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नवोदय की दीवारों में मौत की गूंज, 10वीं के छात्र की जिंदगी छीन गई लापरवाही—न इलाज, न वाहन, न जिम्मेदारी… स्कूल प्रबंधन पर गंभीर आरोप

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
7 Min Read

मोहम्मद इसराइल बबलू

बिलासपुर ,रायपुर।
बिलासपुर के मल्हार स्थित पीएम श्री जवाहर नवोदय विद्यालय में पढ़ाई कर रहे 10वीं के छात्र की मौत ने पूरे सिस्टम का क्रूर चेहरा उजागर कर दिया है। बीमारी से तड़पते छात्र को समय पर इलाज नहीं मिला, वाहन तक मुहैया नहीं कराया गया, और जब बच्चे की सांसें टूट रहीं थीं—तब विद्यालय प्रबंधन पूरी तरह गायब था। देर से मिली मेडिकल सहायता और बदइंतजामी ने आखिरकार एक मासूम की जिंदगी छीन ली।


कहाँ चूका सिस्टम?
बेलगहना निवासी हर्षित यादव, जो नवोदय विद्यालय में कक्षा 10वीं का छात्र था, बीते दिनों अचानक बीमार पड़ गया। उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन हॉस्टल प्रबंधन की ओर से न तो पर्याप्त देखभाल की गई और न ही समय पर डॉक्टर बुलाया गया।
जब उसकी तबीयत गंभीर रूप से खराब हुई, तब स्कूल की ओर से उसके पिता को फोन किया गया। पिता जैसे तैसे बाइक से स्कूल पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें और बड़ा झटका लगा—

पिता बोले– “बेटा बच सकता था… पर स्कूल ने हाथ खड़े कर दिए”


बिलासपुर के मल्हार स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में पढ़ने वाले कक्षा 10वीं के छात्र की मौत ने संस्थान की सुविधाओं, प्रबंधन की कार्यशैली और छात्रों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीमारी से पीड़ित छात्र को समय पर इलाज नहीं मिला, वाहन उपलब्ध नहीं था, और प्रबंधन की अनदेखी के बीच उसकी जान चली गई। पिता का आरोप है—“अगर समय पर उपचार मिलता, तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।”
घटनाक्रम: कैसे एक छात्र मौत की ओर धकेला गया
शनिवार 22 नवंबर | सुबह 10:30 बजे — स्कूल से आया फोन
बेलगहना निवासी हर्षित यादव (कक्षा 10वीं) के पिता को स्कूल की ओर से फोन आया। बताया गया कि हर्षित की तबीयत खराब है।
पिता तुरंत 90 किलोमीटर दूर मल्हार स्थित नवोदय विद्यालय पहुंचे
हॉस्टल की हालत देख पिता स्तब्ध
पिता ने बताया—
कमरे में सीलन
खिड़की-दरवाजे टूटे
सुबह 5 बजे ठंड में नहलाया जाता है
बाथरूम में लगातार पानी बहता रहता है
नाली निकलकर खाना वाले क्षेत्र तक पहुंच रही है
सांप-बिच्छू तक दिख चुके हैं
विद्यालय में गाड़ी नहीं—प्राचार्य वाहन लेकर बाहर
हर्षित की हालत गंभीर थी। पिता ने अस्पताल ले जाने वाहन मांगा तो जवाब मिला—
“गाड़ी नहीं है… प्राचार्य तीन दिन से मीटिंग में लेकर गए हैं।”
स्टाफ ने पिता को बाइक में बच्चे को बैठाकर ले जाने की सलाह दी।
पिता ने कहा—
“वह बैठने की हालत में नहीं था, पर मजबूरी थी… अकेले पकड़कर बाइक से लाया।”
शाम — बिलासपुर के निजी अस्पताल में जांच
डॉक्टरों ने बताया—
हर्षित को गंभीर न्यूमोनिया है।
दवाएं देकर घर भेज दिया गया।
रविवार — बच्चा घर पर, तबीयत बिगड़ चुकी थी
दिखाई दे रही बीमारी और कमजोरी के बावजूद प्रबंधन ने न तो हालचाल पूछा, न सहायता दी।
सोमवार सुबह — अचानक बेहोश
सुबह हालत गंभीर होने पर परिवार ने फिर अस्पताल का रुख किया।
इस बार बच्चे को आईसीयू में भर्ती किया गया।
डॉक्टरों ने कहा—
“उसे बहुत देर से लाया गया… पहले लाते तो बच सकता था। सुबह — जिंदगी की डोर टूट गई
इलाज के दौरान सोमवार देर रात और मंगलवार सुबह के बीच बच्चे ने दम तोड़ दिया।
परिवार का आरोप: मौत नहीं, लापरवाही की हत्या
हर्षित के पिता ने आंसुओं के साथ कहा—
“स्कूल ने मदद नहीं की।”
“समय पर वाहन और इलाज मिलता तो मेरा बेटा नहीं मरता।”
“एक ही बेटा था… वही मेरा सहारा था।”
उन्होंने विद्यालय प्रबंधन पर कार्यवाही की मांग की।
नवोदय हॉस्टल की हकीकत
समस्यास्थितिखिड़की-दरवाजेटूटे और खुलेबाथरूमगंदगी और रिसावसुरक्षासांप-बिच्छू तक दाखिलस्वास्थ्य व्यवस्थानाममात्र की नर्समौसमठंड में सुबह 5 बजे नहलानासंरचनासीलन और बदबूदार कमरों में छात्र
जिम्मेदार कौन?
प्राचार्य वाहन लेकर बाहर
स्टाफ का गैरजिम्मेदार रवैया
कोई मेडिकल एस्कॉर्ट सिस्टम नहीं
हॉस्टल में सालों से समस्या, शिकायतों के बावजूद सुधार नहीं
हर्षित 6वीं क्लास से नवोदय में पढ़ रहा था। मकसद बड़ा था, सपने बड़े थे। लेकिन लापरवाही ने उससे उसकी जिंदगी छीन ली।


छात्र को अस्पताल ले जाने के लिए एक वाहन तक उपलब्ध नहीं था।
कारण बताया गया—प्राचार्य वाहन लेकर बाहर गए हुए थे।
बीमार बच्चे को ले जाने के लिए पिता और हॉस्टल स्टाफ को संघर्ष करना पड़ा और आखिरकार निजी व्यवस्था के सहारे उसे बिलासपुर लाया गया।
इलाज के दौरान दम तोड़ा, स्कूल की कोई मदद नहीं
बिलासपुर के एक निजी अस्पताल में बच्चा जिंदगी और मौत के बीच लड़ता रहा। इस दौरान:
स्कूल की ओर से कोई वित्तीय मदद नहीं
न मेडिकल प्रोटोकॉल
न शिक्षक या प्रबंधन की उपस्थिति
हर्षित जिंदगी की लड़ाई हार गया और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
परिवार और अन्य अभिभावकों का आरोप है—
“समय पर इलाज मिलता, तो हर्षित आज जिंदा होता।”
हॉस्टल की हालत—एक सरकारी संस्थान नहीं, बीमारियों की प्रयोगशाला
जांच और मीडिया रिपोर्ट्स में नवोदय विद्यालय की हॉस्टल की स्थिति बेहद भयावह सामने आई है:
समस्यास्थितिकमरेसीलन, टूटी दीवारेंटॉयलेटदरवाजे नहीं, मक्खियों और बदबू से भरेपानी प्रबंधनबाथरूम का पानी बरामदे तकसुरक्षामेन गेट टूटा हुआस्वच्छताजगह-जगह कचरा जमास्वास्थ्य खतराहैजा, डायरिया और संक्रमण का जोखिम
4 बार भेजा गया प्रस्ताव, लेकिन फंड नहीं—बच्चे भुगत रहे कीमत
हॉस्टल और परिसर की मरम्मत के लिए स्कूल ने साल 2022 से अब तक 6.60 करोड़ रुपये के 4 प्रस्ताव भेजे, लेकिन किसी को मंजूरी नहीं मिली।
जबकि नियम है—हर नवोदय विद्यालय को सालाना 90 लाख से 1 करोड़ का बजट मिलता है और प्रति छात्र लगभग 85,000 रुपये सालाना खर्च निर्धारित है।
तो सवाल बड़ा है—
पैसा कहां जा रहा है? और छात्रों का हक कौन निगल रहा है?
प्रबंधन का बयान
“मरम्मत के लिए प्रस्ताव भेजा गया है, फंड स्वीकृति का इंतजार है।”

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