर त्रिपाठी के मार्गदर्शन में उन्होंने विद्यार्थी परिषद से राजनीतिक-सामाजिक जीवन की शुरुआत की। वर्ष 2006 से 2011 तक विद्यार्थी परिषद में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं। इसके बाद युवा मोर्चा में प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, जशपुर जिला प्रभारी और सरगुजा युवा मोर्चा जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई। नगर निगम पार्षद भी रहे।
आज वे छत्तीसगढ़ राज्य युवा आयोग के अध्यक्ष हैं और उनके कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हो चुके हैं।
यानी जिस युवा राजनीति की बात आज वे करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा उनके अपने राजनीतिक सफर में भी दिखाई देता है।
अटल से मोदी-शाह तक: बदली कार्यशैली, लेकिन विचारधारा की निरंतरता
राजनीति के अलग-अलग दौरों पर बातचीत के दौरान जब अटल बिहारी वाजपेयी के दौर और नरेंद्र मोदी-अमित शाह के दौर की राजनीति के बीच अंतर पूछा गया तो तोमर ने कहा कि समय और परिस्थितियों के साथ काम करने की पद्धति बदलती है, लेकिन लक्ष्य और विचारधारा में निरंतरता बनी रहती है।
उन्होंने राम मंदिर और जम्मू-कश्मीर जैसे मुद्दों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन विषयों को भाजपा लंबे समय से अपने संकल्प के रूप में रखती रही, उन पर आगे काम हुआ।
यह जवाब उनके राजनीतिक सफर की उस पृष्ठभूमि को भी सामने लाता है जिसमें छात्र राजनीति से लेकर संगठनात्मक राजनीति तक उन्होंने अलग-अलग दौर देखे हैं।
युवाओं का एक साल खराब नहीं होना चाहिए—परीक्षा विवाद पर सरकार की प्रतिक्रिया को बताया महत्वपूर्ण
युवा परीक्षा विवादों पर बात करते हुए तोमर ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि किसी भी परिस्थिति में युवाओं का एक साल खराब नहीं होना चाहिए।
उनके मुताबिक सरकार ने तत्काल दोबारा परीक्षा आयोजित कराकर विद्यार्थियों के एमबीबीएस में प्रवेश का रास्ता साफ किया। मामले में सीबीआई जांच हुई, दोषियों पर कार्रवाई हुई और फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया।
तोमर ने एक महत्वपूर्ण बात कही—घटनाओं को हमेशा पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं होता, लेकिन घटना के बाद शासन की प्रतिक्रिया कैसी होती है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।
उनके मुताबिक युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास बना रहना जरूरी है। परीक्षा, रोजगार और भविष्य से जुड़े मामलों में यदि युवा व्यवस्था पर भरोसा खो देंगे तो इसका असर केवल एक परीक्षा या एक भर्ती तक सीमित नहीं रहेगा।
11 जिलों में पहुंचे, युवाओं से पूछा—आप चाहते क्या हैं?
राज्य युवा आयोग की भूमिका को लेकर तोमर ने बताया कि वे प्रदेश के अलग-अलग जिलों में जाकर युवाओं से सीधा संवाद कर रहे हैं। अब तक 11 जिलों में ऐसे कार्यक्रम हो चुके हैं।
खास बात यह है कि इन कार्यक्रमों का दायरा केवल राजनीतिक युवाओं तक सीमित नहीं रखा गया है।
इनमें पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थी, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी, सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े युवा, पत्रकारिता एवं मीडिया की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को भी शामिल किया जा रहा है।
तोमर के मुताबिक अलग-अलग क्षेत्रों के युवाओं से सुझाव लेने का मकसद आने वाले समय की योजनाओं को उनकी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप दिशा देना है।
यानी आयोग केवल युवाओं के लिए योजनाएं बनाने की बात नहीं कर रहा, बल्कि यह जानने की कोशिश कर रहा है कि युवा खुद अपने भविष्य को किस नजर से देखते हैं।
बेरोजगारी से बड़ा सवाल—रोजगार का मतलब सिर्फ सरकारी नौकरी क्यों?
युवाओं के बीच बेरोजगारी, पलायन और नशे को बड़ी चुनौती बताते हुए तोमर ने कहा कि रोजगार की परिभाषा को सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं किया जा सकता।
उनके मुताबिक कौशल विकास, स्वरोजगार और नए क्षेत्रों में प्रशिक्षण के जरिए युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते तैयार किए जा सकते हैं। आईटीआई सहित प्रशिक्षण संस्थानों को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित करने की दिशा में काम जरूरी है।
पलायन पर उन्होंने इसे दो हिस्सों में बांटा।
बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में दूसरे शहर या प्रदेश जाना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन मजबूरी में होने वाला पलायन चिंता का विषय है।
यही अंतर नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है—क्या युवा अवसर की तलाश में बाहर जा रहा है या अवसरों के अभाव में मजबूर होकर?
गांव तक पहुंचा नशा—खेल को बनाया जा सकता है विकल्प
नशे को गंभीर सामाजिक चुनौती बताते हुए तोमर ने कहा कि छोटे-छोटे गांवों तक नशीले पदार्थों की पहुंच चिंता का विषय है।
उनका मानना है कि इस समस्या का मुकाबला केवल सरकार नहीं कर सकती। समाज को भी साथ आना होगा। युवाओं को खेल और सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना नशे के खिलाफ एक प्रभावी सामाजिक माध्यम बन सकता है।
यही वजह है कि वे खेल को सिर्फ प्रतियोगिता या पदक तक सीमित नहीं देखते, बल्कि इसे युवा नीति का हिस्सा मानते हैं।
हरियाणा-ओडिशा मॉडल की चर्चा, बस्तर की प्रतिभाओं पर भरोसा
तोमर ने छत्तीसगढ़ में खेल प्रतिभाओं की कमी से साफ इनकार किया। हरियाणा और ओडिशा के खेल मॉडल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।
कबड्डी और हॉकी के अलावा बस्तर के युवाओं में मलखंभ, एथलेटिक्स सहित विभिन्न खेलों में काफी संभावनाएं हैं।
उनकी प्राथमिकता केवल खिलाड़ियों को तलाशना नहीं, बल्कि उन्हें अवसर, प्रशिक्षण और आगे बढ़ने का वातावरण उपलब्ध कराना है।
और यहीं उनका सबसे बड़ा दावा सामने आता है—
“हर योग्य युवा को अवसर मिले।”
तोमर के मुताबिक यदि उनके कार्यकाल के बाद यह महसूस हो कि उपलब्ध संसाधनों और परिस्थितियों के बावजूद प्रतिभाशाली युवाओं के लिए अवसरों के दरवाजे खुले, तो यही उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
एआई की दौड़ में छत्तीसगढ़ पीछे क्यों रहे?
युवाओं के भविष्य की चर्चा आज एआई के बिना अधूरी है। तोमर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी छत्तीसगढ़ के युवाओं को तैयार करने की जरूरत बताई।
उन्होंने मुख्यमंत्री फेलोशिप योजना के तहत एआई से जुड़े प्रशिक्षण और छात्रवृत्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि आने वाले समय में नई तकनीकों के लिए विशेषज्ञों को हर बार बड़े शहरों से बुलाने के बजाय छत्तीसगढ़ के युवाओं को ही प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
उनकी सोच साफ है—तकनीक आए तो छत्तीसगढ़ के युवा केवल उसके उपभोक्ता न बनें, बल्कि उसके विशेषज्ञ बनें।
दसवीं-बारहवीं के बाद सबसे बड़ा सवाल—“अब आगे क्या?”
युवाओं के करियर को लेकर तोमर ने एक ऐसी समस्या की ओर इशारा किया जो अक्सर आंकड़ों और योजनाओं की बहस में छूट जाती है।
दसवीं और बारहवीं के बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को यह पता ही नहीं होता कि उनके सामने आगे कितने विकल्प हैं।
उन्होंने अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्हें भी पॉलिटेक्निक प्रवेश परीक्षा की जानकारी समय पर नहीं मिल पाई थी।
इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर मार्गदर्शन के साथ-साथ हर ब्लॉक में करियर मार्गदर्शन केंद्र होना चाहिए।
ऐसा केंद्र जहां विद्यार्थी की रुचि, क्षमता, शैक्षणिक योग्यता और उपलब्ध रोजगार विकल्पों के आधार पर उसे आगे की दिशा समझाई जा सके।
क्योंकि कई बार समस्या प्रतिभा की नहीं होती—समस्या यह होती है कि प्रतिभा को रास्ता दिखाई नहीं देता।
तेज है Gen-Z, लेकिन क्या उसके पास धैर्य है?
नई पीढ़ी और पिछली पीढ़ी के अंतर पर बातचीत कुछ ज्यादा व्यक्तिगत और सामाजिक हो गई।
तोमर ने कहा कि हर पीढ़ी अपने समय को बेहतर मानती है, लेकिन तकनीक ने जीवन की गति जरूर बदल दी है।
मोबाइल, इंटरनेट और वीडियो कॉल ने संवाद की रफ्तार बदल दी है। आज का युवा तेज है, चीजें जल्दी चाहता है और तुरंत परिणाम की अपेक्षा करता है।
लेकिन उनके मुताबिक इसी तेज गति के बीच धैर्य सबसे जरूरी गुण बन गया है।
उनका कहना था कि ऊर्जा युवाओं की बड़ी ताकत है, लेकिन धैर्य की कमी कई बार मानसिक दबाव और दूसरी समस्याओं को जन्म दे सकती है।
डिप्रेशन और आत्महत्या के सवाल पर—परिवार को फिर से मजबूत करना होगा
युवाओं में डिप्रेशन और आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर तोमर ने परिवार की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया।
उनके मुताबिक कठिन परिस्थितियां हर व्यक्ति के जीवन में आती हैं। उनसे बाहर निकलने में परिवार और विशेषकर माता-पिता का साथ महत्वपूर्ण होता है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को हर छोटी जिम्मेदारी से दूर रखना सही नहीं है। उन्हें परिवार और समाज के सामान्य कार्यों से जोड़ना चाहिए।
जिम्मेदारी से आत्मविश्वास पैदा होता है और आत्मविश्वास कठिन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता देता है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या युवाओं के हाथ में सत्ता होनी चाहिए?
और फिर आया वह सवाल, जिसने पूरे संवाद को एक अलग राजनीतिक आयाम दे दिया।
क्या सत्ता की बागडोर युवाओं के हाथ में होनी चाहिए?
तोमर का जवाब न तो सिर्फ युवाओं के पक्ष में भावनात्मक था और न ही अनुभव के नाम पर युवाओं को पीछे रखने वाला।
उनका कहना था—
यदि युवा के पास अनुभव और समझ है तो निश्चित रूप से उसे नेतृत्व की जिम्मेदारी मिलनी चाहिए। लेकिन केवल कम उम्र होना पर्याप्त नहीं है।
यही बात उनके जवाब को महत्वपूर्ण बनाती है।
राजनीति में अक्सर युवा बनाम अनुभवी की बहस खड़ी की जाती है। तोमर इस बहस को उम्र की बजाय क्षमता और अनुभव के आधार पर देखते हैं।
उनके लिए युवा होना ऊर्जा है, लेकिन नेतृत्व के लिए ऊर्जा के साथ निर्णय क्षमता, अनुभव और परिस्थितियों को समझने की क्षमता भी जरूरी है।
यानी सवाल यह नहीं कि सत्ता युवा के हाथ में हो या बुजुर्ग के।
असल सवाल यह है कि सत्ता संभालने वाला व्यक्ति कितना तैयार है?
बिलासपुर के युवा आखिर चाहते क्या हैं?
जब सवाल बिलासपुर के युवाओं के सपनों तक पहुंचा तो तोमर ने कोई तैयार जवाब देने के बजाय कहा कि पहले युवाओं से ही पूछा जाना चाहिए कि उनका सपना क्या है।
उनके मुताबिक जिलों में किए जा रहे संवाद का मकसद यही है—युवाओं की वास्तविक आकांक्षाओं और जरूरतों को समझना।
क्योंकि किसी कार्यालय में बैठकर युवाओं के सपनों का अनुमान लगाने और युवाओं के बीच जाकर उनके सपने सुनने में बड़ा अंतर है।
और अंत में राजनीति से दूर—गोलगप्पे की बात
लंबी बातचीत के बाद कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह अनौपचारिक हो गया।
जब बिलासपुर में खाने की पसंद पूछी गई तो तोमर मुस्कुराए और कहा कि अच्छी चाट या गोलगप्पे मिल जाएं तो वे जरूर खाना पसंद करेंगे।
यानी दो घंटे से ज्यादा समय तक राजनीति, युवा नीति, रोजगार, नशा, खेल, एआई, करियर और सत्ता जैसे गंभीर सवालों पर बात करने वाला संवाद आखिरकार बिलासपुर की चाट और गोलगप्पों तक पहुंच गया।
लेकिन इस अनौपचारिक बातचीत से एक बात साफ होकर सामने आई—तोमर की राजनीति का केंद्र इस समय युवा हैं और उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि संवाद को जमीन पर अवसर में कितना बदला जा सकता है।
क्योंकि अंततः किसी भी युवा नीति की सफलता भाषणों या योजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि उस युवा से तय होगी जिसे पहली बार अपनी क्षमता साबित करने का अवसर मिला।
और शायद इसी वजह से तोमर अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में किसी भवन, योजना या पद का नाम नहीं लेते।
वे सिर्फ एक लक्ष्य बताते हैं—
“हर योग्य और प्रतिभावान युवा अवसर से वंचित न रहे।”
यही लक्ष्य आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की युवा राजनीति और युवा नीति की असली कसौटी भी होगा।



