मोहम्मद इसराइल बबलू
बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी के दौरान सहकारी समितियों और कंप्यूटर आपरेटरों की लंबित मांगों को लेकर अब आंदोलन अपने निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। छत्तीसगढ़ सहकारी समिति कर्मचारी महासंघ और छत्तीसगढ़ समर्थन मूल्य धान खरीदी आपरेटर संघ के बैनर तले प्रदेशभर के कर्मचारी अनिश्चितकालीन आंदोलन पर उतर आए हैं। रायपुर के कॉनर गार्डन में हजारों कर्मचारियों ने मंगलवार को ‘महा हुंकार रैली’ निकालते हुए सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा — “अब वादे नहीं, कार्रवाई चाहिए… नहीं तो धान खरीदी का बहिष्कार तय है।”








आंदोलन का स्वरूप — सरकार को खुली चेतावनी
आंदोलन की रूपरेखा के अनुसार 24 अक्टूबर को सभी 33 जिलों में ज्ञापन रैली, 28 अक्टूबर को प्रदेश स्तरीय महा हुंकार, और 3 से 11 नवंबर तक संभागवार धरना प्रदर्शन के बाद 12 नवंबर से अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू हो गया है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि चार सूत्रीय मांगों पर तत्काल निर्णय नहीं लिया गया, तो इस वर्ष की धान खरीदी पूरी तरह ठप कर दी जाएगी।
🔹 मुख्य चार सूत्रीय मांगे
1️⃣ धान खरीदी की वास्तविक लागत का भुगतान —
धान परिवहन में विलंब और मिलरों द्वारा समय पर उठाव न करने से समितियों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। मार्कफेड रायपुर द्वारा सुखत राशि और सुरक्षा व्यय का पैसा काटने पर कर्मचारियों को महीनों तक वेतन नहीं मिल रहा। संघ की मांग है कि संपूर्ण सुखत राशि समितियों को दी जाए, और प्रत्येक सप्ताह धान परिवहन अनिवार्य किया जाए।
2️⃣ कंप्यूटर आपरेटरों का नियमितीकरण —
2007-08 से लगातार संविदा पर काम कर रहे कंप्यूटर ऑपरेटरों की जगह आउटसोर्सिंग व्यवस्था लागू करना संघ ने “न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ” बताया है। उनका कहना है कि विभाग सीधे नियोजन करे और वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित करे।
3️⃣ सहकारी समितियों को प्रबंधकीय अनुदान —
प्रदेश की 2058 समितियों में कार्यरत कर्मचारियों को मध्यप्रदेश की तर्ज पर प्रति वर्ष 3-3 लाख रुपए का प्रबंधकीय अनुदान देने की मांग की गई है ताकि समय पर वेतन और संचालन खर्च पूरे किए जा सकें।
4️⃣ श्री कांडे कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की मांग —
इसमें भविष्य निधि, महंगाई भत्ता, ईएसआईसी सुविधा, बोनस अंक और बैंक केडर पदों में समिति कर्मचारियों के लिए 50% आरक्षण की अनुशंसा है। संघ ने सरकार से इसे तत्काल लागू करने की मांग की है।
🔹 “18 साल की सेवा, फिर भी अस्थिर भविष्य!”
संघ पदाधिकारियों ने कहा कि वर्ष 2007 से निरंतर काम कर रहे धान खरीदी ऑपरेटर आज भी संविदा या आउटसोर्सिंग के भरोसे हैं। शासन ने कई बार आश्वासन दिए, मीटिंग भी हुईं — लेकिन नतीजा ‘शून्य’ रहा। कर्मचारियों का कहना है कि यह श्रम का शोषण है, और अब संघर्ष ही अंतिम रास्ता है।
🔹 शासन से जुड़ी पृष्ठभूमि
पिछले वर्ष आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री की पहल पर एक कोर कमेटी बैठक भी हुई थी। उस दौरान अपर मुख्य सचिव (खाद्य विभाग) ने वित्त विभाग को सुखत भुगतान हेतु प्रस्ताव भेजा था, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। इसी के विरोध में अब कर्मचारी एकजुट होकर मैदान में हैं।
🔹 “धान खरीदी रुकेगी तो किसान भी प्रभावित होंगे”
आंदोलन का असर अब सीधा किसानों तक पहुंच सकता है। प्रदेश के 2739 उपार्जन केंद्रों में यही कर्मचारी खरीदी और रिकॉर्डिंग का जिम्मा संभालते हैं। यदि इनका आंदोलन लंबा खिंचता है, तो धान खरीदी की प्रक्रिया ठप पड़ जाएगी और हजारों किसान भुगतान से वंचित रह जाएंगे।
🔹 नेताओं की गरज — “अब फैसले का वक्त”
संघ के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा,
“हमारी आवाज अब पीछे नहीं हटेगी। यदि हमारी चार सूत्रीय मांगें पूरी नहीं हुईं, तो धान खरीदी को हम स्वयं रोक देंगे। शासन जितनी देरी करेगा, उतनी असंतोष की आग बढ़ेगी।”
🔹 सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण मोड़
धान खरीदी छत्तीसगढ़ सरकार की सबसे बड़ी कृषि नीति और जनकल्याण योजना मानी जाती है। ऐसे में 15,000 से अधिक कर्मचारी और ऑपरेटरों का आंदोलन शुरू होना सरकार के लिए सीधी चुनौती है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह मामला राज्यव्यापी आर्थिक और राजनीतिक संकट का रूप ले सकता है।
एक बड़ा सवाल
यह आंदोलन सिर्फ वेतन या सुखत भुगतान का मुद्दा नहीं है — यह छत्तीसगढ़ के सहकारिता ढांचे की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल बन गया है। सवाल उठता है —
👉 आखिर 18 वर्षों की सेवा के बाद भी स्थायित्व क्यों नहीं?
👉 किसानों की धान खरीदी नीति में पारदर्शिता कौन सुनिश्चित करेगा?
👉 और क्या सरकार इस बार आंदोलन को सुनकर निर्णय लेगी, या फिर वही पुराना इंतज़ार?



