मोहम्मद इसराइल
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बिलासपुर ,रायपुर, छत्तीसगढ़।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर वन मंडल में जंगल अब सिर्फ हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि अवैध शिकार, लकड़ी तस्करी और प्रशासनिक सुस्ती की एक खामोश कहानी बनते जा रहे हैं। एक तरफ जंगली सूअर और हिरण जैसे वन्यजीवों का बेरहमी से शिकार हो रहा है, तो दूसरी ओर सागौन-शीशम जैसे कीमती पेड़ों की खुलेआम कटाई। कार्रवाई के नाम पर छिटपुट गिरफ्तारियां जरूर हो रही हैं, लेकिन हर नए केस के साथ यह सवाल और गहराता जा रहा है—क्या जंगलों की निगरानी सिर्फ कागजों में सीमित रह गई है?

केस–1: टेंगनमाड़ा में जंगली सूअर का शिकार—5 आरोपी गिरफ्तार
बेलगहना वन परिक्षेत्र से सटे टेंगनमाड़ा के ग्राम अट्टा में जंगली सूअर के शिकार का मामला सामने आया। मुखबिर की सूचना पर वन विभाग ने दबिश दी, जहां मौके से पका हुआ मांस बरामद किया गया।
पूछताछ में आरोपियों—रूपलाल (29), नितिन (19), संदीप (20), गोविंद (54) और रामकुमार (51)—ने शिकार करना स्वीकार किया।
सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश कर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया। मामला वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत दर्ज हुआ।
केस–2: कुरदर में हिरण का शिकार—रिसॉर्ट किचन तक पहुंचा मांस
पांच दिन पहले बेलगहना क्षेत्र के ग्राम कुरदर स्थित एक रिसॉर्ट में हिरण के मांस पकाने का मामला सामने आया।
वन विभाग की कार्रवाई में किचन के बाहर चूल्हे पर मांस पकता मिला। मौके से पका मांस, बर्तन और अन्य सामग्री जब्त की गई।
मैनेजर समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि सप्लायर फरार बताया गया।
यह मामला सिर्फ शिकार नहीं, बल्कि सप्लाई चेन की ओर इशारा करता है—जंगल से रिसॉर्ट तक अवैध मांस की निर्बाध पहुंच।
केस–3: बेलगहना में 500 पेड़ों की कटाई—12 आरोपी जेल भेजे गए
बेलगहना वन परिक्षेत्र के भेलवातिकारी कक्ष क्रमांक 2252 में लगभग 500 छोटे-बड़े पेड़ों की अवैध कटाई की गई।
कटाई करने वालों ने मौके पर अस्थायी छावनी बनाकर जंगल को ही बेस कैंप बना लिया था।
वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए 12 आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में भेजा।
कटे पेड़ों का उपयोग ईंधन से लेकर निर्माण तक किया जा रहा था—यह संकेत देता है कि यह सिर्फ स्थानीय जरूरत नहीं, बल्कि संगठित गतिविधि है।
केस–4: अरपा-भैंसाझार में शिकायत के बाद भी सन्नाटा—23 बड़े पेड़ कटे
अरपा-भैंसाझार क्षेत्र में पिछले 15 दिनों में सागौन, शीशम और तेंदू के करीब 23 बड़े पेड़ों की कटाई हुई।
ग्रामीणों ने कई बार शिकायत की, लेकिन वन विभाग की टीम मौके तक नहीं पहुंची।
दिन में पेड़ काटे जाते रहे, रात में सप्लाई होती रही—और सिस्टम मौन बना रहा।
यह मामला कार्रवाई से ज्यादा निष्क्रियता का उदाहरण बन गया।
केस–5: 22 एकड़ ‘छोटे झाड़ का जंगल’—सरकारी जमीन पर कब्जे की कोशिश
तखतपुर विकासखंड में नेशनल हाईवे किनारे 22 एकड़ वन भूमि पर बाहरी लोगों द्वारा तार फेंसिंग कर कब्जा करने की कोशिश की गई।
खसरा नंबर 863 की यह जमीन वर्षों से वन विभाग के संरक्षण में दर्ज है।
स्थानीय विरोध के बाद संदिग्ध लोग बिना दस्तावेज दिखाए मौके से हट गए।
हैरानी की बात—प्रशासन और वन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी।
केस–6: लकड़ी तस्करी के बड़े ऑपरेशन—ट्रक, पिकअप और घरों से जब्ती
वन विभाग की अलग-अलग कार्रवाइयों में
कहुआ (अर्जुन) लकड़ी से भरा ट्रक जब्त
गोबरी पाट में घर से ₹1.75 लाख की लकड़ी बरामद
कोटा क्षेत्र में 2 पिकअप वाहन जब्त
जेवरा जंगल में 5 तस्कर गिरफ्तार
इन सभी मामलों में एक समान पैटर्न सामने आया—
रात में कटाई, दिन में परिवहन, गांवों में स्टॉकिंग और दस्तावेजों का अभाव।
केस–7: अचानकमार टाइगर रिजर्व में हथियारबंद घुसपैठ
अचानकमार टाइगर रिजर्व के कोर जोन से सटे इलाके में हथियारों के साथ घुसपैठ का मामला सामने आया।
वीडियो वायरल होने के बाद कार्रवाई हुई और तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
उनके पास से एयर राइफल और वाहन जब्त किए गए।
घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े किए—
कैसे हथियार लेकर संरक्षित क्षेत्र तक पहुंच संभव हुई?
क्या निगरानी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है?
जंगलों में ‘सिस्टमेटिक लूट’ का पैटर्न
इन सभी मामलों को जोड़ने पर जो तस्वीर उभरती है, वह बेहद चिंताजनक है—
वन्यजीव शिकार और लकड़ी तस्करी समानांतर चल रही है
गांवों और रिसॉर्ट तक अवैध सप्लाई चेन सक्रिय
कार्रवाई ज्यादातर सूचना या वायरल वीडियो के बाद
मौके पर निगरानी और रोकथाम लगभग नदारद
कानूनी फ्रेमवर्क बनाम जमीनी हकीकत
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 और भारतीय वन अधिनियम 1927 जैसे सख्त कानून मौजूद हैं, जिनमें 3 से 7 साल तक की सजा और जब्ती का प्रावधान है।
इसके बावजूद घटनाओं की आवृत्ति यह संकेत देती है कि कानून का डर जमीनी स्तर पर कमजोर पड़ चुका है।
अधिकारियों पर उठते सवाल
लगातार सामने आ रहे मामलों ने वन अमले की कार्यप्रणाली पर कई प्रश्न खड़े किए हैं—
शिकायतों के बावजूद मौके पर कार्रवाई क्यों नहीं?
बड़े पैमाने पर कटाई और शिकार की सूचना पहले क्यों नहीं मिलती?
क्या अंदरूनी मिलीभगत की आशंका से इनकार किया जा सकता है?
संरक्षित क्षेत्रों में भी घुसपैठ कैसे संभव हो रही है?
सीसीएफ स्तर से जांच और कार्रवाई की बात कही जा रही है, लेकिन घटनाओं की श्रृंखला यह दिखाती है कि समस्या सतही नहीं, बल्कि गहराई तक फैली हुई है।
जंगल, जानवर और जिम्मेदारी—तीनों पर दबाव
बिलासपुर, मुंगेली और आसपास के वन क्षेत्रों में जिस तरह शिकार और कटाई के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, उसने पूरे संरक्षण तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जंगलों के भीतर चल रही गतिविधियां अब छिपी नहीं रहीं—वे सामने आ रही हैं, दर्ज हो रही हैं, और हर नए केस के साथ एक बड़ा नेटवर्क उजागर करती जा रही हैं।

