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बिलासपुर में दो मुद्दे, क्या है सियासी कनेक्शन? रावण से ऑक्सीजोन तक क्यों गरमाई राजनीति—क्या शहर की जमीन और आयोजन दोनों बन रहे हैं शक्ति-प्रदर्शन का मंच?

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
9 Min Read

Md israil Bablu| बिलासपुर
बिलासपुर की राजनीति में इस समय दो अलग-अलग मुद्दे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन दोनों के केंद्र में एक ही सवाल घूम रहा है—सार्वजनिक जगह, सरकारी तंत्र और राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल आखिर किस दिशा में हो रहा है?


एक तरफ साइंस कॉलेज मैदान में दशहरा और रावण दहन के लिए करीब 19.96 लाख रुपये की निविदा ने नगर निगम की भूमिका, प्रशासनिक अनुमति और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए। दूसरी तरफ चांटापारा-तिलक नगर में प्रस्तावित ऑक्सीजोन/ऑक्सीजन गार्डन को लेकर स्थानीय रहवासियों का विरोध सीधे विधायक के आवास तक पहुंच गया। इन दोनों घटनाओं के बीच कोई प्रत्यक्ष राजनीतिक गठजोड़ सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक टाइमिंग, सार्वजनिक जमीन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका ने शहर की राजनीति में एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या ये दो अलग विवाद हैं या बिलासपुर में बदलते राजनीतिक समीकरणों के दो अलग चेहरे?
साइंस कॉलेज के मामले में विवाद उस समय गहरा गया, जब नगर निगम के जोन क्रमांक-7 से करीब 19.96 लाख रुपये की निविदा सामने आई। इसमें टेंट एवं बैठक व्यवस्था के लिए 9.96 लाख, आतिशबाजी के लिए 4 लाख और पुतला, प्रकाश एवं साउंड जैसी व्यवस्थाओं के लिए 6 लाख रुपये का प्रावधान बताया गया। बाद में महापौर पूजा विधानी ने स्पष्ट किया कि नगर निगम का आधिकारिक दशहरा आयोजन पुलिस ग्राउंड में ही होगा और साइंस कॉलेज के आयोजन से निगम का संबंध नहीं रहेगा। जोन अधिकारी की ओर से निविदा कलेक्टर के निर्देश और सीएसआर मद से जारी किए जाने की बात कही गई।
यहीं से सवाल पैदा होता है—जब नगर निगम का आधिकारिक आयोजन पुलिस ग्राउंड में होना था, तो साइंस कॉलेज के लिए निगम के जोन कार्यालय से निविदा की जरूरत क्यों पड़ी?
और इससे भी बड़ा सवाल—निर्णय की कमान आखिर किसके हाथ में थी?
कांग्रेस ने इसी बिंदु को राजनीतिक मुद्दा बनाया। पार्टी नेताओं ने निविदा की प्रक्रिया, एमआईसी की मंजूरी, राशि के औचित्य और सीएसआर फंड के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। विवाद बढ़ने के बाद निविदा निरस्त कर दी गई।
लेकिन कहानी सिर्फ 20 लाख रुपये की नहीं है।
एक निगम, दो मैदान और राजनीतिक सवाल
पुलिस ग्राउंड में लंबे समय से चले आ रहे शासकीय रावण दहन के बीच साइंस कॉलेज मैदान में अलग आयोजन की कवायद ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक अर्थ पैदा किया। खासकर इसलिए कि साइंस कॉलेज क्षेत्र और अरपांचल को लेकर पिछले कुछ समय से राजनीतिक दावे और प्रतिदावे लगातार सामने आते रहे हैं।
यानी सवाल अब यह नहीं रह गया कि रावण कहां जलेगा?
सवाल यह बन गया है कि सरकारी आयोजन का राजनीतिक भूगोल कौन तय कर रहा है?
नगर निगम का कहना है कि उसका आधिकारिक आयोजन पुलिस ग्राउंड में होगा। दूसरी ओर साइंस कॉलेज की निविदा ने यह सवाल पैदा किया कि यदि आयोजन निगम का नहीं था तो उसकी प्रक्रिया निगम के जोन कार्यालय तक कैसे पहुंची।
यही वह बिंदु है जहां रावण दहन एक प्रशासनिक विषय से निकलकर राजनीतिक नियंत्रण और प्रभाव के सवाल में बदल जाता है।


और तभी सामने आया दूसरा मोर्चा—ऑक्सीजोन
5 अक्टूबर को चांटापारा-तिलक नगर के रहवासियों का विधायक अमर अग्रवाल के बंगले तक पहुंचना इस राजनीतिक कहानी की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी है।
स्थानीय लोगों ने प्रस्तावित ऑक्सीजोन/ऑक्सीजन गार्डन को लेकर विरोध जताया और पुनर्वास की प्रक्रिया को स्पष्ट करने की मांग की। रहवासियों के मुताबिक करीब 70 हजार वर्गफीट जमीन उपलब्ध होने की जानकारी पूर्व में दी गई थी। उनका कहना है कि पहले जमीन की नाप-जोख, ड्राइंग और डिजाइन सार्वजनिक हो, फिर यह तय किया जाए कि प्रभावित परिवारों का पुनर्वास किस तरह संभव होगा।
यहां भी मुद्दा केवल एक गार्डन बनाने या नहीं बनाने का नहीं है।
असल सवाल है—जिस जमीन पर शहर के विकास की योजना बन रही है, उस योजना से प्रभावित लोगों का भविष्य क्या होगा?
रहवासियों का दावा है कि उन्हें पहले पुराने क्षेत्र में ही पुनर्वास का आश्वासन दिया गया था। वहीं इमलीभाठा में विस्थापित परिवारों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलने का आरोप भी लगाया गया है।
यही कारण है कि ऑक्सीजोन का मुद्दा भी सीधे जमीन, पुनर्वास और राजनीतिक जवाबदेही के सवाल से जुड़ गया है।
रावण और ऑक्सीजोन—कनेक्शन आखिर कहां है?
दोनों मामलों के बीच कोई प्रत्यक्ष प्रशासनिक या राजनीतिक कड़ी सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं हुई है। लेकिन राजनीतिक नजरिए से देखें तो दोनों विवादों में तीन समान तत्व दिखाई देते हैं—
पहला—सार्वजनिक स्थान।
एक तरफ साइंस कॉलेज मैदान, दूसरी तरफ चांटापारा-तिलक नगर की जमीन।
दूसरा—सरकारी तंत्र।
एक मामले में नगर निगम की निविदा और प्रशासनिक निर्देश सवालों में हैं, तो दूसरे में पुनर्वास और विकास योजना को लेकर सरकारी प्रक्रिया स्पष्ट करने की मांग हो रही है।
तीसरा—राजनीतिक जवाबदेही।
रावण के मामले में कांग्रेस ने नगर निगम और सत्ता पक्ष से जवाब मांगा। ऑक्सीजोन मामले में प्रभावित लोग सीधे विधायक के दरवाजे पहुंचे।
यानी दोनों मामलों में जनता का सवाल एक ही है—
“फैसला कौन ले रहा है और फैसले की कीमत कौन चुका रहा है?”
बिलासपुर की राजनीति में असली लड़ाई क्या है?
बिलासपुर की राजनीति में यह समय केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि शहरी स्पेस और राजनीतिक प्रभाव के पुनर्संयोजन का भी है।
दशहरा मैदान केवल धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन की जगह नहीं रह जाता। जिस मैदान में सरकारी स्तर पर बड़ा आयोजन होता है, वहां राजनीतिक उपस्थिति और जनसंपर्क का स्वाभाविक अवसर भी पैदा होता है।
ठीक उसी तरह ऑक्सीजोन केवल हरियाली की योजना नहीं है। यदि उसके लिए किसी आबादी का विस्थापन या पुनर्वास जुड़ा है, तो वह सीधे स्थानीय राजनीति का मुद्दा बन जाता है।
यही वजह है कि रावण का मैदान और ऑक्सीजोन की जमीन—दोनों राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल… क्या शहर की राजनीति अब ‘इवेंट’ और ‘लैंड’ के इर्द-गिर्द घूम रही है?
साइंस कॉलेज का विवाद बताता है कि एक सरकारी आयोजन की प्रक्रिया में यदि भूमिकाएं स्पष्ट न हों तो वह कुछ ही घंटों में राजनीतिक विवाद बन सकती है।
ऑक्सीजोन का विवाद दिखाता है कि विकास की योजना में प्रभावित लोगों की भागीदारी और पुनर्वास की स्पष्टता न हो तो विकास का प्रस्ताव भी विरोध का कारण बन सकता है।
दोनों मामलों में फिलहाल सबसे जरूरी चीज है—दस्तावेज सार्वजनिक हों, निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट हो और जिम्मेदारी तय हो।
रावण दहन की निविदा निरस्त हो चुकी है, लेकिन उससे जुड़े सवाल अभी खत्म नहीं हुए हैं। वहीं ऑक्सीजोन को लेकर रहवासियों की नाराजगी भी केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं दिख रही; वे जमीन की नाप-जोख, ड्राइंग, डिजाइन और पुनर्वास की स्पष्ट प्रक्रिया चाहते हैं।
और बिलासपुर के राजनीतिक गलियारों में अब असली चर्चा यही है—
क्या रावण दहन का विवाद महज एक टेंडर का मामला था?
क्या ऑक्सीजोन का विरोध केवल पुनर्वास का सवाल है?
या फिर दोनों घटनाएं शहर में सार्वजनिक संसाधनों, राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक फैसलों को लेकर बन रहे नए सियासी समीकरणों की तरफ इशारा कर रही हैं?
इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी एक राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि के बयान से नहीं मिलेगा। जवाब फाइलों, स्वीकृतियों, जमीन के नक्शे, टेंडर प्रक्रिया और पुनर्वास की वास्तविक कार्ययोजना से निकलेगा।

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