
138 गरीब परिवारों की बेदखली के खिलाफ निर्णायक मोड़, कांग्रेस का खुला समर्थन
बिलासपुर। शहर के लिंगियाडीह क्षेत्र में 138 गरीब परिवारों को बेदखली से बचाने के लिए चल रहा लिंगियाडीह बचाव आंदोलन रविवार को अपने 100 दिन पूरे करने जा रहा है। इस ऐतिहासिक पड़ाव पर आंदोलन समिति ने 1 मार्च 2026 को शाम 6 बजे विशाल मशाल श्रृंखला निकालने की घोषणा की है। आयोजन स्थल अपोलो रोड सब्जी मार्केट चौक, लिंगियाडीह तय किया गया है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि पिछले 99 दिनों से महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और श्रमिक वर्ग के लोग शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन नगर निगम प्रशासन, जिला प्रशासन और राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया।
क्या है पूरा मामला?
लिंगियाडीह क्षेत्र में दशकों से बसे 138 परिवारों पर बेदखली की तलवार लटकी हुई है। प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका के बीच इन परिवारों ने अपने आशियाने बचाने के लिए आंदोलन की राह चुनी।
धरना स्थल पर लगातार बैठकों, जनसमर्थन अभियानों और ज्ञापन सौंपने का सिलसिला जारी रहा। आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि:
उन्हें पुनर्वास का स्पष्ट विकल्प नहीं दिया गया।
नोटिस और कार्रवाई की प्रक्रिया में मानवीय पहलू की अनदेखी की गई।
गरीब परिवारों की आजीविका और बच्चों की पढ़ाई पर संकट खड़ा हो गया है।
100वें दिन मशाल श्रृंखला का ऐलान
आंदोलन समिति ने 100 दिन पूरे होने के अवसर पर विशाल मशाल श्रृंखला आयोजित करने की घोषणा की है। समिति का कहना है कि यह कार्यक्रम “संघर्ष और एकजुटता” का प्रतीक होगा।
कार्यक्रम विवरण
दिनांक: 1 मार्च 2026, रविवार
समय: शाम 6:00 बजे से
स्थान: अपोलो रोड सब्जी मार्केट चौक, लिंगियाडीह, बिलासपुर
कांग्रेस का खुला समर्थन

इस आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। जिला कांग्रेस कमेटी, बिलासपुर (शहर/ग्रामीण) ने आंदोलन के समर्थन में अपील जारी की है।
कांग्रेस के ग्रामीण अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री और शहर अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा ने संयुक्त रूप से कांग्रेसजनों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर कार्यक्रम को समर्थन देने का आह्वान किया है।
दोनों नेताओं ने कहा कि गरीब परिवारों को बेघर करने की कार्रवाई अमानवीय है और जब तक न्यायपूर्ण समाधान नहीं मिलता, पार्टी उनके साथ खड़ी रहेगी।
99 दिन का संघर्ष: प्रशासन पर उठे सवाल
आंदोलन के दौरान कई बार नगर निगम और जिला प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की गई। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि:
ज्ञापन देने के बावजूद ठोस वार्ता नहीं हुई।
पुनर्वास नीति स्पष्ट नहीं की गई।
जनप्रतिनिधियों की पहल के बावजूद समाधान टलता रहा।
धरना स्थल पर लगातार महिलाओं और बच्चों की मौजूदगी ने इस आंदोलन को सामाजिक स्वरूप दे दिया है।
आगे क्या?
100वें दिन की मशाल श्रृंखला को आंदोलन का निर्णायक चरण माना जा रहा है। सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी से यह आयोजन बड़े शक्ति प्रदर्शन में बदल सकता है।
अब निगाहें जिला प्रशासन और राज्य सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं—क्या 100 दिन का यह संघर्ष समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम दिला पाएगा या आंदोलन और तेज होगा?

