Latest news

बूथ के बाहर कांग्रेस-भाजपा नेताओं में तीखी नोकझोंक, पुलिस ने संभाला मोर्चा; 70% मतदान के बीच दोनों दलों ने ठोकी जीत की ताल

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
7 Min Read


वार्ड-29 तारबाहर उपचुनाव में मतदान के दौरान गरमाया माहौल, पूर्व विधायक शैलेश पांडेय और भाजपा नेताओं के बीच हुई तनातनी; 4 जून को ईवीएम खोलेगी राजनीतिक भाग्य
बिलासपुर। नगर निगम के वार्ड क्रमांक-29 संजय गांधी नगर (तारबाहर) में पार्षद पद के लिए हुए उपचुनाव के मतदान के दौरान मंगलवार को राजनीतिक माहौल उस समय गर्मा गया, जब बूथ परिसर में प्रवेश को लेकर कांग्रेस और भाजपा नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। मामला पूर्व विधायक शैलेश पांडेय, शहर कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र सिंह, पूर्व ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष जावेद मेमन, रामाशंकर बघेल और भाजपा नेता रंगानादम महेश चंदीकापूरे तथा युवा नेता मोनू रजक के बीच विवाद तक पहुंच गया। दोनों पक्षों के बीच बहस इतनी बढ़ी कि मौके पर मौजूद पुलिस और प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा। अधिकारियों ने समझाइश देकर स्थिति को नियंत्रित किया, जिसके बाद मतदान की प्रक्रिया सामान्य रूप से जारी रही।


इस राजनीतिक तनातनी के बीच वार्ड में मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान करीब 70 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। मतदान समाप्त होने के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपनी-अपनी जीत के दावे किए हैं। अब सभी की निगाहें 4 जून पर टिकी हैं, जब ईवीएम में बंद प्रत्याशियों का राजनीतिक भविष्य सामने आएगा।


मतदान के दौरान सक्रिय रहे दोनों दल
मतदान के दिन कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों ने बूथ स्तर पर पूरी ताकत झोंक दी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं से संपर्क कर पार्टी प्रत्याशी शेख मोहम्मद आजम के पक्ष में मतदान की अपील की। वहीं भाजपा कार्यकर्ता भी अपने प्रत्याशी के समर्थन में मतदाताओं तक पहुंचते रहे। मतदान केंद्रों के बाहर दिनभर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं की सक्रियता बनी रही।


एक वार्ड, लेकिन पूरे शहर की राजनीति की नजर
70 वार्डों वाले बिलासपुर नगर निगम में यह उपचुनाव केवल एक वार्ड तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक गलियारों में इसे शहर की भावी राजनीतिक दिशा और दोनों प्रमुख दलों की संगठनात्मक ताकत की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही यह मुकाबला कांग्रेस बनाम भाजपा से आगे बढ़कर रणनीति बनाम रणनीति और संगठन बनाम संगठन की लड़ाई में तब्दील हो गया था।
इस चुनाव की एक बड़ी विशेषता यह भी रही कि दोनों प्रमुख दलों में चुनावी कमान युवा नेतृत्व के हाथों में दिखाई दी। भाजपा में जिला अध्यक्ष दीपक सिंह और कांग्रेस में शहर अध्यक्ष सिधांशु मिश्रा की रणनीतियों को लेकर पूरे चुनाव के दौरान राजनीतिक चर्चा बनी रही। दोनों दलों के भीतर यह चुनाव युवा नेतृत्व की राजनीतिक क्षमता की परीक्षा के रूप में देखा गया।
भाजपा ने विकास और सत्ता का मॉडल बनाया मुद्दा
उपचुनाव में भाजपा ने नगर निगम की सत्ता और प्रदेश सरकार के विकास कार्यों को प्रमुख मुद्दा बनाया। पार्टी नेताओं ने सड़क, नाली, पेयजल और शहरी अधोसंरचना से जुड़े कार्यों को जनता के बीच रखा। नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव द्वारा बिलासपुर में चल रहे विकास कार्यों को भी भाजपा के चुनावी अभियान का हिस्सा बनाया गया।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती वार्ड का सामाजिक समीकरण रहा। तारबाहर लंबे समय से अल्पसंख्यक प्रभाव वाला वार्ड माना जाता है, जहां मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं की भूमिका निर्णायक रही है। इसे देखते हुए भाजपा ने बूथ स्तर पर विशेष संपर्क अभियान और माइक्रो मैनेजमेंट की रणनीति अपनाई।
कांग्रेस के लिए विरासत बचाने की चुनौती
कांग्रेस इस उपचुनाव को अपने सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ को बचाने की लड़ाई के रूप में लड़ती नजर आई। तारबाहर वार्ड में वर्ष 1984 से कांग्रेस का लगातार राजनीतिक वर्चस्व रहा है। नगर निगम गठन के बाद भी भाजपा यहां जीत हासिल नहीं कर सकी।
इस राजनीतिक आधार की नींव स्वर्गीय शेख गफ्फार ने रखी थी। 1984 से 1999 तक लगातार पार्षद रहे गफ्फार ने वार्ड में मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क खड़ा किया था। उनके बाद शारदा विश्वकर्मा, चंद्रभान नेताम, दिनेश ध्रुव और एसडी कार्टर रेड्डू जैसे नेताओं ने कांग्रेस की पकड़ बनाए रखी।
वर्ष 2019 में शेख गफ्फार के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके छोटे भाई शेख असलम निर्वाचित हुए थे। बाद में मुख्य चुनाव में भी उन्होंने जीत दर्ज की। असलम के निधन के बाद इस बार कांग्रेस ने परिवार पर भरोसा जताते हुए शेख मोहम्मद आजम को मैदान में उतारा है।
विरासत बनाम परिवारवाद की चर्चा भी रही केंद्र में
पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस के भीतर और बाहर एक सवाल लगातार चर्चा में रहा कि पार्टी गफ्फार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रही है या परिवारवाद को। राजनीतिक जानकारों के अनुसार स्वर्गीय शेख गफ्फार ने अपने राजनीतिक जीवन में रिश्तेदारों की बजाय संगठन के कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को आगे बढ़ाया था।
लेकिन उनके निधन के बाद लगातार परिवार के सदस्यों को टिकट मिलने से यह बहस तेज हुई। इसी बीच वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एसडी कार्टर रेड्डू का नाम भी चर्चा में रहा। बताया जाता है कि उन्होंने भी इस बार नामांकन पत्र खरीदा था, जिससे कांग्रेस के भीतर की राजनीतिक हलचल चुनाव के दौरान चर्चा का विषय बनी रही।
4 जून को खुलेगा ईवीएम का फैसला
मतदान समाप्त होने के बाद दोनों प्रमुख दलों ने अपनी-अपनी जीत के दावे किए हैं। कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक और दशकों पुराने राजनीतिक आधार पर भरोसा जता रही है, जबकि भाजपा को उम्मीद है कि विकास, संगठनात्मक मजबूती और बूथ प्रबंधन का लाभ उसे मिलेगा।
अब पूरे शहर की नजर 4 जून को होने वाली मतगणना पर है, जब यह साफ होगा कि कांग्रेस अपने सबसे मजबूत गढ़ को बचा पाती है या भाजपा लंबे समय से अजेय माने जा रहे इस वार्ड में राजनीतिक सेंध लगाने में सफल होती है।

खबर को शेयर करने के लिए क्लिक करे।।