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“सूखा नशा बन रहा अपराध का सबसे बड़ा नेटवर्क! 2876 केस, 5048 गिरफ्तार—विधानसभा में कांग्रेस विधायक अटल  के सवालों से हिली छत्तीसगढ़ सरकार”

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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रायपुर/बिलासपुर ।
छत्तीसगढ़ विधानसभा में सूखा नशा और उससे जुड़े अपराधों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। कोटा के कांग्रेस विधायक अटल श्रीवास्तव ने सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए प्रदेश में तेजी से फैल रहे नशे के अवैध कारोबार और अपराध के आंकड़ों पर जवाब मांगा।
विधानसभा सत्र में उठे इस मुद्दे ने साफ कर दिया है कि राज्य में “सूखा नशा” अब केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि संगठित अपराध का बड़ा नेटवर्क बन चुका है।
क्या पूछा गया—सीधे सवाल, सरकार से जवाब
अटल श्रीवास्तव ने गृह विभाग से सवाल किया कि:
जनवरी 2024 से 15 फरवरी 2026 तक
ब्राउन शुगर, गांजा, कफ सिरप और नशीले इंजेक्शन के
अवैध कारोबार पर कितनी कार्रवाई हुई?
कितने केस दर्ज हुए?
कितने आरोपी पकड़े गए?
इनमें कितने नाबालिग और महिलाएं शामिल हैं?
सरकार का जवाब—चौंकाने वाले आंकड़े
गृह मंत्री के जवाब ने पूरे प्रदेश की स्थिति उजागर कर दी:
कुल दर्ज प्रकरण: 2876
कुल गिरफ्तार आरोपी: 5048
नाबालिग आरोपी: 85
महिला आरोपी: 326

नशे का यह कारोबार अब हर वर्ग तक फैल चुका है—जिसमें महिलाएं और नाबालिग भी शामिल हैं।
बिलासपुर संभाग: अपराध का हॉटस्पॉट?
अटल श्रीवास्तव ने केवल नशे तक ही सवाल सीमित नहीं रखा, बल्कि बिलासपुर संभाग में बढ़ते अपराधों पर भी सरकार से जवाब तलब किया।
गृह मंत्री द्वारा दिए गए आंकड़े और भी ज्यादा चिंताजनक हैं:
2 साल में कुल अपराध: 56,973
चार्जशीट पेश नहीं हुई: 13,625 मामले
लंबित विवेचना: 5,062 मामले

बड़ा सवाल: कार्रवाई हो रही या सिर्फ आंकड़े बढ़ रहे?
इन आंकड़ों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
क्या नशे के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित है?
गिरफ्तारियों के बावजूद नेटवर्क क्यों नहीं टूट रहा?
इतनी बड़ी संख्या में लंबित मामले—क्या पुलिस सिस्टम पर दबाव या लापरवाही?
नाबालिगों और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी—क्या समाजिक विफलता का संकेत?
“सूखा नशा” क्यों बन रहा सबसे बड़ा खतरा?
विशेषज्ञों के मुताबिक:
यह आसानी से उपलब्ध और सस्ता है
युवा और स्कूली स्तर तक पहुंच बना चुका है
संगठित गैंग इसे बड़े पैमाने पर चला रहे हैं
छोटे शहर और संभागीय मुख्यालय अब टारगेट बन रहे हैं
राजनीतिक संदेश: सरकार पर सीधा दबाव
अटल श्रीवास्तव के इस सवाल ने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाया है, बल्कि सरकार को भी सख्त एक्शन लेने के लिए मजबूर किया है।
यह मुद्दा अब केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगा—बल्कि आने वाले समय में यह राज्य की कानून-व्यवस्था और चुनावी राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।

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