प्रशासनिक सेवा संघ ने सरकार के फैसले पर उठाए सवाल, कहा- फर्जी दस्तावेज लाने वालों पर हो कार्रवाई; दूसरी ओर आईजी की सीधी मॉनिटरिंग में जांच तेज, पूरे सिस्टम की परतें खुलने लगीं
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मोहम्मद इसराइल | बिलासपुर
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा महाघोटाले ने अब नया मोड़ ले लिया है। अब यह मामला केवल कथित फर्जी मुआवजा प्रकरणों और गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पुलिस जांच और प्रशासनिक तंत्र के बीच खुलकर मतभेद की तस्वीर सामने आने लगी है। एक तरफ पुलिस 431 संदिग्ध मौतों और ₹17.24 करोड़ से अधिक के मुआवजा वितरण की कड़ियों को जोड़ते हुए पूरे नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ राज्य प्रशासनिक सेवा संघ ने मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर स्पष्ट कहा है कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर वैधानिक आदेश पारित करने वाले राजस्व अधिकारियों को आपराधिक जांच के दायरे में लाना न्यायसंगत नहीं है।
इसी बीच बिलासपुर रेंज के आईजी रामगोपाल गर्ग ने स्वयं जांच की कमान संभालते हुए विवेचना की सघन समीक्षा शुरू कर दी है। अब जांच का दायरा डॉक्टरों, पुलिसकर्मियों, बैंक कर्मचारियों और राजस्व अमले से आगे बढ़कर पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की पड़ताल तक पहुंच चुका है।
प्रशासनिक सेवा संघ का सरकार से सीधा आग्रह
शनिवार को छत्तीसगढ़ राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, जिला इकाई बिलासपुर के प्रतिनिधिमंडल ने संभागायुक्त सुनील जैन को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। अपर कलेक्टर शिवकुमार बनर्जी के नेतृत्व में दिए गए ज्ञापन में प्राकृतिक आपदा राहत, विशेषकर सर्पदंश जनित मृत्यु के मुआवजा प्रकरणों में राजस्व न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों को आपराधिक जांच में शामिल किए जाने पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई गई।
संघ का कहना है कि यदि किसी प्रकरण में फर्जी शपथपत्र, कूटरचित हस्ताक्षर, फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जाली दस्तावेज या अन्य असत्य अभिलेख प्रस्तुत कर न्यायालय से आदेश प्राप्त किए गए हैं, तो कार्रवाई उन लोगों पर होनी चाहिए जिन्होंने दस्तावेज तैयार किए, प्रमाणित किए या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। केवल उपलब्ध सरकारी अभिलेखों के आधार पर आदेश पारित करने वाले अधिकारी को आरोपी नहीं बनाया जाना चाहिए।
‘Fraud upon the Court’ मानकर हो कार्रवाई
ज्ञापन में प्रशासनिक सेवा संघ ने मांग की है कि ऐसे मामलों को केवल सामान्य धोखाधड़ी नहीं बल्कि “Fraud upon the Court” माना जाए। संघ ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 227 से 231 सहित अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत प्रभावी विवेचना और अभियोजन की मांग की।
संघ ने न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 और राज्य शासन के 14 अक्टूबर 2024 के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि राजस्व न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों को विधिक संरक्षण प्राप्त है। बिना प्रत्यक्ष एवं ठोस साक्ष्य केवल न्यायिक आदेश के आधार पर उनके विरुद्ध आपराधिक उत्तरदायित्व तय नहीं किया जाना चाहिए।
पुलिस अधिकारियों के लिए एसओपी बनाने की मांग
संघ ने राज्य सरकार से यह भी मांग की कि प्राकृतिक आपदा राहत प्रकरणों की जांच के दौरान पुलिस को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि राजस्व न्यायालयों की न्यायिक स्वतंत्रता और विधिक संरक्षण प्रभावित न हो। साथ ही पुलिस, स्वास्थ्य और राजस्व विभाग के बीच समन्वित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू करने की भी मांग रखी गई।
ज्ञापन सौंपने के दौरान अपर कलेक्टर डॉ. ज्योति पटेल, एसडीएम मनीष साहू, प्रवेश पैकरा, शिवकुमार कंवर, नितिन तिवारी, डिप्टी कलेक्टर गबेल सहित प्रशासनिक सेवा संघ के कई पदाधिकारी मौजूद रहे।
उधर आईजी ने कसी जांच की कमान
दूसरी ओर, पुलिस जांच लगातार तेज हो रही है। बिलासपुर रेंज के आईजी रामगोपाल गर्ग ने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक लेकर विवेचकों को स्पष्ट निर्देश दिए कि जांच में कोई भी तकनीकी कमी नहीं रहनी चाहिए।
उन्होंने केस डायरी, दस्तावेजी साक्ष्य, डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन, एफएसएल रिपोर्ट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विस्तृत समीक्षा की। निर्देश दिए गए कि अदालत में ऐसा मजबूत चालान पेश किया जाए, जिससे किसी भी आरोपी को तकनीकी आधार पर राहत न मिल सके।
431 संदिग्ध मौतें, ₹17.24 करोड़ और पूरा सिस्टम जांच के दायरे में
अब तक की जांच के अनुसार 431 संदिग्ध मौतों के आधार पर ₹17.24 करोड़ से अधिक की मुआवजा राशि जारी होने की प्रक्रिया जांच के केंद्र में है।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित रूप से—
फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट कैसे तैयार हुई,
मर्ग इंटीमेशन में किस स्तर पर बदलाव हुआ,
राजस्व अभिलेख किस आधार पर बने,
मुआवजा स्वीकृति तक फाइलें कैसे पहुंचीं,
और कथित कमीशन का पैसा किन-किन लोगों तक पहुंचा।
सिम्स से तहसील कार्यालय तक खंगाली जा रही हर कड़ी
जांच में सामने आया है कि कथित नेटवर्क कई स्तरों पर सक्रिय था। जांच एजेंसियों के अनुसार जब कोई शव पोस्टमार्टम के लिए सिम्स पहुंचता था, तब उसकी सूचना कथित रूप से नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंचती थी। इसके बाद मृतक के परिजनों को चार लाख रुपये के प्राकृतिक आपदा राहत मुआवजे की जानकारी देकर कथित रूप से सर्पदंश का मामला बनाने की प्रक्रिया शुरू होती थी।
इसके बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग दस्तावेज, पटवारी प्रतिवेदन, तहसील जांच, एसडीएम स्तर की अनुशंसा और मुआवजा स्वीकृति तक पूरी फाइल आगे बढ़ती थी। यही वजह है कि अब जांच केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया पर केंद्रित हो गई है।
सबसे बड़ा सवाल—हर स्तर पर जांच के बाद भी भुगतान कैसे हुआ?
सर्पदंश से मृत्यु पर मुआवजा स्वीकृत करने की प्रक्रिया में पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और राजस्व विभाग की कई चरणों वाली जांच शामिल होती है।
मर्ग, पंचनामा, पोस्टमार्टम, आवश्यक होने पर बिसरा परीक्षण, पटवारी प्रतिवेदन, तहसीलदार की जांच, एसडीएम की अनुशंसा और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के बाद ही भुगतान जारी होता है।
इसी प्रक्रिया को देखते हुए अब जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि यदि कथित फर्जी मामलों में भुगतान हुआ तो प्रत्येक स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार हुआ।
स्वास्थ्य और पुलिस विभाग की भूमिका भी जांच के केंद्र में
अब तक चर्चा का केंद्र राजस्व विभाग था, लेकिन अब जांच का फोकस स्वास्थ्य और पुलिस विभाग की भूमिका पर भी है।
मुआवजा प्रक्रिया की शुरुआत जिन मर्ग रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से होती है, वे पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर तैयार होती हैं। ऐसे में यह भी जांच का हिस्सा है कि दस्तावेज किस स्तर पर तैयार हुए, उनका सत्यापन कैसे हुआ और अंतिम रिपोर्ट किन परिस्थितियों में आगे बढ़ी।
सिम्स और तहसील कार्यालय के कर्मचारी भी रडार पर
जांच एजेंसियां सिम्स अस्पताल के मॉर्च्युरी से जुड़े कर्मचारियों तथा तहसील कार्यालय की मुआवजा शाखा में पदस्थ रहे कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं। डिजिटल साक्ष्यों और दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर आगे और कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।
तहसीलदार और पटवारियों से पूछताछ फिलहाल टली
मुआवजा प्रक्रिया में शामिल रहे तहसीलदारों और पटवारियों से प्रस्तावित पूछताछ फिलहाल स्थगित हो गई है। राजस्व विभाग और पुलिस की अलग-अलग बैठकों के कारण पूछताछ आगे नहीं बढ़ सकी, हालांकि जांच एजेंसियां इस कड़ी को भी महत्वपूर्ण मान रही हैं।
जेल में बंद आरोपियों की भी खंगाली जा रही भूमिका
अब तक गिरफ्तार सभी आरोपियों की अन्य प्रकरणों में भूमिका का मिलान किया जा रहा है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि क्या इसी कार्यप्रणाली के जरिए अन्य मामलों में भी सरकारी राशि प्राप्त की गई। मोबाइल डेटा, बैंक खातों और डिजिटल रिकॉर्ड का विश्लेषण लगातार जारी है।
अब तक ये गिरफ्तारियां
इस बहुचर्चित प्रकरण में अब तक डॉ. प्रियंका सोनी, महेंद्र मनहर, गोविंद विश्वकर्मा, हीराप्रसाद खांडेकर, कुश कुमार गुप्ता, नरेंद्र कौशिक, हरिशंकर राठौर, गरीबराम बिंझवार, रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर सहित कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
पुलिस का कहना है कि कथित नेटवर्क संगठित तरीके से कार्य कर रहा था और जांच अब उसकी पूरी संरचना तक पहुंचने पर केंद्रित है।
राजपत्रित अधिकारियों की भूमिका पर भी नजर
जांच का सबसे संवेदनशील पहलू अब राजपत्रित अधिकारियों की भूमिका को लेकर माना जा रहा है। मुआवजा स्वीकृति की प्रक्रिया में पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम सहित विभिन्न स्तरों की जिम्मेदारियां तय होती हैं। यदि जांच में यह सामने आता है कि कथित फर्जी दस्तावेजों के बावजूद प्रकरण आगे बढ़े, तो नियमों के पालन, दस्तावेजों के परीक्षण और प्रशासनिक प्रक्रिया की भी जांच की जाएगी। फिलहाल किसी राजपत्रित अधिकारी की जिम्मेदारी आधिकारिक रूप से तय नहीं की गई है और न ही उनके विरुद्ध किसी कार्रवाई की घोषणा की गई है। विवेचना विभिन्न पहलुओं पर जारी है।



