

बिलासपुर। लिंगियाडीह में अपने आशियाने को बचाने की जंग अब 150वें दिन में प्रवेश कर चुकी है। भीषण गर्मी, प्रशासनिक दबाव और लगातार अनिश्चितता के बीच यहां के लोग—खासकर महिलाएं—खुले आसमान के नीचे डटे हुए हैं। सड़क चौड़ीकरण और नाला निर्माण के नाम पर पहले ही 173 मकान तोड़े जा चुके हैं, लेकिन अब 130 और परिवारों को हटाने की तैयारी ने इस आंदोलन को और तीखा बना दिया है।
धरना स्थल अब सिर्फ विरोध का मंच नहीं, बल्कि संघर्ष का प्रतीक बन चुका है—जहां हर दिन नारे, भाषण और उम्मीदें साथ-साथ चल रही हैं।
बुलडोज़र के बाद भी नहीं थमा विवाद
लिंगियाडीह में प्रशासन ने सड़क और नाला निर्माण के लिए बड़ी कार्रवाई करते हुए 173 मकानों को हटाया। स्थानीय लोगों का कहना है कि बुनियादी काम पूरा हो चुका है, इसके बावजूद अब नए नोटिस देकर 130 परिवारों को हटाने की तैयारी की जा रही है।
यही सवाल अब आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है—“जब निर्माण पूरा हो गया, तो अब बेदखली क्यों?”
महिलाओं का नेतृत्व, आंदोलन की रीढ़ बनीं
धरने की सबसे मजबूत तस्वीर महिलाओं की मौजूदगी है। सुबह से लेकर देर रात तक महिलाएं मोर्चा संभाले रहती हैं।
उनकी स्पष्ट चेतावनी है—
“अब एक भी घर नहीं टूटने देंगे।”
दुर्गा नगर समेत आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में महिलाएं समर्थन देने पहुंच रही हैं, जिससे आंदोलन का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की एंट्री से बढ़ा दबाव
आंदोलन को अब कई संगठनों का खुला समर्थन मिल चुका है।
शिवसेना के कार्यकर्ता लगातार धरना स्थल पर सक्रिय हैं
महिला कांग्रेस ने इसे “गरीबों के साथ अन्याय” बताया
नागरिक सुरक्षा मंच ने प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए
धरने में पहुंचे नेताओं ने एक स्वर में कहा कि “50 साल पुरानी बस्ती को उजाड़ने का अधिकार किसी को नहीं है।”
नारे, आक्रोश और राजनीतिक बयानबाजी
धरना स्थल पर लगातार नारे गूंज रहे हैं—
“घर मत तोड़ो… गरीबों को मत उजाड़ो”
महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सीमा घृतेश ने मंच से कहा—
“किसी भी हालत में यहां एक भी घर नहीं टूटने देंगे। यह लड़ाई अंत तक चलेगी।”
हाईकोर्ट की दखल से बदली तस्वीर
संघर्ष के बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से आई राहत ने आंदोलन को नई दिशा दी है।
कोर्ट ने 36 मकानों को तोड़ने पर अंतरिम रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।
जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकल पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई में मामले को गंभीर मानते हुए विस्तृत सुनवाई योग्य माना।
पट्टा विवाद बना कानूनी लड़ाई का केंद्र
वर्ष 2019-20 के सर्वे में रहवासी पात्र घोषित हुए
वर्ष 2022 में प्रीमियम राशि जमा कर दी गई
वर्ष 2023 में नियम बदलने के बाद पट्टा प्रक्रिया रुक गई
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नियम बदलने से पहले मिले अधिकार खत्म नहीं हो सकते।
वहीं सरकारी पक्ष का तर्क है कि अब उसी स्थान पर पट्टा देना संभव नहीं है और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत वैकल्पिक व्यवस्था दी जा सकती है।
निगम की नई योजना पर उठे सवाल
नगर निगम ने संबंधित जमीन पर व्यावसायिक परिसर और गार्डन विकसित करने का प्रस्ताव रखा है।
याचिका में इसे मास्टर प्लान के खिलाफ बताया गया है, क्योंकि यह क्षेत्र रिहायशी श्रेणी में दर्ज है।
कुल 503 लाभार्थियों में से 113 स्थानों को खाली कराने की योजना ने विवाद को और गहरा कर दिया है।
150 दिन: संघर्ष की नई परिभाषा
लिंगियाडीह में 150 दिनों से जारी यह आंदोलन अब सिर्फ एक बस्ती का मुद्दा नहीं रहा।
खुले आसमान के नीचे रहकर विरोध
भीषण गर्मी में लगातार धरना
महिलाओं की अगुवाई
राजनीतिक और सामाजिक समर्थन
और अब अदालत की दखल
इन सभी पहलुओं ने इसे जिले के सबसे लंबे और चर्चित आंदोलनों में ला खड़ा किया है।
आगे क्या?
मामले की अगली सुनवाई ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद जून में संभावित है।
तब तक धरना जारी रहेगा या कोई प्रशासनिक समाधान निकलेगा—इस पर सबकी नजर टिकी है।

