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सर्पदंश घोटाला : पुलिस की जांच में ड्राइवर सरगना… ? तो…पटवारी-तहसीलदार-एसडीएम नपेंगे या फिर बच जाएंगे?

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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पुलिस की प्राथमिक जांच में छोटे कर्मचारी जेल में, अब राजपत्रित अधिकारियों की बारी? सरकारी मुआवजे पर अंतिम आदेश देने वालों की भूमिका पर उठे सवाल

अब कलेक्टर पर नजर: क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ की अग्निपरीक्षा में खरा उतरेगा विष्णु सरकार का दावा?

सिम्स चौकी से तहसील तक खुली परतें, दो जवान गिरफ्तार; अब जांच की आंच पटवारी, तहसीलदार और एसडीएम स्तर तक पहुंचने के संकेत

पार्ट 2

मोहम्मद इसराइल | बिलासपुर

बिलासपुर के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सवाल केवल फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फर्जी पटवारी प्रतिवेदन या दो पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये के सरकारी मुआवजे वाले प्रकरणों पर अंतिम आदेश देने वाली प्रशासनिक श्रृंखला की भूमिका क्या थी और क्या जांच वहां तक पहुंचेगी, जहां से सरकारी धन जारी हुआ।

प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति की बात करती रही है। ऐसे में यह घोटाला अब केवल पुलिस की आपराधिक जांच नहीं, बल्कि सरकार की प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार विरोधी दावे की भी बड़ी परीक्षा बन गया है।

इसी बीच पुलिस ने सोमवार को SIMS पुलिस चौकी में पदस्थ रहे दो होमगार्ड जवान रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर को गिरफ्तार कर लिया। आरोप है कि दोनों अस्पताल में आने वाले शवों की सूचना कथित गिरोह तक पहुंचाते थे, जिसके बाद पूरा नेटवर्क सक्रिय हो जाता था।

शव पहुंचते ही बजती थी ‘सेटिंग’ की घंटी

पुलिस जांच के अनुसार जैसे ही किसी मृतक का शव पोस्टमार्टम के लिए SIMS पहुंचता था, चौकी में पदस्थ जवान तत्काल कथित गिरोह के सदस्य महेंद्र मनहर को सूचना देते थे।

इसके बाद महेंद्र मनहर अस्पताल पहुंचकर मृतक के परिजनों से संपर्क करता था। आरोप है कि यदि मौत किसी अन्य कारण से भी हुई होती, तब भी परिजनों को सर्पदंश का मामला बताकर शासन से मिलने वाली आपदा राहत राशि का लालच दिया जाता था। कई मामलों में परिजन भी इस लालच में कथित रूप से इस साजिश का हिस्सा बन गए।

पुलिस का दावा है कि गिरफ्तार दोनों जवान केवल सूचना देने तक सीमित नहीं थे, बल्कि परिजनों को गिरोह से जोड़ने और उन्हें तैयार कराने में भी सहयोग करते थे।

सिम्स से तहसील तक फैला था कथित सिंडिकेट

प्राथमिक जांच में जो तस्वीर सामने आई है, उसके अनुसार पूरा नेटवर्क कई स्तरों पर काम करता था।

  • शव आते ही सूचना गिरोह तक पहुंचती थी।
  • परिजनों को मुआवजे का लालच देकर तैयार किया जाता था।
  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर होती थी।
  • फर्जी पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज तैयार किए जाते थे।
  • तहसील स्तर पर प्रकरण आगे बढ़वाया जाता था।
  • सरकारी मुआवजा स्वीकृत होने के बाद राशि बैंक खाते में पहुंचती थी और फिर उसका बंटवारा होता था।

फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से बदल दी जाती थी मौत की वजह

जांच में कई मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग इंटीमेशन और पटवारी प्रतिवेदन फर्जी तरीके से तैयार किए जाने के आरोप सामने आए हैं।

पुलिस के अनुसार कुछ मामलों में शवों के साथ कथित छेड़छाड़ कर सर्पदंश के निशान दर्शाने का प्रयास किया गया। इसके बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण बदलकर सर्पदंश दर्शाने की कोशिश की गई।

कुछ मामलों में डॉक्टरों के कथित फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल कर हार्ट अटैक जैसी प्राकृतिक मौत को भी सर्पदंश बताकर मुआवजा लेने के आरोप जांच के केंद्र में हैं।

डॉक्टर, बैंक, तहसील… हर स्तर पर जांच

मामले में डॉ. प्रियंका सोनी पहले ही गिरफ्तार की जा चुकी हैं। अब डॉ. एस.एन. बोले द्वारा जारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी जांच के घेरे में है। पुलिस उनके निवास पर दबिश दे चुकी है। छुट्टी समाप्त होने के बाद भी वे ड्यूटी पर नहीं पहुंचे।

जांच में तहसील कार्यालय से जुड़े दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा की भूमिका भी सामने आई है। आरोप है कि वह एक से 15 लाख रुपये तक लेकर तहसील स्तर पर प्रकरणों की सेटिंग करता था और रीडरों की आईडी से फाइलें आगे बढ़वाई जाती थीं।

15 एफआईआर, लगातार गिरफ्तारियां

अब तक दर्ज 15 अलग-अलग प्रकरणों में पुलिस धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेज तैयार करने की धाराओं में कार्रवाई कर चुकी है।

अब तक गिरफ्तार आरोपियों में हीराप्रसाद खांडेकर, महेंद्र मनहर, कुश कुमार गुप्ता, गोविंद विश्वकर्मा, डॉ. प्रियंका सोनी, गरीब राम बिंझवार, हरिशंकर राठौर, नरेंद्र कौशिक सहित कई अन्य आरोपी शामिल हैं। सोमवार को दो होमगार्ड जवानों की गिरफ्तारी के बाद जांच और तेज हो गई है।

इन थानों में दर्ज हैं मामले

थाना सरकंडा

  • महेंद्र कुमार मनहर
  • गोविंद विश्वकर्मा
  • हीराप्रसाद खांडेकर
  • कुश कुमार गुप्ता

थाना कोनी

  • भगत सिंह ठाकुर
  • शंकू सिंह ठाकुर
  • धर्मेंद्र यादव
  • विजय जांगड़े
  • आकाश कुमार साहू
  • केशव कुमार कश्यप

थाना सिविल लाइन

  • कामता साहू (अधिवक्ता)
  • शिवकुमारी यादव
  • दामिनी यादव

थाना तोरवा

  • सफीना बानो
  • संतोष कुमार सूर्यवंशी
  • रंजीत कुमार चतुर्वेदी

थाना सिटी कोतवाली

  • सुनीता सोनवानी

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या जांच राजपत्रित अधिकारियों तक पहुंचेगी?

जांच के मौजूदा चरण में कार्रवाई मुख्य रूप से पुलिसकर्मियों, कर्मचारियों, डॉक्टरों, बैंककर्मी और कथित बिचौलियों तक सीमित दिखाई दे रही है। लेकिन जिन मुआवजा प्रकरणों पर अंतिम प्रशासनिक स्वीकृति जारी हुई, उनमें संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत पटवारी प्रतिवेदन, राजस्व परीक्षण और सक्षम अधिकारी के आदेश के बाद ही मुआवजा स्वीकृत होता है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि क्या पूरी प्रक्रिया में किसी स्तर पर लापरवाही, नियमों की अनदेखी या अन्य अनियमितताएं हुईं। इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और सक्षम एजेंसियों की कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।

लिपिक संघ की हड़ताल

तहसील कर्मचारियों की गिरफ्तारी के विरोध में लिपिक संघ ने एक दिन की हड़ताल की। संघ ने कार्रवाई को एकतरफा बताते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग की।

एसएसपी का संदेश

एसएसपी रजनेश सिंह ने कहा कि प्रारंभिक जांच में अधिवक्ता और उसके सहयोगियों द्वारा संगठित सिंडिकेट बनाकर काम करने के संकेत मिले हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में जिसकी भी संलिप्तता सामने आएगी, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

जांच के केंद्र में अब ये सवाल

  • शव की पहली सूचना किस स्तर से लीक होती थी?
  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर किसके संरक्षण में हुई?
  • फर्जी पटवारी प्रतिवेदन किस स्तर पर तैयार हुए?
  • मुआवजा प्रकरणों की प्रशासनिक जांच कितनी गहन थी?
  • सरकारी राशि जारी होने से पहले दस्तावेजों का सत्यापन कैसे हुआ?
  • क्या जांच अब पूरी प्रशासनिक श्रृंखला तक पहुंचेगी?
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