बिलासपुर, रायपुर | देश में बच्चों की स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर चल रही योजनाओं में छत्तीसगढ़ की चिरायु योजना एक वैज्ञानिक और तकनीकी सफलता का नमूना बनकर उभर रही है। मुंगेली जिले में स्कूलों और आंगनबाड़ियों में किए जा रहे हेल्थ स्क्रीनिंग अभियान ने एक 7वीं के छात्र की जिंदगी बदल दी—एक ऐसी बीमारी जिसे अक्सर बड़े होने तक पहचान नहीं मिलती।
स्कूल हेल्थ स्क्रीनिंग में मोतियाबिंद की पहचान—एक वैज्ञानिक चमत्कार जैसा हस्तक्षेप
मुंगेली जिले के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला, झझपुरीकला (लोरमी) में चिरायु दल-‘बी’ द्वारा नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान कक्षा 7वीं के छात्र अश्वनी साहू की आंख में मोतियाबिंद का पता चला।
बच्चों में इस तरह की समस्या मिलना दुर्लभ है, लेकिन चिरायु टीम की वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया और आधुनिक उपकरणों ने शुरुआती अवस्था में ही इसे पकड़ लिया।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में मोतियाबिंद की पहचान जल्दी हो जाए तो दृष्टि हानि से बचाव की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
चिकित्सकों, तकनीक और सरकारी व्यवस्थाओं की संयुक्त सफलता
अश्वनी के पिता ओंकार साहू को बीमारी और उपचार प्रक्रिया की वैज्ञानिक जानकारी दी गई।
चिरायु टीम ने उसे आगे की जांच के लिए सिम्स हॉस्पिटल, बिलासपुर भेजा, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों ने विस्तृत परीक्षण के बाद तत्काल ऑपरेशन की सलाह दी।
अश्वनी को भर्ती कर उन्नत सर्जिकल तकनीक से मोतियाबिंद का सफल ऑपरेशन किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण—
ऑपरेशन के बाद अश्वनी की आंखों की रोशनी पूरी तरह वापस आ गई।
यह परिणाम सरकार की स्वास्थ्य नीति, वैज्ञानिक प्रयास, ऑप्थैल्मोलॉजी तकनीक और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय हेल्थ टीमों के संयुक्त प्रभाव को दर्शाता है।
ग्रामीण स्वास्थ्य में तकनीकी हस्तक्षेप की मिसाल
चिरायु योजना की स्क्रीनिंग में उपयोग होने वाले उपकरण
प्रशिक्षित मेडिकल टीम
सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध आधुनिक सर्जिकल तकनीक
और समय पर रेफरल सिस्टम
इन सभी ने मिलकर इस केस को एक मॉडल हेल्थ इंटरवेंशन में बदल दिया है।
परिजनों का आभार—सरकार की योजना बनी भविष्य की आशा
अश्वनी के माता-पिता ने शासन, प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और चिरायु टीम का धन्यवाद करते हुए कहा कि यदि स्कूल में यह जांच न होती, तो बेटे की आंखों की समस्या बढ़ती जाती।



