मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड से सांसदों की नाराजगी तक, अफसरशाही पर सवाल और संगठन को दोटूक संदेश—छत्तीसगढ़ भाजपा में नए सत्ता-समीकरणों की आहट या 2028 की चुनावी बिसात का आगाज?
Md israil| रायपुर, बिलासपुर
छत्तीसगढ़ के सियासी गलियारों में इस बार चर्चा किसी बड़े स्वागत समारोह की नहीं, बल्कि उस प्रभारी की रही, जिसने स्वागत की चमक से ज्यादा संगठन की हकीकत देखने में दिलचस्पी दिखाई। न ढोल-नगाड़ों का शोर, न फूलों की औपचारिकता, न होर्डिंग्स के जरिए शक्ति प्रदर्शन की चमक। छत्तीसगढ़ भाजपा की नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी के पहले प्रवास ने शुरुआत से ही यह संकेत दे दिया कि उनका एजेंडा महज परिचय और औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं है।
25 और 26 अक्टूबर के दो दिवसीय रायपुर दौरे में स्मृति ईरानी ने भाजपा के संगठनात्मक ढांचे से लेकर सत्ता के गलियारों तक संवाद का ऐसा सिलसिला चलाया, जिसमें पूर्व मंत्री-विधायकों की नाराजगी, वर्तमान सांसदों की शिकायतें, मंत्रियों के विभागीय कामकाज, अफसरशाही की भूमिका और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा जैसे मुद्दे सामने आए। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उपमुख्यमंत्री अरुण साव और विजय शर्मा सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में उठे सवालों ने इस दौरे को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया।
टेलीविजन की दुनिया से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने वाली स्मृति ईरानी की कार्यशैली को उनके प्रशंसक सख्त नेतृत्व के रूप में देख सकते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक प्रबंधन का तरीका मान सकते हैं। लेकिन इस दौरे की असली कहानी उनकी छवि से आगे है। सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ भाजपा में सत्ता और संगठन के बीच मौजूद बताई जा रही दूरी को कम करने के लिए अब जवाबदेही का नया दौर शुरू होने जा रहा है?
स्वागत का प्रोटोकॉल बदला, संदेश सीधे बूथ तक पहुंचा
स्मृति ईरानी के रायपुर आगमन पर स्वागत का अंदाज ही चर्चा का विषय बन गया। एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए 16 नेताओं को बुलाए जाने की जानकारी सामने आई। किसी मंत्री को वहां प्रवेश नहीं दिया गया और स्वागत में ढोल-नगाड़ों का इस्तेमाल भी नहीं हुआ। इसके बाद जब वह भाजपा कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर पहुंचीं, तब भी फूलों और औपचारिक स्वागत की परंपरा को प्राथमिकता नहीं दी गई।
कार्यालय के प्रवेश द्वार पर लगाए गए स्वागत होर्डिंग्स हटवाए गए। परिचय के बाद नेताओं को दोटूक संदेश दिया गया—स्वागत हो गया, अब बूथ पर जाइए। कार्यालय में वही लोग रुकें, जिन्हें बैठक में शामिल होना है।
बैठक की व्यवस्था भी सामान्य राजनीतिक मेल-मिलाप से अलग रही। प्रवेश के लिए पंजीयन कराया गया। नेताओं के सहायकों, पीएसओ और पुलिसकर्मियों को भी भीतर प्रवेश नहीं मिला। एक कार्यकर्ता ने सेल्फी लेने की कोशिश की तो उसे रोक दिया गया। बैठक के अलावा अन्य नेताओं से मुलाकात को भी सीमित रखा गया।
राजनीतिक संदेश स्पष्ट था—संगठनात्मक बैठकें व्यक्तिगत संपर्क, स्वागत और शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि कामकाज की समीक्षा का माध्यम होंगी। हालांकि, इस प्रोटोकॉल को प्रदेश भाजपा में स्थायी शक्ति परिवर्तन का प्रमाण मानने के बजाय इसे प्रभारी की शुरुआती कार्यशैली के संकेत के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
‘नायिका’ की छवि से आगे…राजनीति में सख्ती का संदेश
स्मृति ईरानी की पहचान केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं बनी। टेलीविजन धारावाहिकों से लोकप्रियता हासिल करने के बाद उन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाई और राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाई। यही वजह है कि उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली को लेकर सार्वजनिक दिलचस्पी भी अधिक रहती है।
लेकिन छत्तीसगढ़ प्रवास में चर्चा उनकी लोकप्रियता से ज्यादा उनके प्रशासनिक और संगठनात्मक अंदाज की रही। सीमित स्वागत, स्पष्ट प्रोटोकॉल, रिपोर्ट कार्ड के आधार पर समीक्षा और शिकायतों को सीधे सुनने की प्रक्रिया ने यह संकेत दिया कि वह प्रदेश भाजपा के कामकाज को केवल संगठन की प्रस्तुतियों के आधार पर नहीं देखना चाहतीं।
यहां ‘नायिका स्टाइल’ का राजनीतिक अर्थ भी बदल जाता है। पर्दे पर पहचान बनाने वाली शख्सियत का राजनीतिक व्यक्तित्व अब बैठकों, जवाबदेही और संगठनात्मक अनुशासन के जरिए परखा जा रहा है। असली सवाल यह नहीं कि उनका अंदाज कितना सख्त था, बल्कि यह है कि उस सख्ती का असर पार्टी के कामकाज में कितना दिखाई देगा।
‘मन की बात’ में बूथ अध्यक्ष को पहली पंक्ति ,संगठन का मूल मंत्र
रायपुर पहुंचने के बाद स्मृति ईरानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में शामिल होने अभनपुर पहुंचीं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भी उनके साथ थे। कार्यक्रम के दौरान बूथ अध्यक्ष पीछे बैठे थे। ईरानी ने पूछा कि बूथ अध्यक्ष कौन हैं और उन्हें आगे बुलाकर पहली पंक्ति में बैठाया।
यह दृश्य उनके दौरे के सबसे प्रतीकात्मक क्षणों में शामिल रहा। भाजपा की चुनावी संरचना में बूथ स्तर का कार्यकर्ता पार्टी और मतदाता के बीच महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। बूथ अध्यक्ष को आगे बैठाने का संदेश संगठन के निचले स्तर को महत्व देने की पार्टी की घोषित प्राथमिकता के अनुरूप था।
लेकिन प्रतीकात्मक सम्मान के साथ एक व्यावहारिक सवाल भी जुड़ता है। क्या बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनी जाती हैं? क्या उन्हें स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने का अवसर मिलता है? क्या सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में उनकी भूमिका को महत्व दिया जाता है?
यदि बूथ अध्यक्ष को संगठन की पहली पंक्ति में स्थान दिया जाता है, तो उसकी समस्याओं का समाधान भी संगठन की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। यही वह कसौटी है, जिस पर इस संदेश की वास्तविक उपयोगिता परखी जाएगी।
संगठन से सत्ता तक पूरा हिसाब
भाजपा कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में बैठकों का सिलसिला दो दिनों तक चला। पहले दिन प्रदेश अध्यक्ष किरण देव और संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह के साथ चर्चा हुई। इसके बाद प्रदेश पदाधिकारियों, संभाग प्रभारियों, सह प्रभारियों, जिला प्रभारियों, सह प्रभारियों और जिला अध्यक्षों के साथ समीक्षा की गई। पूर्व सांसदों और पूर्व विधायकों से भी संवाद हुआ।
दूसरे दिन विधायकों, लोकसभा और राज्यसभा सांसदों, मंत्रियों तथा पार्टी के कोर ग्रुप के साथ अलग-अलग बैठकें हुईं। निगम-मंडल और आयोगों के अध्यक्षों-उपाध्यक्षों से चर्चा के साथ विचार परिवार के प्रमुख पदाधिकारियों के साथ संवाद भी कार्यक्रम का हिस्सा रहा।
इन बैठकों का महत्व उनके दायरे में छिपा था। संगठन के अलग-अलग स्तरों से मिली शिकायतों और सुझावों को सरकार के कामकाज से जोड़कर देखने का अवसर मिला। पूर्व जनप्रतिनिधियों की नाराजगी, वर्तमान सांसदों के आरोप और मंत्रियों के विभागीय प्रदर्शन पर सवाल एक ही व्यापक विषय की ओर इशारा कर रहे थे—सरकार और संगठन के बीच तालमेल कितना प्रभावी है?
पूर्व मंत्री-विधायकों की शिकायत: ‘अफसरशाही हावी है’
पूर्व मंत्री-विधायकों के साथ हुई बंद कमरे की बैठक में कथित तौर पर सबसे प्रमुख शिकायत अफसरशाही के प्रभाव को लेकर सामने आई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 74 पूर्व मंत्री-विधायकों के साथ हुई चर्चा में नेताओं ने आरोप लगाया कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते और उनकी सिफारिशों पर कार्रवाई नहीं होती। कुछ मंत्रियों के खिलाफ उपेक्षा के आरोप भी लगाए गए।
पूर्व जनप्रतिनिधियों की नाराजगी केवल सरकारी कामकाज तक सीमित नहीं बताई गई। उन्होंने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों में उन्हें सम्मान के साथ आमंत्रित नहीं किया जाता। कुछ जिलों का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया गया कि अधिकारी खुद कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बन जाते हैं और पूर्व जनप्रतिनिधियों को बैठकों तक की सूचना नहीं मिलती।
इसी वजह से कई नेताओं के सामाजिक कार्यक्रमों तक सीमित हो जाने की बात भी सामने आई। उनका कहना था कि यदि उन्हें सम्मानपूर्वक बुलाया जाएगा, तो वे सरकारी कार्यक्रमों में भी भाग लेंगे।
स्मृति ईरानी अपने साथ एक रिपोर्ट कार्ड लेकर आई थीं। उन्होंने कार्यक्रमों में नेताओं की भागीदारी का विषय भी उठाया। इस पर पूर्व जनप्रतिनिधियों की ओर से सम्मान और संवाद की अपेक्षा जताई गई।
यहां एक दिलचस्प राजनीतिक विरोधाभास दिखाई देता है। संगठन अपने पुराने नेताओं की सक्रियता चाहता है, लेकिन उन्हीं नेताओं को यह शिकायत है कि सरकारी तंत्र में उनकी बात सुनी नहीं जाती। यदि यह स्थिति व्यापक है, तो इसका असर स्थानीय स्तर पर संगठन की सक्रियता और सरकार के प्रति कार्यकर्ताओं के भरोसे पर पड़ सकता है। हालांकि, इन शिकायतों की व्यापकता और प्रत्येक मामले की सत्यता का आकलन स्वतंत्र पुष्टि के बाद ही किया जा सकता है।
सांसदों की शिकायतें मुख्यमंत्री के सामने: जनप्रतिनिधियों की सुनवाई कहां?
पूर्व जनप्रतिनिधियों के बाद वर्तमान सांसदों की बैठक में भी मंत्रियों और प्रशासन के साथ समन्वय का सवाल उठा। रिपोर्टों के अनुसार, सांसदों ने शिकायत की कि उनकी सिफारिशों पर काम नहीं होता। कुछ ने कहा कि कार्यकर्ता उनसे केवल पत्र लिख देने को कहते हैं, जबकि काम दूसरे रास्तों से करा लेने का दावा करते हैं।
एक सांसद ने अधिकारियों पर आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया। यह बैठक में व्यक्त आरोप था, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसके बावजूद ऐसी शिकायतों का पार्टी के वरिष्ठ स्तर तक पहुंचना प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के रिश्तों पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
बताया गया कि चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री अरुण साव तथा विजय शर्मा को भी शामिल किया गया। सांसदों ने उनके सामने अपनी समस्याएं दोहराईं। एक सांसद ने कथित तौर पर कहा कि जब केंद्रीय राज्य मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष तक की बात नहीं सुनी जाती, तो दूसरे जनप्रतिनिधियों की स्थिति समझी जा सकती है।
यह केवल व्यक्तिगत सिफारिशों का विवाद नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सांसदों और विधायकों की भूमिका जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने की भी होती है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशासनिक तंत्र तक पहुंचने में कठिनाई होती है, तो स्थानीय समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसलिए सवाल यह है कि शिकायतों को सुनने और उनके निस्तारण का कोई प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध तंत्र मौजूद है या नहीं। स्मृति ईरानी की बैठकों में उठे मुद्दे इसी संस्थागत प्रश्न को सामने लाते हैं।
ढाई साल से लंबित ट्रांसफर…एक शिकायत और मुख्यमंत्री की त्वरित कार्रवाई
दौरे के दौरान पूर्व सांसद गोविंद मिरी से जुड़ा स्थानांतरण प्रकरण भी चर्चा में आया। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने शिकायत की थी कि वह लगभग ढाई साल से अपनी बेटी के ट्रांसफर के लिए प्रयास कर रहे थे।
बताया गया कि स्मृति ईरानी ने मुख्यमंत्री निवास पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सामने यह विषय उठाया। इसके बाद मुख्यमंत्री ने मामले की फाइल मंगवाई और स्थानांतरण आदेश जारी किया। सोमवार को भाजपा कार्यालय पहुंचने पर आदेश की प्रति भी प्रभारी को सौंपी गई। स्मृति ईरानी ने संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह से आदेश पूर्व सांसद तक पहुंचाने के लिए कहा।
इस घटनाक्रम को एक शिकायत पर त्वरित कार्रवाई के उदाहरण के तौर पर देखा गया। लेकिन इसके साथ एक बड़ा प्रशासनिक सवाल भी जुड़ता है—यदि कोई प्रकरण लंबे समय से लंबित था और राजनीतिक स्तर पर हस्तक्षेप के बाद आगे बढ़ा, तो आम नागरिकों और कर्मचारियों के लंबित मामलों का समाधान किस प्रक्रिया से होगा?
एक मामले में कार्रवाई पूरे प्रशासनिक तंत्र की स्थिति का प्रमाण नहीं है। फिर भी यह प्रकरण शिकायतों के निस्तारण, लंबित फाइलों की समीक्षा और समयबद्ध निर्णय प्रक्रिया की जरूरत को रेखांकित करता है।
मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड: किस विभाग में कितनी जवाबदेही?
स्मृति ईरानी मंत्रियों की बैठक में विभागीय कामकाज और शिकायतों से संबंधित रिपोर्ट लेकर पहुंची थीं। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने मंत्रियों से उनके विभागों की स्थिति, कामकाज और शिकायतों के आधार पर जवाब मांगा।
मंत्री दयालदास बघेल को लेकर अधिक शिकायतें सामने आने की बात कही गई। उनसे कथित तौर पर कहा गया कि विभाग में उनकी मौजूदगी और सक्रियता दिखाई देनी चाहिए। मंत्री टंकराम वर्मा और श्याम बिहारी जायसवाल को भी विभागीय कामकाज सुधारने की हिदायत दिए जाने की जानकारी सामने आई।
शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव से फर्जी ट्रांसफर के मामलों पर सवाल पूछे गए। उनसे पूछा गया कि विभाग में ऐसे मामले कैसे सामने आ रहे हैं और उन्हें रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत बताई गई। अन्य मंत्रियों को विभागीय बजट समय पर खर्च करने और कामकाज में तेजी लाने के निर्देश दिए जाने का विवरण भी सामने आया।
इन चर्चाओं का राजनीतिक महत्व इसलिए है कि मंत्रियों का मूल्यांकन केवल विभागीय घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन और शिकायतों के समाधान से भी जुड़ा है। यदि किसी विभाग में अनियमितताओं या प्रशासनिक समस्याओं की शिकायतें आती हैं, तो यह देखना जरूरी होता है कि विभागीय नेतृत्व ने उन्हें रोकने और सुधारने के लिए क्या कदम उठाए।
रिपोर्ट कार्ड अपने आप में अंतिम फैसला नहीं है। उसकी उपयोगिता इस बात में है कि समीक्षा के बाद क्या सुधार किए जाते हैं, शिकायतों की जांच कैसे होती है और विभागीय प्रदर्शन में कितना बदलाव आता है।
प्रभारी जिलों में नहीं जाते मंत्री तो प्रभार क्यों?
मंत्रियों की बैठक में प्रभारी जिलों के दौरे का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। रिपोर्टों के अनुसार, स्मृति ईरानी अपने साथ यह विवरण लेकर आई थीं कि किस मंत्री ने कितनी बार अपने प्रभार वाले जिले का दौरा किया है।
उन्होंने कथित तौर पर कहा कि जो मंत्री नियमित रूप से प्रभारी जिलों में नहीं जाते, उनसे जिले का प्रभार वापस लेने पर विचार होना चाहिए। प्रभारी मंत्री की भूमिका सरकार और संगठन के बीच समन्वय स्थापित करने की होती है। इसके लिए स्थानीय समस्याओं को समझना, योजनाओं की समीक्षा करना और कार्यकर्ताओं से संवाद करना जरूरी है।
स्मृति ने मंत्रियों को पहले कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनने और फिर प्रशासनिक बैठकों में जाने की सलाह दी। दीपावली जैसे त्योहारों पर प्रभारी जिलों में कार्यकर्ताओं के साथ मिलन कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव भी दिया गया।
यहां मुद्दा केवल दौरे की संख्या का नहीं है। किसी मंत्री की क्षेत्र में मौजूदगी का वास्तविक महत्व इस बात से तय होता है कि स्थानीय समस्याओं पर क्या कार्रवाई हुई, सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक कितना पहुंचा और प्रशासनिक व्यवस्था में कितना सुधार आया।
फिर भी, प्रभारी जिलों में नियमित उपस्थिति का सवाल सरकार और संगठन के बीच संबंधों की समीक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि मंत्री जिलों में नहीं पहुंचते, तो स्थानीय कार्यकर्ताओं और प्रशासन के बीच संवाद का एक अहम माध्यम कमजोर पड़ सकता है।
2028 की बिसात…. आज की शिकायत, कल की संगठनात्मक चुनौती
स्मृति ईरानी ने बैठकों में सत्ता और संगठन के बीच तालमेल बढ़ाने, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने, संवाद मजबूत करने और जनता के बीच सक्रिय रहने पर जोर दिया। विधायकों को दीपावली पर अपने-अपने क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं के साथ भोज आयोजित करने की सलाह दी गई।
विधायकों के साथ सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और जनता से सीधे संवाद पर चर्चा हुई। सांसदों को केंद्रीय योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने और विकास कार्यों की निगरानी पर ध्यान देने के लिए कहा गया। मंत्रियों को विभागीय कामकाज, बजट खर्च और प्रशासनिक समन्वय सुधारने की हिदायत दी गई।
इन निर्देशों को एक साथ देखें, तो पार्टी की प्राथमिकता सामने आती है—सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाना, संगठन के कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना और जनप्रतिनिधियों की शिकायतों के समाधान के लिए संवाद मजबूत करना।
2028 के विधानसभा चुनाव का संदर्भ इस कवायद को महत्वपूर्ण बनाता है। रिपोर्टों के अनुसार, स्मृति ईरानी ने चेतावनी दी कि सत्ता और संगठन के बीच यही स्थिति बनी रही, तो आगे मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसे चुनावी परिणाम का पूर्वानुमान नहीं, बल्कि संगठनात्मक तालमेल की आवश्यकता पर दिए गए संदेश के रूप में देखना चाहिए।
किसी भी राजनीतिक दल के लिए सरकार चलाना और संगठन को सक्रिय बनाए रखना अलग-अलग, लेकिन परस्पर जुड़े दायित्व हैं। यदि सरकारी कामकाज को लेकर असंतोष है और संगठन के कार्यकर्ताओं को अपनी बात पहुंचाने में कठिनाई होती है, तो इन समस्याओं को समय रहते दूर करना नेतृत्व की जिम्मेदारी बनती है।
कांग्रेस का रुख…. सड़क पर विरोध नहीं, सोशल मीडिया पर निशाना
स्मृति ईरानी के प्रवास के दौरान कांग्रेस की ओर से किसी बड़े प्रत्यक्ष विरोध प्रदर्शन का उल्लेख उपलब्ध विवरण में नहीं है। हालांकि, सोशल मीडिया के जरिए उन्हें निशाना बनाए जाने की बात सामने आई।
भाजपा के भीतर संगठनात्मक समीक्षा चल रही थी और विपक्ष को सरकार तथा पार्टी के कामकाज पर सवाल उठाने का अवसर मिला। लेकिन सोशल मीडिया की राजनीतिक टिप्पणियों और भाजपा की बैठकों में सामने आई शिकायतों को अलग-अलग संदर्भों में समझना जरूरी है। आरोप चाहे सत्ता पक्ष की ओर से आएं या विपक्ष की ओर से, उनकी सत्यता का आकलन प्रमाणों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
इस दौरे ने विपक्ष के लिए सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने का अवसर पैदा किया, जबकि भाजपा के लिए अपने ही संगठन के भीतर सामने आई समस्याओं को पहचानने और सुधारने की चुनौती रखी।
असली परीक्षा: सख्त तेवर या व्यवस्था में बदलाव?
स्मृति ईरानी के पहले छत्तीसगढ़ प्रवास की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि चर्चा का केंद्र स्वागत समारोह नहीं, बल्कि संगठन और सरकार के कामकाज से जुड़े सवाल बने। होर्डिंग्स हटवाने से लेकर बूथ अध्यक्ष को आगे बैठाने तक, पूर्व जनप्रतिनिधियों की शिकायतें सुनने से लेकर वर्तमान सांसदों की नाराजगी मुख्यमंत्री के सामने रखने तक, और मंत्रियों से रिपोर्ट कार्ड के आधार पर सवाल करने से लेकर प्रभारी जिलों में नियमित दौरे पर जोर देने तक—दौरे में जवाबदेही का विषय लगातार सामने आया।
लेकिन किसी भी राजनीतिक समीक्षा की सफलता केवल सख्त लहजे या बंद कमरे में हुई बैठकों से तय नहीं होती। वास्तविक कसौटी यह होगी कि क्या शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई होती है, क्या मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद बेहतर होता है, क्या कार्यकर्ताओं की नाराजगी कम होती है और क्या विभागीय कामकाज में सुधार दिखाई देता है। इन सब सवालों का जवाब आने वाले महीनों में खुद दिख जाएगा।
