मोहम्मद इसराइल बबलू
रायपुर/बिलासपुर।छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर सियासी और प्रशासनिक भूकंप आ गया है। राज्य की 2058 सहकारी समितियों के कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है। पांच दिनों से जारी आंदोलन अब उग्र रूप ले चुका है। कर्मचारियों ने सरकार को साफ चेतावनी दी है— “मांगें नहीं मानीं तो 12 नवंबर से खरीदी केंद्रों में ताला लग जाएगा।”सरकार के मंत्रियों से लेकर सचिवालय तक घबराहट का माहौल है, मगर फील्ड में तैनात कर्मचारी अब पीछे हटने को तैयार नहीं।
आरोप — “सरकार बार-बार भरोसा तोड़ रही, किसानों और कर्मचारियों दोनों से धोखा”
छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी समिति कर्मचारी संघ ने अपने प्रेस विज्ञप्ति में सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कहा गया है कि धान खरीदी नीति को लेकर सरकार जानबूझकर असमंजस की स्थिति पैदा कर रही है। न तो खरीदी नीति घोषित की गई है, न वित्तीय स्वीकृति जारी हुई है, और न ही कर्मचारियों के बकाए व वेतन विसंगतियों पर कोई निर्णय हुआ है।
संघ का आरोप है कि हर बार सरकार किसानों के नाम पर घोषणा करती है, लेकिन समितियों को फंड और दिशा-निर्देश देने में महीनों लगा देती है। इस वजह से खरीदी केंद्रों की तैयारी पूरी तरह ठप है।
“हमने हर साल किसानों की फसल को सहेजा, लेकिन अब सरकार ही असहयोगी बन गई है। अगर समय पर निर्णय नहीं हुआ, तो इस बार कोई केंद्र नहीं खुलेगा।”
— बी.एल. दुबे, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ सहकारी समिति कर्मचारी संघ
चार सूत्रीय मांगें — जिन पर टिकेगा आंदोलन
- धान खरीदी नीति 2024-25 की घोषणा तत्काल की जाए।
- पिछले सत्र 2023-24 के बकाया वेतन, महंगाई भत्ता व सेवा विसंगतियों का निराकरण।
- कर्मचारियों की सेवा स्थायित्व नीति लागू की जाए।
- सहकारी समितियों को वित्तीय स्वीकृति व फंड रिलीज़ किया जाए।
पांच दिन से जमी हैं समितियां, अब खरीदी बहिष्कार की चेतावनी
संघ ने बताया कि 24 अक्टूबर से राज्यभर के कर्मचारी आंदोलनरत हैं। 28 अक्टूबर को ज्ञापन सौंपा गया, पर सरकार ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। अब संगठन ने अंतिम अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि 11 नवंबर तक निर्णय नहीं हुआ, तो 12 नवंबर से धान खरीदी का पूर्ण बहिष्कार किया जाएगा।
इससे प्रदेश के करीब तीन हजार खरीदी केंद्रों में तालाबंदी की स्थिति बन जाएगी।
किसानों में हड़कंप, सरकार मौन
खरीदी की तारीख तय न होने से किसान परेशान हैं। धान की फसल तैयार है, लेकिन केंद्रों पर न तो कर्मचारियों की तैनाती है, न खरीदी की व्यवस्था। किसान संगठनों का कहना है कि अगर यही हाल रहा, तो हजारों टन धान खुले में सड़ जाएगा।
प्रशासन की चुप्पी पर कर्मचारियों ने सवाल उठाया है— “क्या सरकार चाहती है कि किसान सड़क पर उतरें?”
राजनीतिक गर्मी भी बढ़ी
विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को सरकार की “किसान-विरोधी नीति” करार दिया है। कांग्रेस नेता विंध्य राज तिवारी ने कहा,
“सरकार किसानों के नाम पर घोषणा करती है, लेकिन असल में समितियों और खरीदी अमले को अनदेखा करती है। अगर यही रवैया रहा, तो प्रदेश में खरीदी व्यवस्था ढह जाएगी।”
राष्ट्रीय असर — देश की धान सप्लाई पर भी संकट
विशेषज्ञों का कहना है कि छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में से एक है। यदि यहां धान खरीदी ठप होती है, तो इसका सीधा असर राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य भंडारण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) पर पड़ेगा।
अंतिम चेतावनी
“सरकार को 11 नवंबर तक समय है। उसके बाद न फाइल चलेगी, न खरीदी केंद्र खुलेंगे। हमने किसान और कर्मचारी—दोनों की लड़ाई साथ लड़ी है, और अब पीछे हटने का सवाल नहीं।”
— छत्तीसगढ़ सहकारी समिति कर्मचारी संघ, रायपुर
असंतोष का विस्फोट
राज्य सरकार के लिए यह अब केवल कर्मचारी आंदोलन नहीं, बल्कि किसान असंतोष का विस्फोट बनता जा रहा है। अगर सरकार ने त्वरित निर्णय नहीं लिया, तो धान खरीदी 2024-25 का पूरा सत्र ठप होने का खतरा वास्तविक है — और यह संकट सीधा दिल्ली तक गूंज सकता है।



