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लोहरिया की गलियों से सत्ता के गलियारों तक… छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम अरुण साव की सियासी कहानी, जहां संगठन बना ताकत और समाजसेवा पहचान

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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Md ayaz rehan, newsdawncg.com

बिलासपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ में उप मुख्यमंत्री ने खोले जिंदगी के अनकहे पन्ने; गिल्ली-डंडा और संघ की शाखा से एबीवीपी की राष्ट्रीय कार्यसमिति, वकालत, रक्तदान अभियान और सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का सफर किया साझा
बिलासपुर। सियासत में मुकाम रातोंरात नहीं बनते। इसके पीछे वर्षों की संगठनात्मक सक्रियता, सामाजिक संपर्क, वैचारिक प्रतिबद्धता और जिम्मेदारियों के बीच खुद को साबित करने की लंबी प्रक्रिया होती है। छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री अरुण साव की राजनीतिक यात्रा भी इन्हीं पड़ावों से गुजरकर आगे बढ़ी है। मुंगेली जिले के लोहरिया गांव के खेत-खलिहानों से शुरू हुआ उनका सफर छात्र राजनीति, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), वकालत, भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक दायित्वों और चुनावी राजनीति से होते हुए प्रदेश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा।
बिलासपुर प्रेस क्लब के पारंपरिक कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में साव ने अपने जीवन के ऐसे अध्यायों को सामने रखा, जो राजनीतिक पदों और चुनावी उपलब्धियों की चमक के पीछे अक्सर छूट जाते हैं। बचपन के ग्रामीण खेलों से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा, विद्यार्थी परिषद में संगठनात्मक जिम्मेदारियों, वकालत के पेशे, रक्तदान जागरूकता अभियान और जरूरतमंदों की मदद तक की यादों ने उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआती तस्वीर पेश की।
पत्रकारों के साथ संवाद में सामने आई इन स्मृतियों के केंद्र में एक ऐसा सफर रहा, जिसमें गांव का सामाजिक परिवेश, संगठन में काम करने का अनुभव और जनसेवा की गतिविधियां राजनीतिक पहचान के निर्माण के महत्वपूर्ण पड़ाव बने। यह कहानी केवल एक नेता के सत्ता तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उस रास्ते की भी है, जिस पर चलते हुए उनकी सार्वजनिक भूमिका लगातार विस्तृत होती गई।
किसान परिवार, राजनीतिक माहौल और गांव की जमीन से जुड़ाव
अरुण साव का बचपन मुंगेली जिले के लोहरिया गांव में बीता। उनके दादा बड़े किसान थे, जबकि पिता वकालत के पेशे से जुड़े होने के साथ गांव में तीन-चार बार सरपंच भी रहे। पिता ने जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में संगठनात्मक जिम्मेदारियां भी निभाईं। इस तरह परिवार में खेती-किसानी, सामाजिक गतिविधियों और राजनीति का वातावरण मौजूद था।
हालांकि, साव की अपनी राजनीतिक पहचान छात्र राजनीति और संगठन के भीतर लगातार काम करने के अनुभवों से विकसित हुई। उनके शुरुआती जीवन की तस्वीर में ग्रामीण परिवेश और पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ शिक्षा तथा सामाजिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा।
लोहरिया में तीसरी कक्षा तक पढ़ाई करने के दौरान उनका बचपन गांव की सामान्य दिनचर्या के बीच गुजरा। खेत-खलिहान, तालाब और पारंपरिक खेल जीवन का हिस्सा थे। गिल्ली-डंडा और भौंरा उनके पसंदीदा खेल थे। गर्मियों में तालाब में घंटों नहाना और खेती-किसानी के काम में परिवार का हाथ बंटाना उस दौर की यादों में शामिल रहा।
चौथी कक्षा से मुंगेली में पढ़ाई शुरू हुई तो जीवन में एक नया परिवेश जुड़ा। मोहल्ले के बाल मंदिर में खेलना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बना। ग्रामीण जीवन से कस्बाई परिवेश तक का यह बदलाव आगे चलकर उनके संगठनात्मक जीवन की पृष्ठभूमि से भी जुड़ा।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ नेतृत्व का सफर
कॉलेज के दिनों में अरुण साव की सक्रियता को नई दिशा मिली। छात्र प्रतिनिधि, साहित्यिक सचिव और सांस्कृतिक सचिव जैसे दायित्वों ने उन्हें विद्यार्थियों के बीच काम करने तथा विभिन्न गतिविधियों में जिम्मेदारी निभाने का अवसर दिया।
वर्ष 1990 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की मुंगेली इकाई के अध्यक्ष बने। इसके बाद संगठन में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। इकाई अध्यक्ष से प्रांत सहमंत्री, विभाग प्रमुख और संभाग प्रमुख जैसे पदों पर काम करते हुए वे एबीवीपी की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य तक पहुंचे।
यह सफर उनकी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण चरण रहा। स्थानीय स्तर पर संगठन का काम करते हुए शुरू हुई सक्रियता ने उन्हें क्रमशः व्यापक जिम्मेदारियों तक पहुंचाया। विद्यार्थी परिषद में बिताए वर्षों के दौरान संगठनात्मक गतिविधियों, छात्र मुद्दों और कार्यकर्ताओं के साथ काम करने का अनुभव उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बना।
भारतीय राजनीति में छात्र संगठन अक्सर नए नेतृत्व के निर्माण का माध्यम रहे हैं। साव की यात्रा में भी छात्र राजनीति से संगठनात्मक जिम्मेदारियों और फिर व्यापक राजनीतिक भूमिका तक पहुंचने का क्रम स्पष्ट दिखाई देता है।
वकालत के पेशे से भाजपा संगठन तक
छात्र राजनीति के साथ शिक्षा पूरी करने के बाद साव ने कानून के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने बिलासपुर के केआर लॉ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1996 में मुंगेली में वकालत शुरू की।
दिसंबर 2000 में बिलासपुर में उच्च न्यायालय की शुरुआत के साथ वे यहां आ गए। इसके बाद उच्च शासकीय अधिवक्ता, शासकीय अधिवक्ता और उप महाधिवक्ता जैसे दायित्वों के माध्यम से न्यायिक क्षेत्र में भी सक्रिय रहे।
वकालत का पेशेवर अनुभव उनके सार्वजनिक जीवन का एक अलग अध्याय बना। एक तरफ कानूनी क्षेत्र में जिम्मेदारियां थीं, तो दूसरी तरफ संगठनात्मक राजनीति में सक्रियता जारी रही। विद्यार्थी परिषद के बाद उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा में काम किया और मंडल से जिला तथा प्रदेश स्तर तक संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाईं।
स्थानीय स्तर से शुरू हुई संगठनात्मक सक्रियता का विस्तार इसी दौरान व्यापक राजनीतिक दायरे में हुआ। कानून और राजनीति के बीच उनका सफर आगे चलकर संसदीय राजनीति तथा राज्य के नेतृत्व तक पहुंचने वाली यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
रक्तदान अभियान: जब समाजसेवा को दिया संगठित स्वरूप
अरुण साव के जीवन का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्ष वर्ष 1996 में मुंगेली में शुरू की गई रक्तदान जागरूकता की पहल है। उस समय रक्तदान को लेकर लोगों में संकोच और भय का माहौल था। जरूरतमंद मरीजों के लिए समय पर रक्त उपलब्ध कराना एक चुनौती थी।
ऐसे समय में रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने और रक्त समूहों की पहचान करने के उद्देश्य से शिविर आयोजित कराया गया। इस पहल के तहत सहमति पत्र भरवाकर करीब 500 लोगों के रक्त समूह की जांच कराई गई।
इसके बाद संभावित रक्तदाताओं की जानकारी वाली निर्देशिका तैयार की गई और उसे डॉक्टरों तथा मेडिकल स्टोरों तक पहुंचाया गया। इसका उद्देश्य जरूरत के समय मरीजों और उनके परिजनों को रक्तदाताओं की जानकारी उपलब्ध कराना था, ताकि रक्त की आवश्यकता पड़ने पर संपर्क करने में आसानी हो सके।
यह पहल केवल रक्त समूह की जांच कराने तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे जरूरतमंद मरीजों को समय पर मदद उपलब्ध कराने की व्यावहारिक सोच थी। रक्तदान को लेकर सामाजिक झिझक के दौर में लोगों को जोड़ना और उपलब्ध जानकारी को व्यवस्थित रूप से उपयोगी बनाना उस समय की महत्वपूर्ण सामाजिक पहल रही।
नेत्र शिविर, मरीजों की मदद और लावारिस शवों का अंतिम संस्कार
साव ने अपने संस्मरणों में मुंगेली के मिशन अस्पताल में आयोजित नेत्र शिविरों का भी उल्लेख किया। इन शिविरों के दौरान वे करीब सौ कार्यकर्ताओं के साथ मरीजों की सहायता और व्यवस्थाओं में जुटते थे। जरूरतमंद मरीजों की मदद करना और शिविरों के संचालन में सहयोग देना उनकी सामाजिक सक्रियता का हिस्सा रहा।
इसके अतिरिक्त लावारिस शवों के अंतिम संस्कार में सहयोग करना और स्कूल-कॉलेज की समस्याओं को लेकर आवाज उठाना भी उनके शुरुआती सार्वजनिक जीवन की गतिविधियों में शामिल रहा।
इन प्रसंगों में समाजसेवा का ऐसा स्वरूप सामने आता है, जो केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं था। मरीजों की सहायता से लेकर अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील कार्यों तक भागीदारी ने उनके सार्वजनिक जीवन को सामाजिक गतिविधियों से जोड़े रखा।
2019 में संसद, 2022 में प्रदेश भाजपा की कमान और 2023 में उप मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी
अरुण साव की राजनीतिक यात्रा में आगे चलकर बड़े पदों और चुनावी उपलब्धियों का सिलसिला जुड़ा। वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव जीतकर वे संसद पहुंचे। स्थानीय और प्रदेश स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाने के बाद संसद तक पहुंचना उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।
वर्ष 2022 में उन्हें छत्तीसगढ़ भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। यह जिम्मेदारी पार्टी के प्रदेशव्यापी संगठन और राजनीतिक गतिविधियों के संचालन के लिहाज से महत्वपूर्ण थी।
इसके बाद वर्ष 2023 में वे लोरमी विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए और उन्हें छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली। इस तरह लोहरिया गांव में बीते बचपन से शुरू हुई यात्रा छात्र राजनीति, वकालत, युवा मोर्चा, संसदीय राजनीति और प्रदेश भाजपा के नेतृत्व से गुजरते हुए राज्य सरकार के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची।
यह क्रम उनके सार्वजनिक जीवन के अलग-अलग चरणों को जोड़ता है। छात्र संगठन में शुरुआती जिम्मेदारियों से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री तक का सफर उनकी राजनीतिक भूमिका के विस्तार को सामने रखता है।
‘हमर पहुना’ में सामने आई राजनीति की पृष्ठभूमि
बिलासपुर प्रेस क्लब के कार्यक्रम में साझा किए गए संस्मरणों ने अरुण साव की राजनीतिक यात्रा के उन पहलुओं पर रोशनी डाली, जो सामान्यतः पदों, चुनावों और सरकारी जिम्मेदारियों की खबरों में जगह नहीं बना पाते।
गांव के पारंपरिक खेल, संघ की शाखा, विद्यार्थी परिषद की संगठनात्मक यात्रा, वकालत का पेशेवर अनुभव और रक्तदान जागरूकता जैसे सामाजिक प्रयास उनके जीवन के अलग-अलग पड़ाव हैं। इन सभी अनुभवों को एक साथ देखने पर उनके सार्वजनिक जीवन की पृष्ठभूमि को समझने का अवसर मिलता है।
राजनीतिक नेतृत्व का वास्तविक मूल्यांकन अंततः उसके फैसलों, नीतियों, जनहित में किए गए कार्यों और उनके परिणामों से होता है। लेकिन किसी नेता के शुरुआती जीवन और संगठनात्मक अनुभवों को जानना उसकी राजनीतिक यात्रा के विकासक्रम को समझने में मदद करता है।
लोहरिया से लोरमी और फिर सत्ता के शीर्ष तक का सफर इसी विकासक्रम की कहानी है। ‘हमर पहुना’ में अरुण साव ने अपने जीवन के उन पन्नों को सामने रखा, जिनमें ग्रामीण परिवेश, संगठनात्मक सक्रियता, पेशेवर अनुभव और समाजसेवा एक साथ दिखाई देते हैं। यही इस संवाद की खासियत रही कि इसमें उप मुख्यमंत्री की वर्तमान राजनीतिक पहचान के साथ उस लंबे रास्ते की झलक भी मिली, जिसने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।

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