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50 साल बाद भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की हालत जस की तससेवा बहुत, अधिकार कम — आंगनबाड़ी बहनों की पुकारमानदेय नहीं, सम्मान चाहिए — नियमितीकरण की मांग तेज

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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बिलासपुर
देशभर में महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत संचालित आंगनबाड़ी व्यवस्था ने 50 वर्षों का सफर पूरा कर लिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं की स्थिति आज भी चिंताजनक बनी हुई है। Integrated Child Development Services (आईसीडीएस) योजना के तहत वर्ष 1975 से संचालित आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से बच्चों के पोषण, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा जैसी अहम सेवाएं दी जा रही हैं।
देशभर में लगभग 27 लाख तथा छत्तीसगढ़ में एक लाख से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं अपनी सेवाएं दे रही हैं। इसके बावजूद आज तक उन्हें नियमित शासकीय कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल सका है।
वर्तमान में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मात्र 4500 रुपए और सहायिकाओं को 2250 रुपए प्रतिमाह मानदेय दिया जा रहा है। यह राशि न्यूनतम जीवन स्तर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। लगातार बढ़ती महंगाई के बीच इतने कम मानदेय में परिवार का भरण-पोषण करना चुनौती बना हुआ है।
सामाजिक सुरक्षा का अभाव
सेवा निवृत्ति के बाद न तो पेंशन की कोई व्यवस्था है और न ही ग्रेच्युटी जैसी सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध है। बीमारी, दुर्घटना या पारिवारिक आपात स्थिति में भी किसी विशेष सहायता या सुरक्षा कवच का प्रावधान नहीं है। कार्यकर्ता और सहायिकाएं वर्षों तक सेवा देने के बाद भी असुरक्षित भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
काम का बोझ बढ़ा, अधिकार शून्य
आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों को पूरक पोषण आहार वितरण, वजन मापन, टीकाकरण समन्वय, गर्भवती एवं धात्री महिलाओं की निगरानी, सर्वे कार्य, शासन की विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन और समय-समय पर अतिरिक्त सर्वे व डाटा एंट्री जैसे कार्यों की जिम्मेदारी दी जाती है। समय के साथ जिम्मेदारियां बढ़ती गईं, लेकिन अधिकार और सुविधाएं लगभग शून्य बनी रहीं।
बजट सत्र में मांग शामिल करने की मांग
अब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं ने आगामी विधानसभा बजट सत्र में अपनी मांगों को शामिल करने की आवाज उठाई है। उनकी प्रमुख मांगों में शासकीय कर्मचारी का दर्जा, मानदेय में वृद्धि, पेंशन व्यवस्था, ग्रेच्युटी और बीमा योजना लागू करना शामिल है।
साथ ही केंद्र सरकार से भी इस दिशा में ठोस और निर्णायक कदम उठाने की अपील की गई है, ताकि दशकों से सेवाएं दे रहीं महिलाओं को सम्मानजनक जीवन और सामाजिक सुरक्षा मिल सके।
गीतांजलि पांडेय (परियोजना अध्यक्ष, बिलासपुर)
उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं वर्षों से समर्पित भाव से सेवाएं दे रही हैं। शासन की हर योजना को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, इसके बावजूद उन्हें न तो पर्याप्त मानदेय मिल रहा है और न ही कर्मचारी का दर्जा। उन्होंने बजट सत्र में मांगों को शामिल करने की अपेक्षा जताई।

साधना बासवाड़े (कोटा परियोजना अधिकारी)
उन्होंने बताया कि कार्यकर्ताओं पर लगातार जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं। पोषण अभियान से लेकर विभिन्न सर्वे और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन तक, हर कार्य में उनकी भागीदारी अनिवार्य है। ऐसे में मानदेय वृद्धि और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर विचार किए जाने की आवश्यकता है।

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