जहां दौलत की ऊंचाई से ज्यादा मायने रखती है किसी बेटी के सपनों की ऊंचाई
कुछ लोग पैसा कमाते हैं और अपनी दुनिया बदल लेते हैं।
कुछ लोग पैसा कमाते हैं और दूसरों की दुनिया बदलने में लगा देते हैं।
अजीम प्रेमजी उन्हीं चुनिंदा लोगों में से एक हैं।
आज जब शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है और गरीब तथा सामान्य परिवारों की बेटियों के लिए कॉलेज तक पहुंचना कई बार एक सपना बन जाता है, तब अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की यह पहल मन को भीतर तक छू जाती है।
तस्वीर में मां और बेटी का यह मुस्कुराता हुआ चेहरा सिर्फ एक तस्वीर नहीं है।
यह उस भरोसे की तस्वीर है, जो किसी मां के मन में अपनी बेटी के भविष्य को लेकर होता है।

ऊपर लिखा है—
“अब कुसुम भी कॉलेज जाएगी”
इन पांच शब्दों में शायद एक पूरे परिवार की वर्षों की उम्मीद समाई हुई है।
किसी मां ने शायद अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए बहुत कुछ सहा होगा।
किसी पिता ने शायद अपनी जरूरतों को पीछे रखा होगा।
और उस बेटी ने भी न जाने कितनी बार सोचा होगा कि क्या वह भी कभी कॉलेज जाएगी, क्या वह भी अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले पाएगी, क्या उसके सपनों को भी पंख मिलेंगे?
ऐसे समय में अजीम प्रेमजी स्कॉलरशिप सिर्फ ₹30,000 की वार्षिक आर्थिक सहायता नहीं है।
यह किसी बेटी से कहती है—
“तुम पढ़ो… खर्च की चिंता हम पर छोड़ दो।”
यह किसी मां से कहती है—
“आपकी बेटी का सपना छोटा नहीं है। उसे पूरा होने का हक है।”
और यह समाज से कहती है—
“शिक्षा पर किया गया खर्च खर्च नहीं, भविष्य में किया गया निवेश है।”
इस छात्रवृत्ति के तहत 19 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों की पात्र छात्राओं को वार्षिक ₹30,000 की सहायता दी जा रही है। कक्षा 10 और 12 की पढ़ाई पूरी कर पात्र सरकारी स्कूल/कॉलेज से नियमित छात्रा के रूप में पास होने वाली तथा शैक्षणिक सत्र 2026-27 में मान्यता प्राप्त स्नातक डिग्री या डिप्लोमा पाठ्यक्रम के प्रथम वर्ष में प्रवेश लेने वाली छात्राएं इसके लिए पात्र हैं।
आवेदन के लिए दो चरण निर्धारित किए गए हैं—
पहला चरण 10 अगस्त 2026 से 31 अगस्त 2026 तक और
दूसरा चरण 10 जनवरी 2027 से 31 जनवरी 2027 तक।
लेकिन आंकड़ों और तारीखों से कहीं बड़ा है इस पहल का भाव।
क्योंकि एक बेटी का कॉलेज जाना सिर्फ एक बेटी का कॉलेज जाना नहीं होता।
वह एक परिवार की सोच बदलता है।
एक छोटी बहन को हिम्मत देता है।
एक आने वाली पीढ़ी को दिशा देता है।
और समाज को यह संदेश देता है कि बेटियों की शिक्षा किसी एहसान की मोहताज नहीं—यह उनका अधिकार है।
हम अक्सर बड़े उद्योगपतियों की चर्चा उनके कारोबार, संपत्ति और सफलता के आंकड़ों से करते हैं।
लेकिन किसी इंसान की असली पहचान शायद इस बात से होती है कि उसके पास कितना है, इससे नहीं…
बल्कि इस बात से होती है कि उसने अपने पास मौजूद चीजों में से कितना समाज को वापस दिया।
अजीम प्रेमजी का नाम इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि उन्होंने अपनी संपन्नता को केवल निजी सुविधा तक सीमित नहीं रखा। शिक्षा, शिक्षक और समाज के कमजोर वर्गों के बच्चों के भविष्य को लेकर उनका काम यह बताता है कि सच्ची संपन्नता वही है, जिसमें किसी और के जीवन में रोशनी पैदा करने की क्षमता हो।
आज इस तस्वीर को देखकर मन में एक ही बात आती है—
अजीम प्रेमजी होना सिर्फ बड़ा उद्योगपति होना नहीं है।
अजीम प्रेमजी होना उस बेटी की आंखों में कॉलेज का सपना देख पाना है, जिसके घर में शायद फीस भरने की क्षमता नहीं है।
यह तस्वीर हमें बताती है कि बदलाव हमेशा किसी बड़े भाषण से नहीं आता।
कभी-कभी बदलाव एक छात्रवृत्ति बनकर आता है।
कभी किसी बेटी के हाथ में किताब बनकर आता है।
कभी मां की आंखों में खुशी बनकर आता है।
और कभी…
“अब कुसुम भी कॉलेज जाएगी”
जैसे एक छोटे से वाक्य में पूरी जिंदगी की उम्मीद बनकर सामने खड़ा हो जाता है।
सलाम है उस सोच को…
जो किसी गरीब बच्ची को सिर्फ आर्थिक मदद नहीं देती,
बल्कि उसे यह विश्वास देती है कि—
“तुम्हारे सपनों की कीमत है।
तुम्हारी पढ़ाई जरूरी है।
तुम्हारा भविष्य महत्वपूर्ण है।
और तुम्हें भी आगे बढ़ने का पूरा अधिकार है।”
ऐसे हैं हमारे अजीम प्रेमजी…
जिनकी असली पहचान उनकी दौलत नहीं,
बल्कि उन हजारों-लाखों सपनों की मुस्कान है,
जिन्हें उन्होंने उड़ान देने का प्रयास किया है।
किसी बेटी के कॉलेज जाने की खुशी से बड़ी शायद कोई तस्वीर नहीं होती।
और उस खुशी के पीछे अगर किसी की सोच खड़ी हो, तो उसे सिर्फ परोपकार नहीं…
अजीम प्रेमजी : एक नजर में
पूरा नाम: अजीम हाशम प्रेमजी
जन्म: 24 जुलाई 1945
जन्मस्थान: मुंबई, महाराष्ट्र
पिता: मोहम्मद हाशम प्रेमजी
शिक्षा: इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका
पहचान: उद्योगपति, उद्यमी और समाजसेवी
प्रमुख कंपनी: विप्रो लिमिटेड
फाउंडेशन: अजीम प्रेमजी फाउंडेशन
फाउंडेशन की स्थापना: 2001
प्रमुख कार्यक्षेत्र: शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सामाजिक विकास
विप्रो में भूमिका: संस्थापक चेयरमैन के रूप में कंपनी को वैश्विक आईटी क्षेत्र में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका
परोपकार: अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा सामाजिक कार्यों और शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित किया।
संघर्ष से सफलता तक
अजीम प्रेमजी ने महज 21 वर्ष की उम्र में, पिता के निधन के बाद पारिवारिक कारोबार की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने पारंपरिक कारोबार को नई दिशा दी और आगे चलकर विप्रो को भारत की प्रमुख आईटी कंपनियों में शामिल किया।
समाज के लिए समर्पण
कारोबारी सफलता के बाद उन्होंने अपनी संपत्ति को समाज के वंचित और जरूरतमंद वर्गों के लिए उपयोग करने का निर्णय लिया। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक काम किया जा रहा है। उनका मानना रहा है कि बेहतर शिक्षा समाज में स्थायी बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम है।
प्रमुख सम्मान
पद्म विभूषण, Carnegie Medal of Philanthropy, फ्रांस का Chevalier de la Légion d’Honneur सहित उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं।
“अजीम प्रेमजी की कहानी सिर्फ एक सफल उद्योगपति की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने अपनी सफलता को समाज की अगली पीढ़ी के भविष्य से जोड़ दिया।”



