“बस्ती उजड़ गई, नदियाँ गुस्से में बह गईं,
राजनेता फिर भी मुस्कुराते हुए ‘अवसर’ तलाशते रहे।
हम देखते रहे, कैसे लाशों पर भाषण रचे गए,
और वादों के कागज़ातों पर खून से दस्तख़त किए गए।
ये दर्द किसका है, जो हर आपदा में नया रूप लेता है?
गरीब की झोपड़ी गिरती है, महलों की रोशनी और चमकती है।
तुम कहते हो ‘राहत’, हम जानते हैं ‘राजनीति’ का नाम,
जिसमें हर तबाही, हर आँसू, हर भूख — एक वोट बन जाती है।
अभी तो ये सियासत के बाज़ार में गरीब बिक रहा है,
टेंट के नीचे ठिठुरता हुआ, उम्मीद की रोटी माँग रहा है।
लेकिन याद रखो, ऐ ज़ालिमो, ये दर्द इकठ्ठा होता है,
एक दिन तूफ़ान बनकर, तुम्हारे तख़्तों को भी बहा ले जाएगा।”
— फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शायरी नहीं सच्चाई है….
वीडियो में देखिए तबाही का मंजर और हकीकत


मोहम्मद इसराइल







बिलासपुर। गुरुवार और शुक्रवार की मूसलाधार बारिश ने केवल शहर को जलमग्न नहीं किया, बल्कि हजारों परिवारों के वर्षों की मेहनत, जमा-पूंजी और उम्मीदों को भी पानी में बहा दिया। सबसे ज्यादा मार सरकंडा क्षेत्र के करीब 18 वार्डों पर पड़ी, जहां झोपड़ियां दरक गईं, पक्के मकानों में नालियों का गंदा पानी घुस गया, गलियां दलदल और कीचड़ में बदल गईं, घरों का सामान खराब हो गया और कई परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया।
बारिश थमी तो पानी उतरने लगा, लेकिन पीछे छोड़ गया बदबू, सड़ांध, कीचड़, टूटी सड़कें, धंसी गलियां और ऐसे परिवार, जिनकी पूरी गृहस्थी चंद घंटों में बिखर गई। जिन घरों में कल तक बच्चों की पढ़ाई चलती थी, वहां अब गीली किताबें और टूटे फर्नीचर पड़े हैं। जिन रसोईघरों में चूल्हा जलता था, वहां राशन की बोरियां पानी में सड़ चुकी हैं।






केवल जलभराव नहीं था। यह शहर के उस चेहरे का खुलासा था, जो हर बरसात में विकास के दावों के नीचे दब जाता है।
18 वार्डों में हजारों परिवारों की जिंदगी पटरी से उतरी
सरकंडा क्षेत्र के अनेक मोहल्लों में पानी घरों की चौखट नहीं, कमरों तक पहुंच गया। कई कच्चे मकानों की दीवारें दरक गईं। झोपड़ियां धराशायी हो गईं। जिन परिवारों ने जीवनभर की कमाई से पक्का मकान बनाया था, उनके घरों में नालियों का गंदा पानी घुस आया।
फ्रिज, टीवी, कूलर, वॉशिंग मशीन, पंखे, इनवर्टर, बिस्तर, कपड़े, स्कूल की किताबें, जरूरी दस्तावेज और घरेलू सामान पानी में खराब हो गए। कई घरों में महीनों का राशन भीगकर बेकार हो गया। जिनके पास पहले से आर्थिक संकट था, उनके लिए यह नुकसान कई वर्षों की कमाई के बराबर साबित हुआ।
दलदल बनी गलियां, बीमारी का खतरा बढ़ा
पानी उतरते ही राहत नहीं मिली। गलियों में मोटी कीचड़ की परत जम गई। नालियों का गंदा पानी घरों तक फैल गया। बदबू ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया। छोटे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान नजर आए। कई जगह लोग अपने ही घरों में चप्पल पहनकर चलने को मजबूर हैं।
सफाई का काम शुरू जरूर हुआ, लेकिन कई मोहल्लों में लोग खुद फावड़ा, तसला और बाल्टी लेकर घरों से कीचड़ निकालते दिखाई दिए।
करोड़ों की सड़कें पहली बड़ी बारिश में धरती में समा गईं
इस आपदा ने शहर के विकास मॉडल पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई कई सड़कें पहली बड़ी बारिश का दबाव भी नहीं झेल सकीं। कहीं सड़क धंस गई, कहीं डामर बह गया, कहीं गड्ढों ने पूरी सड़क निगल ली। कुछ स्थानों पर सड़कें ऐसी टूटीं कि लोगों का आवागमन तक बाधित हो गया।
बारिश ने यह भी दिखा दिया कि कागजों में मजबूत दिखने वाले निर्माण जमीन पर कितने टिकाऊ हैं।
पहले दिन अफसरों की दौड़, दूसरे दिन सन्नाटा
बारिश के चरम पर अधिकारी छाता लेकर जलभराव वाले इलाकों में पहुंचे। निरीक्षण हुए। हालात देखे गए। निर्देश दिए गए। राहत कार्यों की तस्वीरें भी सामने आईं।
लेकिन जैसे-जैसे पानी उतरता गया, प्रभावित इलाकों में अफसरों की मौजूदगी भी कम होती गई। जिन परिवारों को सबसे ज्यादा जरूरत थी, वे अपने घरों की सफाई, नुकसान का आकलन और रोजमर्रा की जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की जद्दोजहद में अकेले नजर आए।
राहत के पैकेट मिले, लेकिन नुकसान का हिसाब कहीं नहीं
कई स्थानों पर भोजन के पैकेट वितरित किए गए। अस्थायी राहत शिविर भी बनाए गए। लेकिन जिन परिवारों का लाखों रुपये का घरेलू सामान खराब हो गया, जिनकी दीवारें गिर गईं, जिनका राशन बह गया और जिनकी रोजी-रोटी प्रभावित हुई, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—अब आगे कैसे चलेगा?
भोजन का एक पैकेट भूख मिटा सकता है, लेकिन बर्बाद हुई गृहस्थी वापस नहीं ला सकता।
कैमरे लौटे, दर्द नहीं
बारिश थमने के बाद कई जगह जनप्रतिनिधियों के दौरे शुरू हुए। गलियों में कैमरे पहुंचे। तस्वीरें ली गईं। निरीक्षण हुए। भरोसे दिए गए। लेकिन जिन लोगों ने दो रातें पानी में काटीं, जिनकी नींद, जमा-पूंजी और सुरक्षा की भावना बह गई, उनके लिए कैमरे से ज्यादा जरूरी था स्थायी समाधान।
लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यही रही कि संकट के सबसे कठिन घंटों में वे खुद अपने सहारे थे। पड़ोसी एक-दूसरे के काम आए, युवाओं ने नाव और ट्रैक्टर से लोगों को निकाला, लेकिन व्यवस्था वहां कमजोर दिखी जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
सबसे बड़ी चोट गरीब और मध्यम वर्ग पर
इस आपदा की सबसे बड़ी कीमत उसी वर्ग ने चुकाई, जिसके पास नुकसान सहने की ताकत सबसे कम होती है। दिहाड़ी मजदूर कई दिन काम पर नहीं जा सके। छोटे दुकानदारों का सामान खराब हो गया। रिक्शा चालकों, ठेला संचालकों और निम्न आय वर्ग के परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।
मध्यम वर्ग के परिवार, जिन्होंने कर्ज लेकर घर और सामान खरीदा था, वे बीमा के दायरे से बाहर होने के कारण पूरा नुकसान खुद झेलने को मजबूर हैं।
बारिश ने सिर्फ शहर नहीं डुबोया, व्यवस्था की परतें भी उधेड़ दीं
दो दिन की बारिश ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया कि आखिर हर मानसून में वही इलाके क्यों डूबते हैं? नालियां हर साल क्यों जवाब दे जाती हैं? करोड़ों की लागत वाली सड़कें पहली ही बारिश में क्यों धंस जाती हैं? जल निकासी की योजनाएं आखिर जमीन पर क्यों नहीं उतर पातीं?
बिलासपुर ने इस बार सिर्फ बारिश नहीं देखी। उसने विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का वह अंतर भी देखा, जिसे पानी ने सबके सामने उजागर कर दिया।
यह आपदा सिर्फ पानी की नहीं थी। यह उन हजारों परिवारों की कहानी है, जिनकी आंखों में आज भी सूखने से पहले कई सपने भीग रहे हैं।



