बच्चों की तुलना, प्रतियोगिता का दबाव और असफलता का डर… युवाओं की मानसिक सेहत पर बढ़ता संकट
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर बिलासपुर के राज्य मानसिक चिकित्सालय में मंथन, विशेषज्ञों ने कहा—बच्चों को समझें, उनकी बात सुनें और सफलता के लिए अनावश्यक दबाव न बनाएं
बिलासपुर। बदलती जीवनशैली, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, नशे की प्रवृत्ति और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के बीच मानसिक स्वास्थ्य आज वैश्विक चिंता का विषय बनता जा रहा है। खासकर किशोरों और युवाओं में पढ़ाई, करियर, प्रतियोगी परीक्षाओं तथा परिवार की अपेक्षाओं से जुड़ा दबाव उनकी मानसिक सेहत को प्रभावित कर सकता है। ऐसे समय में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ लोगों के अनुभवों को सुनना, उनकी समस्याओं को समझना और समय रहते सहायता उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर 10 अक्टूबर 2026 को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित राज्य मानसिक चिकित्सालय, सेंदरी में मानसिक स्वास्थ्य विषय पर संगोष्ठी एवं जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने मानसिक समस्याओं के सामाजिक और पारिवारिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बच्चों एवं युवाओं की मानसिक परेशानियों को समझने के लिए केवल उनके व्यवहार को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी भावनाओं, चिंताओं और अनुभवों को भी गंभीरता से सुनना होगा।
बच्चों की तुलना बन सकती है मानसिक दबाव की वजह
संगोष्ठी में मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष तिवारी ने कहा कि समय तेजी से बदल रहा है और बच्चों से परिजनों की अपेक्षाएं भी बढ़ती जा रही हैं। कई बार माता-पिता अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करने लगते हैं। पढ़ाई, परीक्षा के परिणाम, करियर और उपलब्धियों को लेकर लगातार तुलना किए जाने से बच्चों एवं युवाओं में दबाव बढ़ सकता है। ऐसी परिस्थितियां उनके आत्मविश्वास और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं तथा कुछ मामलों में अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की क्षमताओं, रुचियों और परिस्थितियों को समझना जरूरी है। हर बच्चे की सीखने की गति, प्रतिभा और भविष्य की संभावनाएं अलग-अलग होती हैं। इसलिए बच्चों पर दूसरों से आगे निकलने का अनावश्यक दबाव बनाने के बजाय उन्हें सहयोग, प्रोत्साहन और अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
व्यक्तित्व का बड़ा हिस्सा दिखाई नहीं देता, मन की परेशानी समझना जरूरी
राज्य मानसिक चिकित्सालय के अस्पताल अधीक्षक डॉ. रक्षित जोगी ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक छोटा हिस्सा ही प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है, जबकि उसके भीतर चलने वाली भावनात्मक उथल-पुथल, चिंताएं और संघर्ष अक्सर सामने नहीं आ पाते।
उन्होंने कहा कि यदि परिजन बच्चों और युवाओं में होने वाले बदलावों को समय रहते समझ लें, उनकी समस्याओं को सुनें और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से बचें, तो मानसिक परेशानियों की पहचान तथा समय पर सहायता मिलने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
डॉ. जोगी ने युवाओं में मानसिक तनाव के प्रमुख कारणों का उल्लेख करते हुए कहा कि नौकरी नहीं मिलना, प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता और भविष्य को लेकर अनिश्चितता कई युवाओं के लिए परेशानी का कारण बनती है। ऐसी परिस्थितियों में असफलता को जीवन का अंत मानने के बजाय दूसरे विकल्पों और संभावनाओं की तलाश करनी चाहिए। युवाओं को यह समझना जरूरी है कि सफलता के रास्ते एक से अधिक होते हैं और किसी एक परीक्षा या नौकरी में असफलता उनके पूरे भविष्य को निर्धारित नहीं करती।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए परिवार और शिक्षकों की भूमिका अहम
कार्यशाला में मानसिक स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं और तनाव के कारणों पर चर्चा की गई। चिकित्सालय के कर्मचारियों के लिए विभिन्न गतिविधियां भी आयोजित की गईं। कार्यक्रम में तनाव की पहचान, उसके उचित प्रबंधन और युवाओं के स्वस्थ मानसिक विकास में परिवार एवं शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।
विशेषज्ञों के संदेश का मूल भाव यह रहा कि बच्चों की समस्याओं को अनुशासनहीनता या कमजोरी मानकर नजरअंदाज करने के बजाय उनके व्यवहार में होने वाले बदलावों को समझना चाहिए। लगातार उदासी, चिड़चिड़ापन, सामाजिक गतिविधियों से दूरी, पढ़ाई में रुचि कम होना अथवा नींद और दिनचर्या में बदलाव जैसे संकेतों पर संवेदनशीलता से ध्यान देना जरूरी है। ऐसे लक्षण बने रहने पर योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना उपयोगी हो सकता है।
सिर्फ जागरूकता नहीं, संवाद और सहायता भी जरूरी
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना, इससे जुड़े भेदभाव को कम करना और मानसिक परेशानियों से जूझ रहे लोगों को सहायता के लिए आगे आने के लिए प्रोत्साहित करना है। मानसिक बीमारी को कमजोरी या सामाजिक कलंक के रूप में देखने के बजाय इसे स्वास्थ्य से जुड़ा विषय मानना आवश्यक है।
बच्चों और युवाओं के मामले में परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय और कार्यस्थल की भूमिका विशेष महत्व रखती है। घर में ऐसा माहौल होना चाहिए, जहां बच्चे बिना डर अपनी परेशानी बता सकें। शिक्षकों को भी केवल शैक्षणिक प्रदर्शन पर ध्यान देने के बजाय विद्यार्थियों की भावनात्मक स्थिति और व्यवहार में आने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का समाधान केवल सलाह देने या सकारात्मक सोच रखने की बात कहने तक सीमित नहीं है। जरूरत के अनुसार मनोवैज्ञानिक परामर्श, मनोरोग विशेषज्ञ की सहायता और निरंतर सहयोग भी महत्वपूर्ण हैं। समय पर पहचान और उचित उपचार से अनेक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों की मौजूदगी में हुआ आयोजन
कार्यक्रम का संचालन क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट प्रियंका यादव ने किया। इस अवसर पर अस्पताल अधीक्षक डॉ. रक्षित जोगी, मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष तिवारी, मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मल्लिकार्जुन राव सगि, आरएमओ डॉ. शीना आनंद चौबे, नर्सिंग अधीक्षक श्रीमती शीला देव खटकर, मेट्रन खेलकला माण्ड्रे सहित चिकित्सालय के नर्सिंग स्टाफ, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, पैरामेडिकल कर्मचारी और कार्यालयीन स्टाफ उपस्थित रहे।
बच्चों को केवल बेहतर अंक, नौकरी और उपलब्धियां हासिल करने के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें असफलता का सामना करना, अपनी भावनाएं व्यक्त करना और जरूरत पड़ने पर मदद मांगना भी सिखाना होगा। मानसिक रूप से स्वस्थ समाज की शुरुआत ऐसे परिवारों और संस्थानों से होती है, जहां तुलना से ज्यादा समझ, दबाव से ज्यादा सहयोग और आलोचना से ज्यादा संवाद को महत्व दिया जाता है।
डॉ रक्षित जोगी
अस्पताल अधीक्षक
राज्य मानसिक चिकित्सालय सेंदरी बिलासपुर।



