
वाल्व प्रत्यारोपण के दौरान बंद हुई हृदय की नसें, अल्ट्राथिन स्टेंट से बचाई गई मरीज की जान
रायपुर। रायपुर स्थित पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय के एडवांस्ड कार्डियक इंस्टिट्यूट (ACI) ने नववर्ष 2026 की शुरुआत देशभर में चर्चा में आने वाली एक असाधारण चिकित्सकीय उपलब्धि के साथ की है। अत्यंत जटिल ट्रांसकैथेटर ऑर्टिक वाल्व प्रत्यारोपण (TAVI) प्रक्रिया के दौरान जब मरीज की हृदय की प्रमुख कोरोनरी धमनियां बंद होने की स्थिति में पहुंच गईं, तब कार्डियोलॉजी विशेषज्ञों ने अल्ट्राथिन डिलीवरी सिस्टम से स्टेंट लगाकर “चिमनी” संरचना तैयार की और मरीज की जान बचाई।
पं. नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. डॉ. विवेक चौधरी ने बताया कि कार्डियोलॉजी विभाग ने वर्ष 2025 में 2600 से अधिक जटिल हृदय प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक कीं। वर्ष 2009 में मात्र 41 मामलों से शुरू हुआ यह विभाग आज प्रतिवर्ष 2000 से अधिक उन्नत कार्डियक प्रक्रियाओं को अंजाम दे रहा है, जिससे प्रदेश ही नहीं, आसपास के राज्यों के मरीजों का भी भरोसा लगातार बढ़ा है।
कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. स्मित श्रीवास्तव के अनुसार, रायपुर निवासी एक बुजुर्ग महिला लंबे समय से सांस फूलने और हार्ट फेलियर से पीड़ित थीं। जांच में सामने आया कि उनका ऑर्टिक वाल्व पूरी तरह कैल्शियम से कठोर हो चुका था और हृदय की पंपिंग क्षमता मात्र 20 प्रतिशत रह गई थी। इस स्थिति में ओपन हार्ट सर्जरी अत्यंत जोखिमपूर्ण और लगभग असंभव मानी गई।
डॉ. स्मित श्रीवास्तव के नेतृत्व में कार्डियोलॉजी विभाग और कार्डियक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के नेतृत्व में संयुक्त “हार्ट टीम” का गठन किया गया। निर्णय लिया गया कि बिना चीर-फाड़ के पैर की नस के माध्यम से वाल्व प्रत्यारोपण किया जाएगा। प्रक्रिया से एक माह पूर्व विशेष सीटी स्कैन विश्लेषण किया गया तथा मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना के तहत वित्तीय स्वीकृति प्राप्त की गई।
जांच में यह भी सामने आया कि मरीज की पैर की नसें अत्यंत पतली और कैल्शियम युक्त थीं, जिससे वाल्व डिलीवरी सिस्टम को हृदय तक पहुंचाना बड़ी चुनौती था। इसके साथ ही जन्मजात संरचनात्मक विसंगति के कारण कोरोनरी धमनियां वाल्व के बहुत समीप थीं, जिससे वाल्व प्रत्यारोपण के दौरान दोनों धमनियों के बंद होने का गंभीर खतरा बना हुआ था।
विशेषज्ञों ने इस जोखिम से निपटने के लिए दोनों कोरोनरी धमनियों में स्टेंट डालकर वाल्व और धमनियों के बीच “चिमनी” संरचना तैयार की। प्रक्रिया के अंतिम चरण में वाल्व डिलीवरी के दौरान बाएं पैर की नस में अचानक ब्लॉकेज उत्पन्न हो गया, जिसे दाहिने पैर के रास्ते तत्काल बलून एंजियोप्लास्टी कर दूर किया गया और रक्त प्रवाह पुनः स्थापित किया गया।
लगभग चार घंटे तक चली इस जटिल प्रक्रिया के बाद ऑपरेशन टेबल पर ही ऑर्टिक वाल्व का प्रेशर 80 से घटकर शून्य हो गया। हृदय की पंपिंग क्षमता 20 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत तक पहुंच गई। दोनों कोरोनरी धमनियों में रक्त प्रवाह सामान्य रहा और हृदय की धड़कन पूरी तरह स्थिर बनी रही।
अस्पताल अधीक्षक प्रो. डॉ. संतोष सोनकर ने इस जटिलतम प्रक्रिया के लिए सभी आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की और कार्डियोलॉजी टीम को बधाई दी। यह प्रक्रिया डॉ. स्मित श्रीवास्तव के नेतृत्व में डॉ. शिवकुमार शर्मा, डॉ. कुणाल ओस्तवाल, डॉ. प्रतीक गुप्ता, डॉ. सौम्या, डॉ. वैभव एवं डॉ. प्रिंस द्वारा संपन्न की गई। कैथलैब टेक्नीशियन जितेंद्र, बद्री, प्रेमचंद तथा स्टाफ नर्स आनंद, डिगेन्द्र सहित अन्य स्टाफ का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कार्डियक एनेस्थेसियोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. बालस्वरूप साहू और डॉ. संकल्प दीवान का भी विशेष सहयोग रहा।
प्रक्रिया के बाद मरीज को हार्ट कमांड सेंटर में अति गहन निगरानी में रखा गया, जहां रिमोट व्यूइंग तकनीक के माध्यम से टेली-मॉनिटरिंग की गई। मरीज अब स्वस्थ होकर डिस्चार्ज लेकर अपने घर जा चुकी हैं। मरीज और उनके परिजनों ने एसीआई की टीम, अस्पताल प्रबंधन और छत्तीसगढ़ शासन के प्रति आभार व्यक्त किया।
केस में सामने आई प्रमुख जटिलताएं और प्रबंधन
हृदय की पंपिंग क्षमता 20 प्रतिशत होने के कारण ओपन हार्ट सर्जरी अत्यंत जोखिमपूर्ण थी, इसलिए TAVI प्रक्रिया अपनाई गई।
पैर की नसें पतली और कमजोर होने से विशेष सीटी स्कैन विश्लेषण कर अल्ट्राथिन डिलीवरी सिस्टम का उपयोग किया गया।
कोरोनरी धमनियों की ऊंचाई कम होने के कारण स्टेंट लगाकर “चिमनी” संरचना बनाई गई।
प्रक्रिया के बाद पैर की नस में ब्लॉकेज होने पर तत्काल बलून एंजियोप्लास्टी की गई।
अनहोनी की आशंका को देखते हुए ओपन हार्ट सर्जरी टीम स्टैंडबाय में रखी गई।
हृदय की धड़कन अनियमित होने की संभावना को देखते हुए 24 घंटे के लिए टेम्पररी पेसमेकर का बैकअप सुनिश्चित किया गया।



