डीएमएफ फंड रोका, शिक्षकों को सेवा समाप्ति नोटिस, अभिभावकों में उबाल

बिलासपुर। मोहम्मद इसराइल
छत्तीसगढ़ सरकार की बहुचर्चित स्वामी आत्मानंद अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल योजना एक बार फिर कठघरे में है। राजधानी रायपुर से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा विमर्श तक पहुंचने वाली यह योजना अब ज़मीनी स्तर पर मासूम बच्चों, संविदा शिक्षकों और गरीब अभिभावकों के लिए संकट का दूसरा नाम बनती जा रही है। बिलासपुर शहर के चार स्वामी आत्मानंद स्कूल परिसरों में संचालित नर्सरी, केजी-1 और केजी-2 कक्षाओं को आगामी शिक्षा सत्र से बंद करने का निर्णय लिया गया है।
इस फैसले का सीधा असर करीब 300 नन्हे बच्चों पर पड़ेगा, जिनकी प्रारंभिक शिक्षा बीच मझधार में छोड़ दी जा रही है।
डीएमएफ फंड बंद, शिक्षा पर सीधा प्रहार
इन नर्सरी कक्षाओं को बंद करने का मुख्य कारण जिला खनिज न्यास (DMF) मद से मिलने वाला बजट बंद होना बताया गया है। जिन कक्षाओं पर अब तक रंग-रोगन, बच्चों के फर्नीचर, शिक्षण सामग्री और शिक्षकों के वेतन सहित करीब 34 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं, उन्हें अब अचानक “अनावश्यक” करार दिया जा रहा है।
चार स्कूल, चार कहानियां — एक जैसा संकट
स्कूल शिक्षा विभाग ने स्वामी आत्मानंद स्कूलों की शुरुआती सफलता के बाद शहर के
तारबाहर,
लाल बहादुर,
लाला लाजपत राय
और तिलक नगर
स्थित शासकीय स्कूलों में केजी-1 और केजी-2 कक्षाएं शुरू की थीं।
प्रत्येक कक्षा में दो शिक्षक और दो आया की नियुक्ति की गई थी। सभी नियुक्तियां संविदा आधार पर हुईं और पूरा खर्च डीएमएफ मद से वहन किया जा रहा था।
वेतन नहीं, भरोसा टूटा
सरकार बदलने के बाद डीएमएफ फंड अनियमित हो गया। इसका नतीजा यह हुआ कि
तारबाहर स्कूल के नर्सरी शिक्षकों को पिछले पांच महीनों से वेतन नहीं मिला,
जबकि अन्य तीन स्कूलों के शिक्षकों का वेतन दो महीने से लंबित है।
इसके बावजूद शिक्षक इस उम्मीद में काम करते रहे कि भविष्य में व्यवस्था स्थायी होगी। लेकिन अब उन्हें इनाम में मिला है — सेवा समाप्ति का नोटिस।
8 फरवरी से नौकरी खत्म, 8 जनवरी को नोटिस
8 जनवरी को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से नर्सरी शिक्षकों को नोटिस जारी कर दिया गया, जिसमें 8 फरवरी से सेवा समाप्त करने की चेतावनी दी गई है।
यानी एक तरफ बकाया वेतन, दूसरी तरफ बेरोज़गारी — और तीसरी तरफ बच्चों की पढ़ाई पर ताला।
अर्धवार्षिक परीक्षा हो चुकी, फिर भी ताला
चारों स्कूलों को मिलाकर करीब 300 बच्चे नर्सरी कक्षाओं में पढ़ रहे हैं।
एक शिक्षिका ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि —
“दिसंबर में अर्धवार्षिक परीक्षा हो चुकी है और मार्च में फाइनल परीक्षा कराने के निर्देश मिले थे। अब अचानक कक्षाएं बंद करने की बात कही जा रही है।”
एक स्कूल पर 50 हजार महीना, फिर भी ‘फंड नहीं’
नर्सरी शिक्षकों को लगभग 20 हजार रुपए मासिक वेतन दिया जाता था।
आया और अन्य खर्च मिलाकर एक स्कूल पर हर माह करीब 50 हजार रुपए का खर्च आता था।
सवाल यह है कि क्या इतने मामूली खर्च के लिए 300 बच्चों की शिक्षा और दर्जनों शिक्षकों का भविष्य दांव पर लगाया जा सकता है?
पहले RTE में नर्सरी बंद, अब सरकारी स्कूलों में भी ताला
गौरतलब है कि इससे पहले शासन ने आरटीई के तहत निजी स्कूलों में नर्सरी से निशुल्क पढ़ाई की सुविधा पर भी रोक लगा दी थी। अब निर्देश हैं कि पहली कक्षा से ही प्रवेश दिया जाए।
यानि नर्सरी और केजी शिक्षा को व्यवस्था से बाहर करने की सुनियोजित रणनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
कलेक्टर का बयान
“नर्सरी स्कूलों के शिक्षकों को डीएमएफ मद से वेतन दिया जा रहा था। फंड उपलब्ध नहीं होने के कारण सेवा समाप्ति का नोटिस दिया गया है। स्कूल संचालन को लेकर उच्च स्तर पर चर्चा की जाएगी।”
— संजय अग्रवाल, कलेक्टर, बिलासपुर
जिला शिक्षा अधिकारी का बयान
“नर्सरी स्कूलों के लिए डीएमएफ से बजट मिलना बंद हो गया है। इसलिए आगामी सत्र से चारों स्कूलों की नर्सरी कक्षाएं बंद की जा रही हैं। यहां कार्यरत शिक्षकों को सेवा समाप्ति का नोटिस दिया गया है। 8 फरवरी के बाद पढ़ाई प्राइमरी शिक्षकों से करवाई जाएगी।”
— विजय टांडे, जिला शिक्षा अधिकारी, बिलासपुर
अभिभावकों का फूटा दर्द, कलेक्टर को सौंपा भावपूर्ण निवेदन
नर्सरी कक्षाएं बंद किए जाने से आक्रोशित अभिभावकों ने माननीय कलेक्टर के नाम भावपूर्ण आवेदन सौंपा है।
आवेदन में लिखा है कि —
“ये बच्चे बहुत छोटे हैं। अभी उन्होंने ठीक से स्कूल जाना, अक्षर पहचानना और शिक्षक पर भरोसा करना ही सीखा है। ऐसे समय में अचानक कक्षा बंद होना बच्चों के मन में डर, असुरक्षा और भ्रम पैदा करता है।”
अभिभावकों ने स्पष्ट किया कि वे गरीब और मध्यम वर्ग से आते हैं और निजी स्कूलों की भारी फीस वहन करना उनके लिए असंभव है।
आवेदन में यह भी मांग की गई है कि —
LKG कक्षा को यथावत चालू रखा जाए,
अथवा
जिन बच्चों का प्रवेश LKG में लिया गया है, उनकी LKG से 12वीं तक निरंतर, सुरक्षित और भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
राष्ट्रीय स्तर पर उठता सवाल
एक तरफ नई शिक्षा नीति में फाउंडेशनल लर्निंग की बात, दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में नर्सरी कक्षाओं पर ताला।
एक तरफ शिक्षा को अधिकार बताया जा रहा है, दूसरी तरफ फंड के नाम पर मासूम बच्चों की पढ़ाई छीनी जा रही है।
बिलासपुर की यह तस्वीर अब केवल जिला स्तर का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था की नीयत और प्राथमिकताओं पर सीधा सवाल बन चुकी है।



