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मोटापा, हाई BP और डायबिटीज के बढ़ते खतरे पर सिम्स में राष्ट्रीय मंथन, विशेषज्ञों ने कहा—बदलती जीवनशैली सुधारें, बीमारी को जड़ से रोकें

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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सिम्स बिलासपुर में ICP-API के अकादमिक आयोजन में राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने दिया स्वास्थ्य का रोडमैप; एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल से लेकर सर्पदंश और गंभीर मरीजों के आधुनिक उपचार तक 18 से अधिक विशेषज्ञों ने साझा किया चिकित्सा अनुभव
बिलासपुर। बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतों और शारीरिक सक्रियता में कमी के बीच मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह आज स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं। इन बीमारियों को केवल अलग-अलग रोग मानकर उपचार करने के बजाय इनके आपसी संबंध को समझना और प्राथमिक स्तर पर ही रोकथाम एवं नियंत्रण की रणनीति अपनाना बेहद जरूरी है। यही संदेश छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स), बिलासपुर में आयोजित इंडियन कॉलेज ऑफ फिजिशियन्स (ICP) एवं एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ इंडिया (API) बिलासपुर चैप्टर के अकादमिक आयोजन से सामने आया।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर के वक्ता एवं वर्ष 2027 के निर्वाचित अध्यक्ष प्रो. डॉ. शेखर चक्रवर्ती ने मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह के बीच के गहरे संबंध को सरल एवं प्रभावी तरीके से समझाया। उन्होंने कहा कि इन स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ में खान-पान और रहन-सहन की आदतों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में बीमारी गंभीर अवस्था तक पहुंचने का इंतजार करने के बजाय प्राइमरी लेवल से ही रोकथाम, जांच और उपचार पर ध्यान देना आवश्यक है, ताकि आगे चलकर हृदय एवं अन्य गंभीर बीमारियों का जोखिम कम किया जा सके।
बीमारी के इलाज से ज्यादा जरूरी है बीमारी को बढ़ने से रोकना
प्रो. डॉ. शेखर चक्रवर्ती ने जीवनशैली में सुधार को आधुनिक चिकित्सा प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए इन रोगों के समग्र प्रबंधन पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि स्वास्थ्य की चुनौती केवल दवाओं तक सीमित नहीं है। खान-पान, शारीरिक सक्रियता और दैनिक जीवनशैली में आवश्यक बदलाव के साथ समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह को अपनाकर कई जोखिमों को शुरुआती स्तर पर नियंत्रित किया जा सकता है।
यह दृष्टिकोण आज की चिकित्सा व्यवस्था में Preventive Healthcare यानी बीमारी होने के बाद उपचार के बजाय बीमारी के जोखिम को पहले पहचानने और नियंत्रित करने की दिशा को मजबूत करता है।
एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल बना भविष्य की बड़ी चुनौती
कार्यक्रम में सिम्स के अधिष्ठाता एवं मुख्य अतिथि प्रो. डॉ. रमणेश मूर्ति ने एंटीबायोटिक दवाओं के तर्कसंगत और विवेकपूर्ण उपयोग पर महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। उन्होंने बढ़ते एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance) को भविष्य की बड़ी चिकित्सा चुनौतियों में शामिल बताया।
एंटीबायोटिक दवाओं का आवश्यकता से अधिक या गलत इस्तेमाल धीरे-धीरे ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है, जहां संक्रमण पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव दवाओं के प्रति कम प्रभावी प्रतिक्रिया दें। ऐसे में चिकित्सकीय परामर्श और आवश्यकता के अनुरूप ही एंटीबायोटिक का उपयोग करना चिकित्सा व्यवस्था और समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
हाई ब्लड प्रेशर को हल्के में लेना पड़ सकता है भारी
प्रो. डॉ. प्रभात पांडेय ने उच्च रक्तचाप के समय पर निदान, नियमित निगरानी और प्रभावी नियंत्रण को गंभीर जटिलताओं से बचाव के लिए जरूरी बताया। उनका जोर इस बात पर रहा कि ब्लड प्रेशर जैसी समस्या की समय पर पहचान और निरंतर निगरानी स्वास्थ्य प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मोटापे जैसे जोखिम कारकों को शुरुआती स्तर पर पहचानकर उनका प्रबंधन किया जाए तो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं के जोखिम को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।
सर्पदंश से ICCU तक—आधुनिक चिकित्सा के कई आयामों पर मंथन
अकादमिक आयोजन का दायरा केवल जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों तक सीमित नहीं रहा। कार्यक्रम में सर्पदंश के नवीनतम प्रबंधन, आपातकालीन चिकित्सा, आईसीसीयू में गंभीर मरीजों के उपचार सहित चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और नवीनतम जानकारी साझा की।
18 से अधिक विशेषज्ञ वक्ताओं ने विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए। इसका उद्देश्य चिकित्सकों और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को बदलती चिकित्सा पद्धतियों, उपचार की आधुनिक तकनीकों और गंभीर मरीजों के प्रबंधन से जुड़े नवीन दृष्टिकोणों से परिचित कराना रहा।
क्विज और पोस्टर प्रस्तुति से बढ़ी अकादमिक भागीदारी
कार्यक्रम में केवल विशेषज्ञ व्याख्यान ही नहीं हुए, बल्कि चिकित्सा शिक्षा को अधिक संवादात्मक और प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए स्नातकोत्तर विद्यार्थियों के लिए मेडिकल क्विज और पोस्टर प्रस्तुति सहित विभिन्न अकादमिक गतिविधियां भी आयोजित की गईं।
इससे युवा चिकित्सकों और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को अपने ज्ञान का परीक्षण करने, नए चिकित्सा विषयों को समझने तथा विशेषज्ञों के साथ अकादमिक संवाद का अवसर मिला।
300 से अधिक चिकित्सकों और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों की सहभागिता
आयोजन में 300 से अधिक चिकित्सकों एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। सिम्स के साथ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से चिकित्सकों एवं चिकित्सा विद्यार्थियों ने इसमें भागीदारी की। कार्यक्रम ने बिलासपुर को चिकित्सा शिक्षा, विशेषज्ञ संवाद और निरंतर ज्ञानवर्धन के एक महत्वपूर्ण अकादमिक केंद्र के रूप में भी रेखांकित किया।
निरंतर ज्ञानवर्धन ही आधुनिक चिकित्सा की ताकत
चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. लखन सिंह ने कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजन चिकित्सकों एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को नवीनतम चिकित्सा ज्ञान से जोड़ने और विशेषज्ञों के अनुभवों के आदान-प्रदान का प्रभावी मंच प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि चिकित्सा विज्ञान निरंतर विकसित हो रहा है, इसलिए बदलती चिकित्सा पद्धतियों के अनुरूप चिकित्सकों का निरंतर ज्ञानवर्धन आवश्यक है।
उन्होंने आयोजन की सफलता के लिए सभी विशेषज्ञों, चिकित्सकों और विद्यार्थियों को बधाई दी।
विशेषज्ञों की व्यापक भागीदारी
कार्यक्रम में डॉ. अमित कुमार ठाकुर, डॉ. आशुतोष कोरी, डॉ. विवेकानंद मिश्रा, डॉ. नाजिया अंसारी, डॉ. नवनीत कुमार अग्रहरी, डॉ. घनश्याम सिंह कंवर, डॉ. अखिलेश चंद्राकर, डॉ. किसलय देवांगन, डॉ. सुयश सिंह, डॉ. चंद्रा किरण, डॉ. शिवानी बडगैयां, डॉ. प्रज्ञा पटेल, डॉ. प्रतीक अग्रवाल, डॉ. शैलेश कुमार साहू, डॉ. रवि तेंगवार, डॉ. कृतिका बिष्ट, डॉ. ज्योति जोशी, डॉ. जवाहर लाल मिंज, डॉ. शरद ठाकुर, डॉ. उमाकांत राठौर, डॉ. नूपुर साहू, डॉ. दीपमाला रानी, डॉ. तनिषा श्रीवास्तव, डॉ. प्रणव पांडे, डॉ. अनूप कुमार, डॉ. अनंत प्रताप सिंह, डॉ. चिरंजीव जालान, डॉ. अक्षय देवांगन, डॉ. मिलिंद जटानिया, डॉ. अपर्णा पांडे, डॉ. सुधांशु शेखर जेना एवं डॉ. हेमंत बांगलकर सहित सिम्स एवं प्रदेश के अनेक चिकित्सक और स्नातकोत्तर विद्यार्थी उपस्थित रहे।
स्वास्थ्य का बड़ा संदेश: रोकथाम से बेहतर कोई उपचार नहीं
सिम्स में आयोजित यह अकादमिक आयोजन केवल चिकित्सकों के बीच ज्ञान-विनिमय का कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि आमजन के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संदेश लेकर आया—मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को शुरुआती स्तर पर पहचानना, नियमित निगरानी रखना और जीवनशैली में जरूरी सुधार करना बेहद महत्वपूर्ण है।
वहीं एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल का संदेश यह बताता है कि आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धियों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी चिकित्सकों के साथ समाज की भी है। विशेषज्ञों के अनुभव, युवा चिकित्सकों की भागीदारी और आधुनिक चिकित्सा विषयों पर अकादमिक विमर्श ने बिलासपुर में आयोजित इस कार्यक्रम को ज्ञान, जागरूकता और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में सकारात्मक पहल के रूप में स्थापित किया।

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