

बिलासपुर।
बिलासपुर के लिंगियाडीह में अपने आशियाने को बचाने की लड़ाई अब लंबी जनजद्दोजहद का रूप ले चुकी है। पिछले 111 दिनों से सैकड़ों परिवार अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। महिलाएं, बुजुर्ग और युवा रोजाना धरना स्थल पर जुटकर अपने घरों को बचाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह किसी राजनीतिक उद्देश्य का आंदोलन नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और जीवन भर की कमाई से बनाए गए घरों को बचाने की जंग है।
तीन महीने से सड़क पर संघर्ष, घर बचाने की मांग
बिलासपुर के लिंगियाडीह क्षेत्र में चल रहा “लिंगियाडीह बचाओ आंदोलन” अब 111वें दिन में प्रवेश कर चुका है। यहां रहने वाले सैकड़ों परिवार लगातार धरना-प्रदर्शन कर शासन-प्रशासन से अपने मकानों को बचाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्होंने वर्षों की मेहनत और खून-पसीने की कमाई से अपने घर बनाए हैं। इन घरों में सिर्फ ईंट और पत्थर ही नहीं, बल्कि उनकी यादें, परिवार का भविष्य और जीवन की उम्मीदें भी जुड़ी हुई हैं।
महिलाएं, बुजुर्ग और युवा भी आंदोलन में डटे
धरना स्थल पर हर दिन बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा मौजूद रहते हैं। सभी एकजुट होकर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे किसी टकराव की राह नहीं चाहते, बल्कि सरकार से मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण की अपेक्षा रखते हैं। उनका मानना है कि किसी भी कार्रवाई से पहले वहां रहने वाले परिवारों की परिस्थितियों और भावनाओं को समझना जरूरी है।
स्थानीय मुद्दे से बढ़कर बना अधिकार का सवाल
लंबे समय से जारी इस आंदोलन ने अब एक बड़े सामाजिक सवाल का रूप ले लिया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह केवल लिंगियाडीह का मामला नहीं, बल्कि आम नागरिक के आवास, अधिकार और सम्मान से जुड़ा मुद्दा है। 111 दिनों से लगातार जारी धरना इस बात का संकेत भी है कि जब लोगों के घर और अस्तित्व पर संकट आता है, तो वे शांतिपूर्ण तरीके से भी अपने अधिकारों के लिए डटे रहते हैं।
संवाद और समाधान की मांग
आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि सरकार और प्रशासन को इस मुद्दे पर जल्द पहल करनी चाहिए। उनका मानना है कि यदि शासन स्तर पर संवेदनशीलता के साथ संवाद स्थापित किया जाए, तो ऐसा समाधान निकल सकता है जिससे सैकड़ों परिवारों का आशियाना सुरक्षित रहे और आंदोलन का सम्मानजनक अंत हो सके।
“सपनों का घर बचाने की लड़ाई”
लिंगियाडीह के लोगों की मांग साफ है—उनके घर न टूटें और उनकी मेहनत की कमाई सुरक्षित रहे। आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि सरकार इस विषय को संवेदनशीलता से देखेगी, तो न केवल सैकड़ों परिवारों को राहत मिलेगी बल्कि शासन और जनता के बीच विश्वास भी मजबूत होगा।

