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भारत का सबसे बड़ा नसबंदी कांड…83 ऑपरेशन, 15 मौतें…. 11 साल बाद आया फैसला, सर्जन गुप्ता दोषी करार

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में वर्ष 2014 में हुए देश के सबसे चर्चित और विवादित नसबंदी कांड में 11 साल 4 महीने बाद जिला अदालत का फैसला सामने आ गया है। मामले की सुनवाई करते हुए प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश शैलेश कुमार ने वरिष्ठ सर्जन डॉ. आर.के. गुप्ता को दोषी ठहराते हुए विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई है, जबकि दवा आपूर्ति से जुड़े पांच आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया है।


कोर्ट का फैसला: सर्जन दोषी, दवा सप्लायर बरी
अदालत ने आरोपी सर्जन डॉ. आर.के. गुप्ता को—
धारा 304(ए) (गैरइरादतन हत्या) में 2 साल की सजा और ₹25,000 जुर्माना
धारा 337 में 6 माह की सजा और ₹500 जुर्माना
धारा 379 में 1 माह की सजा
वहीं, दवा आपूर्ति से जुड़े—
रमेश महावर
सुमित महावर
राकेश खरे
राजेश खरे
मनीष खरे
को अदालत ने साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया।
2014 का वह दिन: जब शिविर बना त्रासदी का केंद्र
तारीख: 8 नवंबर 2014
स्थान: पेंडारी (तखतपुर ब्लॉक), बिलासपुर
शिविर स्थल: एक बंद/परित्यक्त निजी अस्पताल भवन (नेमीचंद जैन अस्पताल)
सरकारी परिवार नियोजन शिविर में एक ही दिन में बड़े पैमाने पर नसबंदी ऑपरेशन किए गए।
ऑपरेशन का असामान्य पैटर्न
एक ही डॉक्टर द्वारा 5–6 घंटे में 83 ऑपरेशन
एक ही लैप्रोस्कोप उपकरण का बार-बार उपयोग
स्वच्छता और एसेप्सिस के मानकों की अनदेखी
ऑपरेशन के बाद बिगड़ी हालत, अस्पतालों में अफरातफरी
शाम होते-होते ऑपरेशन कराई महिलाओं की तबीयत बिगड़ने लगी।
उल्टी, पेट दर्द, बुखार, ब्लड प्रेशर गिरना जैसे लक्षण
100 से अधिक महिलाओं को भर्ती करना पड़ा
भर्ती स्थान: सिम्स, जिला अस्पताल, निजी अस्पताल (अपोलो सहित)
मौत का आंकड़ा
आधिकारिक तौर पर 13 से 15 महिलाओं की मौत
60 से अधिक महिलाएं गंभीर रूप से बीमार
पीड़ितों में अधिकांश महिलाएं ग्रामीण, दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से थीं।
कारणों को लेकर उठे सवाल
घटना के बाद कई स्तरों पर कारण सामने आए—
1. ऑपरेशन में लापरवाही
निर्धारित सीमा (30–35) से कहीं अधिक ऑपरेशन
उपकरणों की गुणवत्ता और स्वच्छता पर सवाल
बंद इमारत में शिविर आयोजन
2. दवाइयों पर विवाद
ऑपरेशन के बाद दी गई दवा “सिप्रोसिन” को लेकर विवाद हुआ—
आरोप: दवा में जिंक फॉस्फाइड (चूहामार जहर) की मिलावट
जांच में दवाओं की गुणवत्ता और संदिग्ध तत्वों की चर्चा
3. लक्ष्य आधारित दबाव
परिवार नियोजन कार्यक्रम के टारगेट पूरे करने का दबाव
महिलाओं को प्रोत्साहन राशि (लगभग ₹1400) देकर लाने के आरोप
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंजा मामला
यह घटना—
देशभर में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाली बनी
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी प्रमुखता से रिपोर्ट हुई
परिवार नियोजन कार्यक्रम की कार्यप्रणाली पर बहस छिड़ी
“मां, बेटी और बहू” की मौत की खबरों ने इस घटना को मानवीय त्रासदी का रूप दिया।
सरकारी कार्रवाई और जांच
घटना के बाद—
तत्कालीन राज्य सरकार ने जांच के आदेश दिए
स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारी निलंबित हुए
सर्जन डॉ. आर.के. गुप्ता की गिरफ्तारी हुई
दवा सप्लाई चेन की जांच शुरू हुई
बाद की जांचों में—
लापरवाही और दवाओं की गुणवत्ता दोनों को कारण बताया गया
कुछ अधिकारियों पर वर्षों बाद भी कार्रवाई जारी रही
कानूनी लड़ाई: 11 साल का लंबा इंतजार
2014 में दर्ज केस में—
पुलिस ने सर्जन और दवा कंपनियों के खिलाफ चालान पेश किया
लंबी सुनवाई के बाद 2026 में फैसला आया
यह मामला देश में चिकित्सा लापरवाही और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से जुड़े सबसे लंबे और चर्चित मुकदमों में शामिल रहा।
त्रासदी का सामाजिक असर
प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिया गया
कई परिवार आज भी न्याय और जवाबदेही की मांग से जुड़े रहे
घटना ने ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे और शिविर आधारित नसबंदी मॉडल पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया
एक नजर में पूरा मामला
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