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फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट बनकर वर्षों तक करता रहा इलाज! बिलासपुर अपोलो केस में पुलिस की बड़ी कार्रवाई, डॉक्टर पर चार्जशीट, अस्पताल प्रबंधन को क्लीन चिट की क्लोजर रिपोर्ट

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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20 साल पुराने इलाज से उठे सवालों की गहन जांच पूरी; फर्जी दस्तावेज, संदिग्ध पहचान और मेडिकल योग्यता पर गंभीर खुलासों के बाद डॉक्टर के खिलाफ अदालत में चालान, लेकिन अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ आपराधिक साजिश के साक्ष्य नहीं मिलने पर क्लोजर रिपोर्ट।

नोट: यह समाचार पुलिस द्वारा जारी विवेचना विवरण और न्यायालय में प्रस्तुत कार्रवाई पर आधारित है। मामले में अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर किया जाएगा।


बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित अपोलो अस्पताल प्रकरण में पुलिस विवेचना का महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है। थाना सरकण्डा में दर्ज अपराध क्रमांक 563/2025 की विस्तृत जांच के बाद पुलिस ने कथित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना, फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल और अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के आरोपों में अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है। वहीं अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की अलग से जांच के बाद उनके विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र या जानबूझकर की गई संलिप्तता के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर न्यायालय में क्लोजर रिपोर्ट पेश की गई है।
यह मामला वर्ष 2006 में हुए एक मरीज के उपचार से जुड़ा है, जिसकी शिकायत लगभग दो दशक बाद पुलिस तक पहुंची और उसके बाद शुरू हुई लंबी विवेचना में कई अहम तथ्य सामने आए।
क्या है पूरा मामला? 2006 के इलाज से शुरू हुई जांच
पुलिस के अनुसार, 9 अप्रैल 2025 को डॉ. प्रदीप शुक्ला ने थाना सरकण्डा में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में बताया गया कि उनके पिता स्वर्गीय पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला का वर्ष 2006 में बिलासपुर स्थित अपोलो अस्पताल में इलाज हुआ था।
शिकायत के अनुसार उस समय अस्पताल में कार्यरत डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव ने उनकी एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की थी, जिसके बाद मरीज की मृत्यु हो गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि संबंधित चिकित्सक विधिवत योग्य एवं पंजीकृत हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं थे तथा अस्पताल प्रबंधन ने पर्याप्त सत्यापन किए बिना उन्हें नियुक्त किया था।
जांच कई राज्यों और संस्थानों तक पहुंची
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने व्यापक स्तर पर दस्तावेजी और तकनीकी जांच की। विवेचना के दौरान कई संस्थानों से जानकारी जुटाई गई।
जिन संस्थानों से जानकारी प्राप्त की गई उनमें शामिल हैं—
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, बिलासपुर।
अपोलो अस्पताल, बिलासपुर।
पुलिस अधीक्षक, दमोह (मध्यप्रदेश)।
छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल।
उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज।
अन्य संबंधित संस्थान एवं अस्पताल।
अपोलो अस्पताल ने क्या रिकॉर्ड दिए?
जांच में सामने आया कि वर्ष 2006 के दौरान डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव अपोलो अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत थे।
अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को उनका बायोडाटा (Resume/CV) और नियुक्ति आदेश उपलब्ध कराया, लेकिन उनकी शैक्षणिक डिग्री तथा मेडिकल काउंसिल पंजीयन से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके।
जांच में डॉक्टर को लेकर सामने आए कई गंभीर तथ्य
पुलिस विवेचना के दौरान आरोपी चिकित्सक के संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं।
जांच के अनुसार—
आरोपी ने स्वयं को MBBS, MRCP तथा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में फेलोशिप धारक बताया था।
मेडिकल काउंसिल से प्राप्त जानकारी के अनुसार “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से उसका वैध पंजीयन प्रमाणित नहीं हुआ।
दमोह में दर्ज अपराध की जांच में यह तथ्य सामने आया कि आरोपी ने “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से आधार कार्ड, पैन कार्ड सहित अन्य दस्तावेज तैयार कराए थे।
उसके द्वारा प्रस्तुत शैक्षणिक दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां पाई गईं।
उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से प्राप्त जानकारी के अनुसार आरोपी के नाम पर MBBS की वैध डिग्री जारी होने का रिकॉर्ड पुलिस जांच में उपलब्ध नहीं मिला।
दमोह से गिरफ्तारी, बिलासपुर लाकर हुई पूछताछ
पुलिस के अनुसार मध्यप्रदेश के दमोह में दर्ज अपराध के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद प्रोडक्शन वारंट पर उसे बिलासपुर लाया गया और पुलिस रिमांड में पूछताछ की गई।
पूछताछ के दौरान आरोपी ने स्वीकार किया कि—
वह अपोलो अस्पताल, बिलासपुर में Consultant Cardiologist के रूप में कार्यरत था।
उसने अनेक मरीजों की एंजियोग्राफी एवं एंजियोप्लास्टी की थी।
मेडिकल योग्यता से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिए जाने के बावजूद वह अपनी MBBS डिग्री के अतिरिक्त “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से कोई वैध प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका।
हालांकि उसने अस्पताल में नियुक्ति “नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव” नाम से ली थी।
जांच में मरीजों की मौत का भी आया उल्लेख
विवेचना के दौरान पुलिस के समक्ष यह जानकारी भी आई कि आरोपी के कार्यकाल के दौरान उपचारित लगभग 27 मरीजों की मृत्यु हुई थी।
हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में प्रमाणित दस्तावेज अथवा पर्याप्त पीड़ित उपलब्ध नहीं हुए। जांच में केवल दो शिकायतकर्ताओं द्वारा ही विधिवत शिकायत दर्ज कराई गई।
डॉक्टर के खिलाफ चार्जशीट दाखिल
पुलिस ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी चिकित्सक के खिलाफ अभियोग पत्र क्रमांक 671/2025 दिनांक 27 जून 2025 को न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया।
विवेचना के अनुसार आरोपी के विरुद्ध फर्जी दस्तावेज, कूटरचना, धोखाधड़ी तथा अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के पर्याप्त साक्ष्य पाए गए।
चार्जशीट के बाद भी जारी रही अलग जांच
पुलिस ने बताया कि डॉक्टर के खिलाफ अभियोग पत्र प्रस्तुत किए जाने के बाद भी जांच यहीं समाप्त नहीं हुई।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत अस्पताल प्रबंधन एवं चयन समिति की संभावित भूमिका की अलग से आगे की विवेचना की गई।
इस दौरान—
अपोलो अस्पताल से पुनः पत्राचार किया गया।
डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार से जानकारी ली गई।
नियुक्ति से जुड़े उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण किया गया।
वर्ष 2006 के रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
अस्पताल प्रबंधन ने रिकॉर्ड नहीं होने की बात कही
पुलिस को दिए लिखित जवाब में अस्पताल प्रबंधन ने कहा—
संबंधित नियुक्ति लगभग 17–18 वर्ष पहले हुई थी।
उस समय रिकॉर्ड केवल हार्ड कॉपी में रखे जाते थे।
रिकॉर्ड संरक्षण की निर्धारित प्रक्रिया के तहत पुराने अभिलेख नष्ट हो चुके हैं अथवा उपलब्ध नहीं हैं।
इसलिए नियुक्ति से जुड़े अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराना संभव नहीं है।
वरिष्ठ अधिकारियों और अभियोजन की विधिक राय भी ली गई
पुलिस ने संपूर्ण केस डायरी का परीक्षण कराने के बाद वरिष्ठ अधिकारियों तथा जिला अभियोजन अधिकारी, बिलासपुर से विधिक राय प्राप्त की।
विधिक राय में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया जिससे यह सिद्ध हो सके कि अपोलो अस्पताल प्रबंधन अथवा चयन समिति ने जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण तरीके से या आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी चिकित्सक की नियुक्ति की थी।
पुलिस की कार्रवाई का वर्तमान निष्कर्ष
पुलिस के अनुसार—
डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के विरुद्ध फर्जी दस्तावेज, कूटरचना, धोखाधड़ी तथा अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के पर्याप्त साक्ष्य पाए गए।
उनके विरुद्ध विधिवत अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया जा चुका है।
अस्पताल प्रबंधन एवं चयन समिति की भूमिका की पृथक विवेचना की गई।
उपलब्ध अभिलेखों, पत्राचार, गवाहों के बयान तथा विधिक राय के आधार पर अस्पताल प्रबंधन अथवा चयन समिति के विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र अथवा जानबूझकर की गई संलिप्तता सिद्ध करने योग्य पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर अपोलो अस्पताल प्रबंधन एवं डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार के संबंध में न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।
वहीं आरोपी चिकित्सक के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई न्यायालय में पृथक रूप से जारी है।

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