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बिलासपुर को चाहिए विकास का ठोस रोडमैप, पद की राजनीति नहीं

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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जलभराव, बिजली संकट, एयरपोर्ट और अरपा नदी पर शैलेष पांडेय की दोटूक; ‘हमर पहुना’ में पूर्व विधायक ने खोले अपने राजनीतिक सफर और निजी जिंदगी के पन्ने

बिलासपुर। बारिश में डूबती सड़कें, बार-बार गुल होती बिजली, विस्तार की बाट जोहता एयरपोर्ट और शहर की पहचान अरपा नदी का भविष्य—बिलासपुर के विकास की बहस इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन इन समस्याओं का समाधान आखिर किसके एजेंडे में है? और क्या शहर की जरूरतों को राजनीतिक पदों से आगे रखकर देखने का वक्त नहीं आ गया है?

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जलभराव, बिजली संकट, एयरपोर्ट और अरपा नदी पर शैलेष पांडेय की दोटूक; ‘हमर पहुना’ में पूर्व विधायक ने खोले अपने राजनीतिक सफर और निजी जिंदगी के पन्नेमंत्री नहीं बने तो क्या, बिलासपुर का कद कम नहीं होताएयरपोर्ट से लेकर सड़क तक, विकास का सवालअरपा नदी: शहर की पहचान और भविष्य की कसौटी10 किलोवाट का सोलर सिस्टम, फिर भी 9 से 10 हजार का बिलबी-ग्रेड सिटी का दर्जा: कर्मचारियों से जुड़ा सवाल, शहर के विस्तार की चुनौतीशिक्षा में समान अवसर की वकालतकोरोना काल: जनसेवा और जिम्मेदारी की परीक्षायुवाओं में नशे की प्रवृत्ति पर चिंताराजनीति से अलग एक घरेलू कहानी: बेटी के लिए सीखा खाना बनानाइंजीनियर से विधायक तक का सफरजीत-हार से आगे जनता के प्रति जिम्मेदारी

पूर्व विधायक शैलेष पांडेय ने रविवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के पारंपरिक संवाद कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में शहर की बुनियादी समस्याओं पर अपनी राय रखते हुए इन्हीं सवालों को केंद्र में रखा। उनका कहना था कि जलभराव का स्थायी समाधान, निर्बाध बिजली आपूर्ति और विकास परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार से अधिक वित्तीय सहायता हासिल करना प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि जनता उन्हें दोबारा विधायक बनने का अवसर देती है, तो इन मुद्दों पर काम करना उनकी प्राथमिकता होगी।

पांडेय के संवाद में राजनीति के साथ विकास की चुनौतियां, प्रशासनिक समन्वय, शिक्षा में समान अवसर और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जैसे मुद्दे भी उभरे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी नेता का राजनीतिक महत्व उसके पद से नहीं, बल्कि जनता के लिए किए गए काम से तय होना चाहिए।

मंत्री नहीं बने तो क्या, बिलासपुर का कद कम नहीं होता

राजनीति में पद और प्रतिष्ठा अक्सर चर्चा के केंद्र में रहते हैं। पांडेय के राजनीतिक सफर में भी मंत्रिमंडल को लेकर उम्मीदें और चर्चाएं रही थीं। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद उनके शिक्षा मंत्री बनने की संभावना पर भी चर्चा हुई थी। शिक्षा के क्षेत्र में उनके अनुभव को इसकी एक वजह माना जा रहा था।

इस सवाल पर उन्होंने कहा कि विधायक का पहला कार्यकाल सीखने और व्यवस्था को समझने का अवसर होता है। मंत्रिमंडल का गठन करना और अपनी टीम चुनना मुख्यमंत्री का अधिकार है। किसी व्यक्ति को मंत्री पद मिलना या नहीं मिलना, इससे बिलासपुर का राजनीतिक महत्व कम नहीं हो जाता।

उनकी बात का केंद्रीय संदेश साफ था—बिलासपुर की पहचान किसी एक नेता की कुर्सी से नहीं बनती। शहर का महत्व उसके नागरिकों, आर्थिक गतिविधियों, संस्थानों और विकास की संभावनाओं से तय होता है। ऐसे में राजनीतिक बहस का केंद्र पदों की हिस्सेदारी के बजाय शहर की जरूरतें होनी चाहिए।

एयरपोर्ट से लेकर सड़क तक, विकास का सवाल

बिलासपुर एयरपोर्ट का विस्तार लंबे समय से शहर की विकास संबंधी अपेक्षाओं से जुड़ा मुद्दा रहा है। बेहतर हवाई संपर्क से व्यापार, उद्योग, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं को गति मिलने की उम्मीद की जाती है।

पांडेय ने बताया कि उन्होंने विधायक रहते हुए विधानसभा में एयरपोर्ट के विकास का मुद्दा उठाया था। उन्होंने थ्री-सी श्रेणी, नाइट लैंडिंग की सुविधा और विभिन्न शहरों के लिए उड़ान सेवाएं शुरू करने से जुड़े प्रयासों का उल्लेख किया। एयरपोर्ट का नाम ‘बिलासा देवी केंवटीन एयरपोर्ट’ रखने के लिए विधानसभा में संकल्प लाने की अपनी भूमिका को भी उन्होंने याद किया। उनके अनुसार, इस संकल्प को सदन में सभी सदस्यों का समर्थन मिला था।

हालांकि, एयरपोर्ट की वास्तविक उपयोगिता केवल सुविधाओं के विस्तार तक सीमित नहीं है। नियमित उड़ानें, बेहतर कनेक्टिविटी और यात्रियों की जरूरतों के अनुरूप सेवाएं ही किसी हवाई अड्डे को शहर की अर्थव्यवस्था से प्रभावी रूप से जोड़ती हैं। इस लिहाज से बिलासपुर के लिए अगली चुनौती पहले से उठाए गए मुद्दों को ठोस परिणामों तक पहुंचाने की है।

अरपा नदी: शहर की पहचान और भविष्य की कसौटी

बिलासपुर की चर्चा अरपा नदी के बिना अधूरी है। यह नदी शहर की सांस्कृतिक स्मृति और भावनात्मक पहचान का हिस्सा है। लेकिन नदी के संरक्षण, जलस्तर और शहरी जल निकासी से जुड़े सवाल विकास की प्राथमिकताओं को भी परखते हैं।

पांडेय ने शिवघाट और अन्य प्रस्तावित बैराजों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन परियोजनाओं का उद्देश्य नदी में पानी बनाए रखने और शहर की जरूरतों को पूरा करने में मदद करना था। उन्होंने अरपा संरक्षण से जुड़े आंदोलनों और पदयात्राओं को भी याद किया।

उनके विचार में बिलासपुर को सुंदर और व्यवस्थित शहर बनाने के लिए नदी संरक्षण, जल निकासी और बुनियादी ढांचे को अलग-अलग मुद्दों की तरह नहीं देखा जा सकता। बारिश में जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान भी दीर्घकालिक योजना और बेहतर समन्वय से ही संभव है।

यहां सवाल केवल पानी निकासी का नहीं, बल्कि शहरी नियोजन का भी है। यदि सड़क, नाली, नदी और निर्माण संबंधी योजनाएं एक-दूसरे से जुड़कर नहीं चलेंगी, तो हर मानसून में वही समस्या नए सिरे से सामने आने का खतरा बना रहेगा।

10 किलोवाट का सोलर सिस्टम, फिर भी 9 से 10 हजार का बिल

बिजली संकट पर बात करते हुए पांडेय ने अपने घर का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि उनके यहां 10 किलोवाट का सोलर सिस्टम लगा होने के बावजूद हर महीने करीब 9 से 10 हजार रुपये का बिजली बिल आता है।

उन्होंने सौर ऊर्जा से उत्पादित बिजली की खरीद और उपभोक्ताओं को बिजली उपलब्ध कराने की दरों के बीच अंतर पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि सौर ऊर्जा अपनाने वाले उपभोक्ताओं को उचित लाभ मिलना चाहिए और बिजली व्यवस्था में पारदर्शिता होनी चाहिए। शहर में बार-बार बिजली गुल होने की समस्या से राहत दिलाना भी जरूरी है।

हालांकि, सोलर सिस्टम लगाने के बाद भी बिल आने के पीछे वास्तविक कारण जानने के लिए बिजली की खपत, ग्रिड से ली गई बिजली, निर्यात की गई अतिरिक्त बिजली, मीटरिंग व्यवस्था और लागू टैरिफ की जांच जरूरी होती है। पांडेय का उदाहरण इस व्यापक सवाल की ओर ध्यान खींचता है कि स्वच्छ ऊर्जा अपनाने वाले उपभोक्ताओं को आर्थिक लाभ कितना और किस व्यवस्था के तहत मिल रहा है।

बी-ग्रेड सिटी का दर्जा: कर्मचारियों से जुड़ा सवाल, शहर के विस्तार की चुनौती

नगर निगम की सीमा का विस्तार और बिलासपुर को बी-ग्रेड सिटी का दर्जा दिलाने का मुद्दा भी चर्चा में रहा। पांडेय ने बताया कि चुनाव के दौरान रेलवे और राज्य सरकार के कर्मचारियों ने इस विषय को उनके सामने उठाया था। उनके अनुसार, यह दर्जा कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं के साथ शहर के विकास से जुड़े लाभों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

उन्होंने बताया कि इस दिशा में तत्कालीन कलेक्टर और तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ प्रयास किए गए थे। साथ ही उन्होंने पत्रकारों से इस विषय की मौजूदा स्थिति की पड़ताल करने का आग्रह किया, ताकि शहर के हित में समाधान निकल सके।

इस मुद्दे का महत्व इसलिए भी है कि शहर का प्रशासनिक विस्तार, आबादी का दबाव और सरकारी कर्मचारियों की सुविधाएं एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। लेकिन किसी भी दर्जे या सीमा विस्तार से मिलने वाले वास्तविक लाभों को समझने के लिए संबंधित नियमों, पात्रता और वर्तमान सरकारी स्थिति की स्पष्ट जानकारी जरूरी है।

शिक्षा में समान अवसर की वकालत

शैलेष पांडेय की राजनीतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा और तकनीक से उनका जुड़ाव भी रहा है। उन्होंने अपने करीब दो दशक के अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि लगभग दस वर्ष उन्होंने डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय और करीब दस वर्ष कंप्यूटर शिक्षा से जुड़ी परियोजनाओं में काम किया।

उनके अनुसार, शुरुआती दौर में छत्तीसगढ़ के गांवों और स्कूलों तक कंप्यूटर शिक्षा पहुंचाना आसान नहीं था। इंटरनेट और तकनीकी संसाधनों की सीमित उपलब्धता के बीच प्रशिक्षकों को तैयार करना और तकनीक को शिक्षा से जोड़ना बड़ी चुनौती थी। उन्होंने कंप्यूटर शिक्षा अभियानों और ई-गवर्नेंस के प्रयासों का जिक्र किया। भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण से संबंधित ‘भुइयां’ सॉफ्टवेयर को भी उन्होंने तकनीक के जरिए सरकारी सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में किए गए कार्यों के संदर्भ में याद किया।

विधायक रहते हुए अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की जरूरत पर उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के कई अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाना चाहते थे, लेकिन निजी स्कूलों की फीस उनके लिए बाधा बनती थी।

इस जरूरत को देखते हुए बिलासपुर में अंग्रेजी माध्यम स्कूल शुरू करने की दिशा में प्रयास किए गए। उन्होंने तिलक नगर, दयालबंद और लाला लाजपत राय क्षेत्र के स्कूलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अच्छी शिक्षा हर बच्चे को मिलनी चाहिए, चाहे उसके परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी भी हो।

उनकी यह बात शिक्षा के उस बुनियादी सवाल को सामने रखती है, जिसमें अंग्रेजी माध्यम तक पहुंच केवल आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों तक सीमित न रहे और सरकारी स्कूलों में भी बच्चों को बेहतर अवसर मिल सकें।

कोरोना काल: जनसेवा और जिम्मेदारी की परीक्षा

राजनीतिक जीवन के अनुभवों में कोरोना महामारी और लॉकडाउन का दौर भी पांडेय के लिए खास रहा। उन्होंने बताया कि उस समय मजदूर, ऑटो चालक, हमाल और दूसरे जरूरतमंद लोग भोजन तथा राशन की सहायता के लिए उनके निवास पर पहुंचते थे। उन्होंने सुबह से देर रात तक लोगों की मदद करने का प्रयास किया। इसी दौरान वे स्वयं भी कोरोना संक्रमित हुए।

पांडेय ने बताया कि उनके निवास पर लोगों की भीड़ जुटने के बाद एफआईआर भी दर्ज हुई। उन्होंने इस प्रसंग को संकट के समय लोगों के साथ खड़े रहने की जिम्मेदारी से जोड़कर देखा।

महामारी के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं, अस्पतालों और प्रयोगशालाओं को मजबूत करने की जरूरत पर भी बात की। इस अनुभव के पीछे उनका संदेश यह था कि जनप्रतिनिधि की भूमिका केवल सामान्य परिस्थितियों में नहीं, बल्कि संकट के समय भी परखी जाती है।

युवाओं में नशे की प्रवृत्ति पर चिंता

युवाओं में हुक्का सेवन की समस्या का उल्लेख करते हुए पांडेय ने बताया कि जानकारी मिलने के बाद उन्होंने संबंधित अधिकारियों और पुलिस के साथ कार्रवाई की पहल की थी। उन्होंने इस विषय को विधानसभा में भी उठाया।

उनका कहना था कि युवाओं को नशे से बचाने के लिए प्रभावी कार्रवाई, कानून का सख्ती से पालन और परिवार, प्रशासन तथा समाज के बीच समन्वय जरूरी है। यह मुद्दा केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं के बीच जागरूकता और समय रहते रोकथाम के प्रयासों से भी जुड़ा है।

राजनीति से अलग एक घरेलू कहानी: बेटी के लिए सीखा खाना बनाना

कार्यक्रम में पांडेय ने अपने निजी जीवन का एक दिलचस्प प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि दूसरी बेटी के जन्म के समय उनकी पत्नी को काफी परेशानी हुई थी। ऐसे में बड़ी बेटी को सुबह स्कूल के लिए तैयार करने और उसका टिफिन बनाने की जिम्मेदारी उन पर आ गई।

सुबह पांच बजे घर में सहयोगी उपलब्ध नहीं होता था, इसलिए उन्होंने खुद खाना बनाना शुरू किया। उन्होंने बताया कि आज भी उन्हें आलू-पालक, आलू-मेथी, भरवां बैंगन, करेला फ्राई, आलू-गोभी, भिंडी, खिचड़ी और खीर जैसे व्यंजन बनाना पसंद है।

उनके मुताबिक, खाना स्वादिष्ट होने के साथ देखने में भी अच्छा होना चाहिए और उसे प्यार से बनाना सबसे जरूरी है। राजनीतिक बातचीत के बीच यह प्रसंग उनके घरेलू जीवन के उस पक्ष को सामने लाया, जो आमतौर पर सार्वजनिक मंचों पर कम दिखाई देता है।

इंजीनियर से विधायक तक का सफर

अपने राजनीतिक सफर के बारे में बताते हुए पांडेय ने कहा कि वे मैकेनिकल इंजीनियर हैं और वर्ष 1997 में रविशंकर विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी की थी। उनका कोई राजनीतिक पारिवारिक आधार नहीं था और शुरुआत में राजनीति में आने की योजना भी नहीं थी।

उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रोत्साहन को राजनीति में प्रवेश का अवसर बताया। साथ ही भूपेश बघेल, टी.एस. सिंहदेव और चरणदास महंत से मिले सहयोग और मार्गदर्शन के लिए आभार जताया।

पत्रकारों के साथ संवाद को उन्होंने सीखने का अवसर बताया। उनके अनुसार, पत्रकार समाज की समस्याओं को सामने लाने और जनहित के मुद्दों पर चर्चा कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि वे पत्रकारों से दूरी बनाने के बजाय खुलकर बातचीत करना पसंद करते रहे हैं।

जीत-हार से आगे जनता के प्रति जिम्मेदारी

कार्यक्रम के अंत में पांडेय ने कहा कि बिलासपुर के लोगों से मिला प्यार और समर्थन वे जीवनभर नहीं भूलेंगे। उनके मुताबिक, चुनाव में जीत और हार राजनीति का हिस्सा है, लेकिन जनता के प्रति जिम्मेदारी चुनाव परिणामों के साथ समाप्त नहीं होती।

बिलासपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अजीत मिश्रा, उपाध्यक्ष विजय क्रांति तिवारी सहित वरिष्ठ पत्रकार और प्रेस क्लब के सदस्य कार्यक्रम में मौजूद रहे। पांडेय ने प्रेस क्लब की कार्यकारिणी के आमंत्रण और सम्मान के लिए आभार जताया।

‘हमर पहुना’ में उनके वक्तव्य का व्यापक संदर्भ शहर की उन समस्याओं से जुड़ा रहा, जिनका समाधान किसी एक घोषणा से नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास, स्पष्ट प्राथमिकताओं और संस्थागत समन्वय से संभव है। जलभराव से राहत, बिजली की विश्वसनीय आपूर्ति, एयरपोर्ट का विस्तार, अरपा का संरक्षण और शिक्षा के बेहतर अवसर—इन मुद्दों पर असली कसौटी यही होगी कि राजनीतिक चर्चा कितने ठोस परिणामों में बदलती है।

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