बिलासपुर।
बिलासपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में एक दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम सिर्फ औपचारिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह उस खामोश जंग की तैयारी जैसा दिखा, जो हर साल हजारों जिंदगियों पर खतरा बनकर आती है। “रेबीज की रोकथाम एवं पशु काटने के प्रबंधन” विषय पर आयोजित इस विशेष सत्र में नर्सिंग स्टाफ को उन बारीकियों से रूबरू कराया गया, जो किसी मरीज के जीवन और मृत्यु के बीच फर्क तय करती हैं।

बिलासपुर में सामुदायिक चिकित्सा विभाग और जिला स्वास्थ्य तंत्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस प्रशिक्षण की शुरुआत अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर की। आयोजन का केंद्रबिंदु था—रेबीज संक्रमण की समय रहते पहचान, वैज्ञानिक प्रबंधन और स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका को और सशक्त बनाना।
प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने रेबीज वायरस की कार्यप्रणाली को विस्तार से समझाया। बताया गया कि संक्रमित पशु के काटने के बाद वायरस सबसे पहले मांसपेशियों में सक्रिय होता है और फिर तंत्रिकाओं के जरिए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंचकर मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इस प्रक्रिया के दौरान शुरुआती हस्तक्षेप ही मरीज के बचाव की सबसे अहम कड़ी बनता है।
सत्र में नर्सिंग स्टाफ को घाव की प्राथमिक सफाई से लेकर एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) और इम्युनोग्लोब्युलिन के उपयोग तक के व्यावहारिक पहलुओं पर प्रशिक्षण दिया गया। मरीज की निगरानी, संक्रमण की प्रगति को समझना और आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी विस्तार से समझाया गया।
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने अस्पताल में आने वाले हर पशु काटने के मामले को गंभीरता से लेने की आवश्यकता पर जोर दिया। वहीं सामुदायिक चिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. हेमलता ठाकुर ने बताया कि रेबीज नियंत्रण केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए सामुदायिक जागरूकता और समय पर टीकाकरण भी उतना ही जरूरी है।
कार्यक्रम में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम—डॉ. प्रवीण श्रीवास्तव, डॉ. विवेक शर्मा, डॉ. समीर पैकरा, डॉ. सचिन पांडे, डॉ. आशुतोष कोरी, डॉ. सुनील कुमार पेंद्रो, डॉ. शैलेश पैकरा और डॉ. विनोद टंडन—ने अलग-अलग सत्रों में अपनी विशेषज्ञता साझा की। नर्सिंग स्टाफ और इंटर्न्स ने सक्रिय भागीदारी के साथ प्रशिक्षण को इंटरएक्टिव बनाया, जहां वास्तविक केस स्टडी और परिस्थितियों पर आधारित चर्चा भी शामिल रही।
इस दौरान उज्ज्वला दास, सरिता बहादुर, पिंकी दास, पुष्पलता शर्मा, ग्रेसी, ममता, लता, पल्लवी कुमारिया, योगेश्वरी, मधु, दीपा शर्मा और गरिमा पांडे सहित बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए।
सत्र के दौरान बार-बार इस बात को रेखांकित किया गया कि रेबीज एक ऐसा संक्रमण है, जो लक्षण प्रकट होने के बाद लगभग असाध्य हो जाता है, लेकिन समय रहते सही उपचार और टीकाकरण से इसे पूरी तरह रोका जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रशिक्षण का फोकस सिर्फ चिकित्सा प्रबंधन तक सीमित न रहकर सामुदायिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने पर भी रहा।
सिम्स बिलासपुर में आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम स्वास्थ्य सेवाओं में क्षमता निर्माण की दिशा में एक संगठित प्रयास के रूप में सामने आया, जिसमें तकनीकी जानकारी के साथ-साथ व्यवहारिक प्रशिक्षण और जनस्वास्थ्य दृष्टिकोण को एक साथ जोड़ा गया।

