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पहली पत्नी के लिए दूसरी शादी साबित करना क्यों बना सबसे बड़ा संघर्ष? महिला आयोग करेगा कानून बदलने की सिफारिश

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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प्रदेशभर के मामलों की होगी केस स्टडी, पुलिस से लेकर न्यायपालिका और विधि विशेषज्ञों से ली जाएगी राय; दूसरी पत्नी होने से इनकार करने पर बढ़ जाती है पहली पत्नी की मुश्किल
बिलासपुर। पहली पत्नी के रहते पति द्वारा दूसरी शादी करने या किसी दूसरी महिला को पत्नी के रूप में रखने के मामलों में महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती विवाह को कानूनी रूप से साबित करने की होती है। कई मामलों में दूसरी महिला पत्नी होने से ही इनकार कर देती है, जबकि पहली पत्नी को विवाह के प्रमाण, दस्तावेज और गवाह जुटाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इस गंभीर व्यावहारिक समस्या को देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग अब प्रदेशभर में ऐसे मामलों की केस स्टडी तैयार कर कानून में आवश्यक बदलाव की सिफारिश करने की तैयारी में है।
महिला आयोग की अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त डॉ. ममता साहू ने सोमवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में मीडिया से चर्चा के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि दूसरी शादी से जुड़े मामलों में कानून की प्रक्रिया और साक्ष्य जुटाने की कठिनाई के कारण पीड़ित महिलाओं को कई बार न्याय पाने में लंबा संघर्ष करना पड़ता है।
दूसरी महिला ने कहा- पत्नी नहीं, नौकरानी हूं
डॉ. साहू ने एक मामले का उदाहरण देते हुए बताया कि पुलिस जब संबंधित व्यक्ति के घर पहुंची तो वहां रह रही महिला ने खुद को उसकी पत्नी मानने से इनकार कर दिया और खुद को नौकरानी बताया। ऐसी परिस्थितियों में पहली पत्नी के लिए यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि उसके पति ने वास्तव में दूसरी शादी की है या संबंधित महिला को पत्नी के रूप में अपने साथ रखा है।
उन्होंने कहा कि कई मामलों में समस्या केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अदालत में विवाह को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य जुटाना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। यही कारण है कि आयोग इस पूरी प्रक्रिया की व्यावहारिक दिक्कतों का अध्ययन करना चाहता है।
प्रदेशभर के मामलों से तैयार होगा प्रस्ताव
महिला आयोग अब छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में सामने आए ऐसे प्रकरणों की जानकारी जुटाएगा। मामलों की केस स्टडी के माध्यम से यह देखा जाएगा कि पीड़ित महिलाओं को एफआईआर, जांच, साक्ष्य जुटाने और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
इसके बाद विधि विशेषज्ञों, पुलिस अधिकारियों, न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोगों, महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक संगठनों, एनजीओ और आम नागरिकों से सुझाव लिए जाएंगे। मीडिया से भी इस विषय पर सुझाव आमंत्रित किए जाएंगे।
डॉ. साहू ने कहा कि सभी पहलुओं के अध्ययन के बाद आयोग सरकार को कानून में आवश्यक संशोधन और प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के संबंध में अनुशंसा करेगा।
बॉक्स | पुलिस के साथ होगी कानूनी धाराओं की समीक्षा
महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि महिलाओं से जुड़े मामलों में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की स्थिति बनती है। आयोग पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर संबंधित धाराओं और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल की समीक्षा करेगा।
उन्होंने बताया कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 और 69 से जुड़े मामलों को लेकर भी पुलिस अधिकारियों के साथ चर्चा की जाएगी। हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं को बैठक में शामिल कर कानूनी पहलुओं पर उनकी राय ली जाएगी।
उन्होंने कहा कि आयोग पहले स्वयं संबंधित कानूनी प्रावधानों और उनसे जुड़े मामलों की जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझेगा। इसके बाद पुलिस, पीड़ित महिलाओं और अन्य संबंधित पक्षों के लिए आवश्यक मार्गदर्शन तैयार करने की दिशा में काम किया जाएगा।
पुलिस-न्यायपालिका के साथ होगी ट्रेनिंग
महिलाओं को त्वरित और प्रभावी न्याय दिलाने के लिए महिला आयोग पुलिस विभाग, न्यायपालिका, महिला एवं बाल विकास विभाग और एनजीओ को साथ लेकर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेगा।
डॉ. साहू के मुताबिक रायपुर और अंबिकापुर सहित प्रदेश के अलग-अलग स्थानों पर प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ समन्वय कर भी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी है।
सरगुजा के मामले ने उजागर की थी कानूनी जरूरत
डॉ. ममता साहू ने महिलाओं के खिलाफ गंभीर उत्पीड़न के एक पुराने सरगुजा प्रकरण का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि मामले में एक महिला को बेहद अमानवीय तरीके से प्रताड़ित किए जाने की घटना सामने आई थी। महिला के निजी अंगों में मिर्ची डालकर यातना देने जैसे गंभीर आरोप सामने आए थे।
उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों की जांच और उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानूनी प्रावधानों और संस्थागत व्यवस्था की जरूरत को रेखांकित किया है।
मीडिया की निगरानी से व्यवस्था होती है ज्यादा जवाबदेह
महिला आयोग की अध्यक्ष ने महिलाओं से जुड़े मामलों में मीडिया की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि पत्रकार लगातार जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने लाते हैं तो आयोग और प्रशासन भी अधिक सतर्क होकर काम करते हैं।
उन्होंने कहा कि मीडिया से मिलने वाले सुझावों को गंभीरता से लिया जाएगा। आयोग का प्रयास रहेगा कि महिलाओं से जुड़े मामलों में कार्रवाई केवल सुनवाई और प्रकरण के निपटारे तक सीमित न रहे, बल्कि कानूनी और संस्थागत स्तर पर स्थायी समाधान की दिशा में भी काम हो।
ढाई महीने में लगातार जनसुनवाई और जिलों का दौरा
डॉ. साहू ने बताया कि महिला आयोग के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाले उन्हें अभी करीब ढाई से तीन माह ही हुए हैं। इस अवधि में लगातार जनसुनवाई के साथ प्रदेश के अलग-अलग जिलों का दौरा किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि कई बार जनसुनवाई में 30 से 35 मामले एक साथ सामने आते हैं। सुबह 11 बजे शुरू होने वाली सुनवाई कई बार शाम पांच से छह बजे तक चलती है। मामलों की संख्या और उनकी जटिलता अधिक होने के बावजूद आयोग महिलाओं की समस्याओं को गंभीरता से सुनकर उनके समाधान की दिशा में काम कर रहा है।
कानून में बदलाव की दिशा में बढ़ेगा आयोग
महिला आयोग की इस पहल का फोकस केवल किसी एक प्रकरण तक सीमित नहीं है। आयोग प्रदेशभर में दूसरी शादी से जुड़े मामलों में सामने आ रही कानूनी, साक्ष्य संबंधी और प्रक्रियागत दिक्कतों का अध्ययन कर व्यापक प्रस्ताव तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके आधार पर सरकार को आवश्यक कानूनी बदलावों की अनुशंसा किए जाने की बात कही गई है।

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