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सिम्स में जटिल टीबी मरीज का सफल उपचार, आधुनिक जांच से हुआ सही निदान

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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स्वास्थ्य मंत्री की पहल से उपलब्ध उन्नत मशीनों की मदद से संभव हुआ इलाज
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में चिकित्सकों की टीम ने जटिल क्षय रोग (टीबी) से पीड़ित एक मरीज का सफल उपचार कर उसे नई जिंदगी दी है। आधुनिक जांच पद्धतियों और उन्नत मशीनों की मदद से मरीज की बीमारी का सटीक निदान किया गया, जिसके बाद समय पर उपचार शुरू किया गया। चिकित्सकों के अनुसार उन्नत जांच सुविधाओं और विशेषज्ञ टीम की उपलब्धता के कारण जटिल मामलों में भी बेहतर उपचार संभव हो पा रहा है।
जानकारी के अनुसार रतनपुर क्षेत्र की 19 वर्षीय महिला मरीज मई 2025 में लगातार खांसी-जुकाम, शाम के समय बुखार, भूख में कमी, वजन में गिरावट और सामान्य कमजोरी की शिकायत लेकर सिम्स के श्वसन रोग बाह्य रोगी विभाग पहुंची थी। मरीज पिछले लगभग पांच महीने से दवा-संवेदनशील क्षय रोग (डीएस-टीबी) की दवा ले रही थी, लेकिन लक्षणों में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा था।
मरीज की स्थिति को देखते हुए श्वसन रोग विभाग के प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. प्रतीक कुमार, सहायक प्राध्यापक डॉ. अनिल कुमार डनसेना और वरिष्ठ रेजिडेंट डॉ. आकांक्षा गुप्ता ने विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण कराया। छाती के एक्स-रे में दोनों फेफड़ों में फाइब्रो-कैविटेटरी घाव पाए गए। प्रारंभिक बलगम जांच में टीबी निगेटिव आने के बाद चिकित्सकों ने आगे की जांच के लिए ब्रोंकोस्कोपी कराने की सलाह दी।
ब्रोंकोस्कोपी के दौरान दूरबीननुमा नली की सहायता से सांस की नलियों की जांच कर ब्रोंको-एल्वियोलर लवाज का नमूना लिया गया। इस नमूने की आधुनिक जांच में कार्ट्रिज आधारित न्यूक्लिक एसिड प्रवर्धन परीक्षण के जरिए रिफैम्पिसिन प्रतिरोधी टीबी की पुष्टि हुई। इसके साथ ही लाइन प्रोब एसे जांच में रिफैम्पिसिन और आइसोनियाजिड दोनों दवाओं के प्रति प्रतिरोध पाया गया।
इसके बाद राष्ट्रीय कार्यक्रम की गाइडलाइन के अनुसार मरीज को दवा-प्रतिरोधी क्षय रोग के लिए पूर्णतः मौखिक दीर्घकालीन बहु-दवा प्रतिरोधी टीबी उपचार पद्धति के तहत नई दवाओं से उपचार शुरू किया गया।
उपचार के दौरान 31 जुलाई 2025 को मरीज सांस फूलने और ऑक्सीजन की कमी की शिकायत के साथ दोबारा अस्पताल पहुंची। जांच में दोनों फेफड़ों में न्यूमोथोरैक्स की स्थिति पाई गई, जिसमें फेफड़ों में हवा भर जाने के कारण सांस लेने में गंभीर परेशानी होने लगती है। चिकित्सकों ने दाहिनी ओर इंटरकॉस्टल ड्रेनेज ट्यूब लगाकर उपचार किया, जबकि बाईं ओर का उपचार संरक्षणात्मक तरीके से किया गया। उपचार के बाद मरीज की स्थिति में सुधार हुआ और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। वर्तमान में मरीज बहु-दवा प्रतिरोधी टीबी के पूर्णतः मौखिक उपचार पर है और उसके लक्षणों में लगातार सुधार दर्ज किया जा रहा है।
सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने बताया कि संस्थान में टीबी सहित जटिल श्वसन रोगों के उपचार के लिए आधुनिक जांच सुविधाएं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम उपलब्ध है। समय पर सही जांच और उपचार से गंभीर रोगियों का उपचार संभव हो रहा है।
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह के अनुसार टीबी मरीजों के लिए दवाओं का पूरा कोर्स नियमित रूप से लेना अत्यंत आवश्यक है। उपचार के बावजूद लक्षण बने रहने की स्थिति में विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच कराना जरूरी होता है।
श्वसन रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रतीक कुमार ने बताया कि आधुनिक जांच तकनीकों की मदद से दवा-प्रतिरोधी टीबी का समय पर पता लगाया जा सकता है, जिससे मरीजों को गंभीर जटिलताओं से बचाने में मदद मिलती है।
राज्य में सरकारी अस्पतालों में आधुनिक जांच सुविधाओं के विस्तार को लेकर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल द्वारा विशेष पहल की गई है। उनके प्रयासों के तहत सरकारी अस्पतालों में अत्याधुनिक मशीनें और उन्नत जांच उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इन्हीं सुविधाओं के माध्यम से सिम्स में जटिल रोगों के सटीक निदान और उपचार की व्यवस्था सुदृढ़ हुई है।

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